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रोमांच की एक अलग दुनिया में ले जाती है रोर

Fri, 31 Oct 2014 02:01 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई Updated Fri, 31 Oct 2014 02:01 PM IST
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film review of roar
यदि आपको रोमांच और जबर्दस्त स्टंट सीन देखने के साथ कुछ नया देखने का शौक है तो रोर फिल्म आपके लिए है।
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अगर आप बॉक्स ऑफिस पर हर हफ्ते आने वाली ढर्रा-कहानियों से ऊब चुके हैं और कुछ अलग देखना चाहते हैं तो रोरः टाइगर्स ऑफ सुंदरबन आपके लिए है। फिल्म में कोई लव स्टोरी नहीं है। हीरो-विलेन वाली मारपीट नहीं है। कार और बाइक की टक्करें नहीं हैं। लेकिन यह फिल्म खूबसूरत है। इसका प्राकृतिक सौंदर्य आकर्षक है।

इसे बहुत शोध के साथ बनाया गया है। फिल्म आपको नई जानकारियां देती हैं। यह आपको ऐसी दुनिया में ले जाती है जिसे आपने आज तक नहीं देखा। यह भारत और बांग्लादेश की सीमा और संयुक्त समुद्र तट पर बसे सुंदरबन की कहानी है। फिल्म को वहीं शूट किया गया है। रोर हिंदी फिल्मों की उन संभावनाओं से भी आपका परिचय कराती है, जिसमें कहा जाता है कि कम से कम तकनीक के स्तर पर जरूर हम हॉलीवुड से टक्कर लेने की स्थिति में हैं।
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साथ ही यह बताती है कि कहानी के कई ऐसे इलाके हैं जहां हमारे शेर डायरेक्टर घुसने से डरते रहे हैं। रोर उनके सामने भी एक चैलेंज भी है। रोर की कहानी में एक्शन कम और रोमांच ज्यादा है। एक फोटोजर्नलिस्ट सुंदरबन में जाता है और सफेद बाघिन के बच्चे को उठा लाता है। नतीजा यह कि बाघिन उसका शिकार कर लेती है। बाघिन से बदलना लेने के लिए फोटोजर्नलिस्ट का बड़ा भाई, जो सेना में है, अपने साथियों के साथ पहुंचता है।
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प्रतिबंधित क्षेत्र में गैर-कानूनी ढंग से घुस कर सभी इस बाघिन का शिकार करना चाहते हैं, मगर खुद शिकार बनने लगते हैं। आधा दर्जन से ज्यादा लोगों की टीम सुंदरबन में कैसे एक-एक कर बाघिन और वहां रहने वाले अन्य बाघों की शिकार बनती है, आप सांस रोक कर देख सकते हैं। निर्देशक के रूप में कमल सदाना की यह पहली फिल्म है। जिसे याद रखा जा सकता है।

सबसे पहले तो वह बॉलीवुड की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ कर सामने आते हैं। उनकी कहानी और कहने की शैली में कसावट है। वे अपनी मेकिंग में लाइफ ऑफ पाई (2012) की भी याद दिलाते हैं। लेकिन सबसे खास यह कि उस हॉलीवुड फिल्म में जहां कंप्यूटर से तैयार बाघ दिखाया गया था, वहीं कमल ने असली बाघों को पर्दे पर पेश किया है।

बाघों को लेकर हिंदी फिल्मों में जो दृश्य अभी तक दुर्लभ थे, वे यहां मौजूद हैं। बाघों को बचाने की चिंता इस फिल्म में आप साफ देख सकते हैं। लेकिन यह किसी डॉक्युमेंट्री के संदेश सरीखी नहीं है। फिल्म बड़ों के साथ बच्चों के लिए भी रोमांचकारी है क्योंकि यहां उन्हें असली बाघ देखने को मिलेंगे।


फिल्म में कहानी थोड़ी और अच्छी हो सकती थी तथा ऐक्टर कुछ बेहतर काम कर सकते थे। फिल्म में दो नायिकाओं के कपड़े गवाही देते हैं कि जिन्हें बाघों की कहानी बांध नहीं पा रही, वे इनकी तरफ आकर्षित हों। यह पक्ष रोर को कमजोर करते हैं। जबकि इसका कैमरावर्क, बैकग्राउंड म्यूजिक, विजुवल इफेक्ट्स तारीफ के काबिल हैं।
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