'हैप्पी न्यू ईयर' में हैप्पी करने जैसा कुछ नहीं
शाहरुख खान अपने शुरुआती दिनों से बता रहे हैं कि हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं। यह संदेस बासी हो चुका है और शाहरुख पुराने। लोग भी उतने मासूम नहीं रहे। शाहरुख को कुछ नया करने की सख्त जरूरत है।
'हैप्पी न्यू ईयर' में वे भाषा और अंदाज बदल कर दोहरा रहे हैं कि जिंदगी में दो तरह के लोग होते हैं, लूजर्स (पराजित) और विनर्स (विजेता)। जिंदगी हारने वालों को दूसरा मौका देती है और उसे पहचान कर हारे हुए लोग जीत सकते हैं।
शाहरुख फिल्म में एक मैसेज बार-बार दोहराते हैं कि किस्मत बड़ी कुत्ती चीज है, साली कभी भी पलट सकती है। किस्मत भले ही पलट जाए, परंतु विश्वास कीजिए कि एक बार आपने इस फिल्म को देखने के लिए पैसा खर्च किया तो वह पलट कर जेब में नहीं आने वाला। बल्कि इसे देख कर आपके दिमाग पर जो ताले लग जाएंगे, उन्हें खोलने के लिए आपको मनोरंजन के किसी और साधन पर खर्च करना पड़ेगा।
लंबे-उबाऊ दृश्यों से शुरुआत
'हैप्पी न्यू ईयर' आपको शुरू से अंत तक बोर करने में कोई कसर बाकी नहीं रखती। फिल्म की शुरुआत में शाहरुख और उनकी टीम के इंट्रोडक्शन के लंबे और उबाऊ सीन हैं, जो एक घंटे से भी ज्यादा समय तक चलते हैं।
घंटा भर बाद हीरोइन की एंट्री होती है, जो कतई आकर्षक नहीं है। आप दीपिका को देख कर हैरान रह जाते हैं क्योंकि अपनी पिछली आधा दर्जन फिल्मों में वह जितनी खूबसूरत और ऊर्जावान लगी हैं, इस फिल्म में उतनी ही बेजान।
दीपिका के प्रशंसकों के लिए यह फिल्म बुरी खबर जैसी है। जैसे-जैसे शाहरुख की उम्र बढ़ रही है, उन्हें जवान दिखाने की उतनी ही कोशिशें हो रही हैं। यहां उनके आठ पैक्स आप देख सकते हैं। वैसे ये पैक्स देख कर आपको क्या मिलेगा खुद ही सोचिए।
इंटरवेल के बाद सीटें खाली
फिल्म उल्टे-सीधे ढंग से कलाकारों की शो-रील की तरह शुरू होती है और आप उसमें कहानी ढूंढते रहते हैं। जो किसी कीमत पर आगे बढ़ने का नाम ही नहीं लेती। आप उब के चक्रव्यूह में फंसते जाते हैं और इंटरवेल हो जाता है। जब आप लौट कर सीट पर आते हैं तो पाते हैं कि आजू-बाजू वाले जा चुके हैं।
आगे-पीछे भी कुछ कुर्सियां खाली हो चुकी हैं। फिल्म में सारे कलाकार ओवर ऐक्टिंग का शिकार हैं। खास तौर पर अभिषेक बच्चन। ऐसा लगता है कि बोमन ईरानी के लिए मसाला फिल्मों में एक ही जैसे रोल बचे हैं। उन्हें रंगीला पारसी बनाना सबको आसान लगता है।
सोनू सूद न ढंग से बॉडी दिखा सके हैं और न ऐक्टिंग। नसीरूद्दीन शाह के बेटे विवान ने फिल्म में ऐसा कुछ नहीं किया कि उन्हें याद रखा जाए। सिर्फ स्टारपुत्र होने की वजह से वह फिल्म में हैं।
पिता का बदला और हीरों की चोरी
'हैप्पी न्यू ईयर' एक बेटे (चार्ली उर्फ शाहरुख) द्वारा पिता का बदला लेने की कहानी है। उसके पिता कभी हीरों की सुरक्षा करने वाली तिजोरियां बनाते थे। एक मामले में विलेन (ग्रोवर उर्फ जैकी श्रॉफ) ने उन्हें फंसा दिया। पिता ने जेल में आत्महत्या कर ली।
अब बेटा दोस्तों के साथ मिल कर बदला ले रहा है। ग्रोवर के पास सुरक्षित रखने के लिए दुनिया के नौ नायाब हीरे आ रहे हैं, चार्ली उन्हें चुराना चाहता है।
तिजोरी उसी होटल में रखी है, जिसमें वर्ल्ड डांस कॉम्पीटीशन होना है। अतः चार्ली और उसके दोस्त बार डांसर मोहिनी (दीपिका पादुकोण) से डांस सीखते हैं। प्रतियोगिता में उतरते हैं। हीरे चुराते हैं। प्रतियोगिता भी जीतते हैं। अंततः इंडिया का नाम रोशन करते हैं।
आश्चर्य की बात है कि डांस प्रतियोगिता कथानक का मुख्य हिस्सा होने के बावजूद एकाध गीत को छोड़ कर इसके संगीत में कोई खास असर नजर नहीं आता।
जानिए सबसे कमजोर कड़ी कौन?
