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Film Review: ठंडा रोमांस, सुस्त कॉमेडी है 'फिल्लौरी'
रवि बुले
Updated Sat, 25 Mar 2017 07:52 AM IST
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फिल्म फिलौरी
कहानी के खाके कैसे भी खींचे जा सकते हैं। अंधविश्वास के मारे लोग किसी को मांगलिक मान कर पेड़ से विवाह करा सकते हैं तो कोई कहानीकार 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड में शहीद हुए आजादी के परवानों को वहां आज भी भूत बने बैठे दिखा सकता है!
फिल्लौरी का काल्पनिक संसार हमारे इतिहास में ऐसी ही अनूठी सेंध लगाता है। यह वर्तमान और अतीत का मिक्स है जिसमें न हंसी आती है, न डर लगता है और न रूमानी भाव जागते हैं। अंत में आप पाते हैं कि कवि कुछ नहीं कहना चाहता। वह तो बस बाजार में अपने ब्रांड-नेम पर लगे दाम से सिर्फ जेब भरना चाहता है। अनुष्का शर्मा ने 2015 में ‘एनएच10’ प्रोड्यूस की थी। जिसमे दो टूक बात थी।
परंतु फिल्लौरी बहकी-बहकी है।
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फिल्लौरी का काल्पनिक संसार हमारे इतिहास में ऐसी ही अनूठी सेंध लगाता है। यह वर्तमान और अतीत का मिक्स है जिसमें न हंसी आती है, न डर लगता है और न रूमानी भाव जागते हैं। अंत में आप पाते हैं कि कवि कुछ नहीं कहना चाहता। वह तो बस बाजार में अपने ब्रांड-नेम पर लगे दाम से सिर्फ जेब भरना चाहता है। अनुष्का शर्मा ने 2015 में ‘एनएच10’ प्रोड्यूस की थी। जिसमे दो टूक बात थी।
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परंतु फिल्लौरी बहकी-बहकी है।
भूतनी बार-बार 98 बरस पीछे फ्लैशबैक में जाती है
अनुष्का शर्मा
शुरुआत कुछ कॉमिक अंदाज में होती है। मांगलिक हीरो करन (सूरज शर्मा) ने जब पेड़ के सात फेरे लिए तो उस पर रहने वाली भूतनी शशि (अनुष्का शर्मा) तार्किक रूप से उसकी दुल्हन बन गई। अब क्या होगा दूल्हे का? होने वाली दुल्हन अनु (मेहरीन परिजादा) के साथ उसकी लवस्टोरी का? भूतनी पीछा छोड़ेगी या नहीं?
सुस्त अंदाज में ठंडे-नीरस जवाब मिलते हैं। न धड़कता रोमांस। न फड़कती कॉमेडी। कल्पना से शुरू कहानी 2017 की जमीन पर उतर आती है और भूतनी बार-बार 98 बरस पीछे फ्लैशबैक में जाती है। जहां शशि छद्म नाम ‘फिल्लौरी’ से कविताएं लिखती है। किसी को उसकी सच्चाई नहीं पता। वह खूब छपती और पढ़ी-सराही जाती है।
गांव में लफंगा टाइप एक गायक है, उसका नाम भी है फिल्लौरी (दिलजीत दोसांज)। लोग समझते हैं कि वह ये कविताएं लिखता है। वह शाबाशियां लूटता है। परंतु एक दिन उससे शशि का सामना होता है और हालात बदल जाते हैं।
सुस्त अंदाज में ठंडे-नीरस जवाब मिलते हैं। न धड़कता रोमांस। न फड़कती कॉमेडी। कल्पना से शुरू कहानी 2017 की जमीन पर उतर आती है और भूतनी बार-बार 98 बरस पीछे फ्लैशबैक में जाती है। जहां शशि छद्म नाम ‘फिल्लौरी’ से कविताएं लिखती है। किसी को उसकी सच्चाई नहीं पता। वह खूब छपती और पढ़ी-सराही जाती है।
गांव में लफंगा टाइप एक गायक है, उसका नाम भी है फिल्लौरी (दिलजीत दोसांज)। लोग समझते हैं कि वह ये कविताएं लिखता है। वह शाबाशियां लूटता है। परंतु एक दिन उससे शशि का सामना होता है और हालात बदल जाते हैं।
रोमांस को लेखक-निर्देशक उभरने नहीं देते
अनुष्का शर्मा
प्यार की कोंपलें फूटती हैं और गायक सुधर जाता है। परंतु धीरे-से दोनों की जिंदगी में ट्विस्ट आ जाता है। यहां सारा जोर अनुष्का-दिलजीत की लव स्टोरी पर है। जबकि उनकी भूमिकाओं का रोमांस छूता नहीं। वहीं सूरज-मेहरीन की कहानी के रोमांस को लेखक-निर्देशक उभरने नहीं देते। उनकी कॉमेडी-ट्रेजडी टुकड़ों में आती और गायब होती है।
भूतनी के रूप में अनुष्का कहीं-कहीं सादगी और नादानी से आकर्षित करती हैं परंतु शशि-रूप में वह भावहीन है। दिलजीत फिल्म में कुछ विशेष नहीं जोड़ते। सूरज का अभिनय किरदार के अनुरूप है, मगर उसे ज्यादा ही कनफ्यूज दिखाया गया है। मेहरीन के लिए बॉलीवुड में यह डीग्लैम और कतई उत्साहित नहीं करने वाली शुरुआत है।
कहानी इतनी फार्मूलाबद्ध और रेडीमेड है कि निर्देशक अंशई लाल ने कुछ बेहतर जोड़ा होगा, यह आभास नहीं होता। गीत-संगीत औसत है। कैमरावर्क अच्छा है। परंतु वह फिल्म पर समय और धन खर्च करने के लिए वाजिब वजह नहीं है।
भूतनी के रूप में अनुष्का कहीं-कहीं सादगी और नादानी से आकर्षित करती हैं परंतु शशि-रूप में वह भावहीन है। दिलजीत फिल्म में कुछ विशेष नहीं जोड़ते। सूरज का अभिनय किरदार के अनुरूप है, मगर उसे ज्यादा ही कनफ्यूज दिखाया गया है। मेहरीन के लिए बॉलीवुड में यह डीग्लैम और कतई उत्साहित नहीं करने वाली शुरुआत है।
कहानी इतनी फार्मूलाबद्ध और रेडीमेड है कि निर्देशक अंशई लाल ने कुछ बेहतर जोड़ा होगा, यह आभास नहीं होता। गीत-संगीत औसत है। कैमरावर्क अच्छा है। परंतु वह फिल्म पर समय और धन खर्च करने के लिए वाजिब वजह नहीं है।