बैंग बैंगः अब देखिए गोलियों की ऋतिक लीला
जरूरी नहीं कि जो दिख रहा हो, वही सच हो। जो चोर दिखता है, वह सिपाही भी हो सकता है। बैंग बैंग में भी कुछ यही है। लोहा लोहे को काटता है, इसलिए चोर को पकड़ने के लिए पुलिस को चोर का भेस धरना पड़ता है।
हकीकत चाहे जो हो, लेकिन सिनेमा के पर्दे पर दुनिया की पुलिस कभी बहुत पोली साबित होती है तो कभी इतनी इंटेलिजेंट की आप हैरान रह जाएं।
सिद्धार्थ आनंद की फिल्म में भारत की इंटेलिजेंस फोर्स बहुत स्मार्ट है। एक बहुत शातिर आतंकी उमर जफर (डैनी) लंदन में पकड़ा गया है। उसकी कस्टडी लेने के लिए सेना का एक अफसर वहां पहुंचा है।
क्या है कहानी
भारत और इंग्लैंड के बीच 72 घंटे में ऐसी प्रत्यर्पण संधि होने वाली है, जिसके तहत एक-दूसरे के यहां पकड़े गए अपराधी को बिना कानूनी सुनवाई के सौंप दिया जाएगा। जफर नहीं चाहता कि संधि हो।
अफसर को मारकर फरार होते ही वह योजना बनाता है कि यदि कोहिनूर हीरा चोरी हो जाए तो दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हो जाएगा और संधि नहीं होगी।
वह चाहता है कि कोहिनूर चुराने वाला कोई भारतीय हो! भारी-भरकम सुरक्षा के बीच हीरा चोरी हो जाता है!! यहां से शुरू होती है बैंग बैंग यानी मार-धाड़, पिस्तौलों-बंदूकों और मशीनगनों से गोलियों की बारिश, तेज-रफ्तार कारों की भाग-दौड़, धरती-आसमान और समुद्र में आग की लपटें।
कैसा है ऐक्शन
ऐक्शन के इन तमाम कंप्यूटर से सुंदर-आकर्षक बनाए गए दृश्यों के बीच कोहिनूर चुराने वाला हीरो राजवीर नंदा (ऋतिक) अपनी हीरोइन हरलीन साहनी (कैटरीना) के साथ बचा रहता है। गोलियों की मूसलाधार के बीच उसका बाल तक बांका नहीं होता। एकाध गोली लगती भी है तो वह खुद आसानी से निकाल लेता है।
उसके स्टंट देख कर लगता है कि वह ‘कृष’ से कम नहीं। इस बीच बैंग बैंग की कहानी कहां जा रही है, उसकी रफ्तार दृश्यों के साथ मिल पा रही है या नहीं, नायक-नायिका के संवाद कितने बेमजा हैं, उनका रोमांस प्लास्टिक के खिलौनों जैसा है, वे अचानक गाना कैसे गाने लगते हैं... वगैरह बातों के बारे में मत सोचिए।
कई बेसिर-पैर की बातें यहां हैं। अगर आपके पास छुट्टियां हैं, कोई काम आपके बगैर नहीं रुक रहा है, जेब में रखा पैसा खर्च होने के लिए मचल रहा है, अगर आप घर और देश की साफ-सफाई से ज्यादा मनोरंजन के लिए बेकरार हैं तो बैंग बैंग देख लीजिए।
शानदार तकनीकी
आपको लगेगा कि जो पाया है, उससे ज्यादा कीमती वह था जो इसके चक्कर में छूट गया। तकनीकी दृष्टि से हमारी फिल्में लगातार उन्नति कर रही हैं। उनमें चौंकाने वाले दृश्य बुने जा रहे हैं। उनके रंग आंखों को ज्यादा सुंदर लगने लगे हैं। लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसा नया कथानक सामने नहीं आ रहा जो जिंदगी को, उसकी धड़कनों को छुए।
बैंग बैंग में भी आप पाएंगे भावनाएं गायब हैं। नकलीपन इतना कि एक बैंक में रिसेप्शनिस्ट का काम करने वाली लड़की ऐसे तड़क-भड़क से रहती है कि लगता है हीरोइन है! आप चौंकते हैं कि यह लड़की नहाने के दृश्य में भी करीने से लिपस्टिक लगाए रहती है!!
बैंग बैंग हॉलीवुड फिल्म ‘नाइट एंड डेज’ का हिंदीकरण है। यह न भी बताया जाए तो काम चल सकता है।
कैसा है अभिनय
फिल्म को सिर्फ इसके ऐक्शन दृश्यों और ऋतिक रोशन के लिए देखा जा सकता है। थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद वे तमाम ऐक्शन दृश्यों में अंधाधुंध गोलियां बरसाते रहते हैं। वैसे इसमें संदेह नहीं कि रफ्तार-रोमांच के दृश्यों में ऋतिक बॉलीवुड के अपने समकालीनों में सर्वश्रेष्ठ हैं। तीनों खान उनके मुकाबले नहीं ठहरते।
हां, अक्षय ही उन्हें कुछ टक्कर दे सकते हैं। कैटरीना फिल्म की कमजोर कड़ी हैं। अभिनय तो उनका कमजोर पक्ष है ही, खराब उच्चारण वाली हिंदी उन्हें और कमजोर बनाती है। फिल्मकार हर कहानी में बता देते हैं कि वह ब्रिटेन, अमेरिका या कनाडा से आई हैं। यह तर्क अब कुतर्क लगने लगा है। डैनी का होना, न होना बराबर है। उनके हिस्से किसी जूनियर आर्टिस्ट जैसा काम आया है। जो उनके कद के कलाकार से अन्याय है।
पवन मल्होत्रा अपनी भूमिका में सटीक हैं। कैमरावर्क और विदेशी लोकेशन खूबसूरत हैं। संगीत याद रखने जैसा नहीं है। सिद्धार्थ आनंद ऐसी फिल्में बनाते रहेंगे तो चलते रहेंगे क्योंकि बॉलीवुड में ज्यादातर काम ऐसा ही हो रहा है।
फॉक्स स्टार स्टूडियोज जैसी विदेशी कंपनियां भारतीय सिनेमा के विकास में कितना योगदान दे सकेंगी, जबकि वे चाहती हैं हॉलीवुड फिल्मों का भारतीयकरण करके बिजनेस किया जाए! वक्त के साथ इस बात का जवाब मिल सकेगा। फिलहाल कोई उम्मीद करना बेमानी है।