फिल्म की सबसे कमजोर कड़ियां इसकी कहानी और फराह खान का निर्देशन है। हैप्पी न्यू ईयर देख कर लगता है कि फराह बुरी फिल्म बनाने के मामले में पति शिरीष कुंदेर और भाई साजिद खान से टक्कर ले रही हैं।
सच यह है कि फराह ने दोनों के लेवल पर उतरने की भरपूर कोशिश की है! फिल्म से आप शाहरुख को निकाल दीजिए तो यह खुद-ब-खुद औंधे मुंह गिर जाएगी। फराह फिल्म में सिर्फ चमक-दमक और तकनीक पर निर्भर नजर आती हैं।
कहानी के नाम पर उन्होंने 1980 के जमाने के फार्मूलों के साथ, शाहरुख की पुरानी फिल्मों के संवादों की मिमिक्री ही कराई है। फिल्म में न ढंग की लव स्टोरी है, न ऐक्शन है, न इमोशन है।
हीरों की चोरी का प्लान देखते हुए लगता है कि टॉम एंड जैसी और मिकी माउस जैसे कार्टून चल रहे हैं। फिर कोई इसे क्यों देखना चाहेगा?
कितने फैन्स बचे अभिषेक के?
अगर आपकी दिलचस्पी वीएफएक्स में है कि कैसे दृश्यों को पर्दे पर चमकदार बनाया जाता है, शूटिंग के बाद दृश्यों में कैसे स्पेशल इफेक्ट्स पैदा किए जाते हैं तो इस फिल्म को देख सकते हैं।
'हैप्पी न्यू ईयर' को दीवाली के जश्न के प्लान में शामिल करेंगे तो निराश होंगे। न तो शाहरुख के फैन्स को 'हैप्पी न्यू ईयर' खुश करेगी और न दीपिका के। अभिषेक के कितने फैन बचे रह गए हैं यह शोध का विषय हो सकता है।
अगर आप फिल्म देखने जाते हैं तो अपनी रिस्क पर जाएं। संभव है कि इस दीवाली पर आपने पैसों को पटाखों के हवाले न किया हो। मगर हैप्पी न्यू ईयर का बम आपकी जेब और वक्त पर भारी पड़ सकता है।
बॉक्स ऑफिस पर शाहरुख के लिए चुनौती
शाहरुख ने इस फिल्म से बहुत उम्मीदें लगा रखी हैं परंतु फिल्म की मार्केटिंग और प्रमोशन जिस तरह से हुआ है, उससे एक तो लोगों को दीवाली तक ढंग से यह मालूम नहीं चला कि फिल्म आ रही है। दूसरे दीवाली के दिन फिल्म रिलीज न करना घाटे का सौदा साबित हो सकता है।
लोग दीवाली में पैसा खर्च कर चुके हैं और बिना टंच मनोरंजन की गारंटी के रिस्क लेना सबके बूते का नहीं है। मल्टीप्लेक्स के चुनिंदा दर्शक ही ऐसा जोखिम उठा सकते हैं। सिंगल स्क्रीन वालों के लिए तो सलमान खान ही ठीक हैं।
इधर, अब त्यौहार का सीजन खत्म होने को है। आखिरी छुट्टियां लोग अपने परिजनों के साथ बिताना चाहते है। अतः बॉक्स ऑफिस इस बार शाहरुख के लिए कड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
निर्माताः गौरी खान
निर्देशकः फराह खान
सितारेः दीपिका पादुकोण, शाहरुख खान, बोमन ईरानी, अभिषेक बच्चन, सोनू सूद, विवान शाह, जैकी श्रॉफ
रेटिंग: दो स्टार (**)