10 'बड़ी' फिल्में जो कभी बनीं ही नहीं
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बॉलीवुड ही नहीं हॉलीवुड में भी कुछ बड़ी घोषणाएं ठंढे़ बस्ते में चली जाती हैं। ऐसी ही दस बड़ी फिल्में, जिन्हें विश्व के किसी भी कोने का व्यक्ति देखना चाहेगा पर ये फिल्में शायद ही बन सकें।
फिल्म जगत की कुछ हस्तियों से अगर आप पूछें कि कौन सी ऐसी फिल्म है जो रिलीज़ नहीं हो सकी और जिसे वे पूरी होते हुए देखना चाहते हैं, तो अधिकतर का जवाब होगा- स्टेनली क्युब्रिक की फिल्म नेपोलियन।
काल्पनिक फिल्म 'अ स्पेस ओडिसी' से सिनेमा जगत में अपनी धाक जमाने वाले क्युब्रिक ने 2001 में फ्रांस के सम्राट नेपोलियन के जीवन पर फिल्म बनाने के बारे में सोचा था। उन्होंने इसमें अभिनय करने के लिए जूल्स और जिम स्टार ऑस्कर वर्नर को राजी भी कर लिया था, लेकिन फिल्म की लागत बढ़ने से एमजीएम ने प्रोजेक्ट रद्द कर दिया।
2013 में स्टीवन स्पीलबर्ग ने फ्रांस के टीवी नेटवर्क केनाल प्लस को बताया कि उन्हें उम्मीद है कि वो क्युब्रिक के इस प्रोजेक्ट को टेलीविजन पर दिखा सकेंगे। अब ताजा अफवाह है कि स्पीलबर्ग इसके निर्देशन का जिम्मा बैज लहर्मन को देना चाहते हैं।
अल्फ्रेड हिचकॉक की क्लाइडोस्कोप
माइकलएंजेलो एंटोनियोनी की फिल्म देखने के बाद अल्फ़्रेड हिचकॉक को लगा कि उनकी फिल्में समय से काफी पीछे हैं। उन्होंने नग्नता, हिंसा और सेक्स पर आधारित एक फिल्म बनाने की सोची। इस फिल्म के केंद्र में तीन हत्याएं थी। पहली हत्या किसी झरने के पास, दूसरी लड़ाकू विमान में और तीसरी एक फैक्ट्री में फिल्माई जानी थी।
हालांकि हिचकॉक ने स्टूडियो एमसीए यूनिवर्सल से इसे 10 लाख डॉलर से कम में बनाने का वादा किया था, लेकिन यह फिल्म नहीं बन सकी।
सर्गेई आइजेंस्टाइन की 'एन अमेरिकन ट्रैजडी'
जोसेफ स्टालिन और सोवियत सरकार ने 1920 के दशक में उन्हें 'फॉर्मलिस्ट' (रूपवादी) करार दिया था। इसलिए उन्होंने पश्चिमी यूरोप और अमरीका का रुख किया और अंत में हॉलीवुड पहुंचे। पैरामाउंट पिक्चर्स के प्रमुख जेसी लास्की उनकी फिल्मों के प्रशंसक थे।
वर्ष 1930 में उन्होंने आइजेंस्टाइन को उपन्यास 'एन अमेरिकन ट्रेजेडी' पर फिल्म बनाने के लिए एक लाख डॉलर दिए। छह महीने बाद आइजेंस्टाइन ने एक स्क्रिप्ट पेश की, लेकिन इससे लास्की इस कदर मायूस हुए कि उन्होंने आइजेंस्टाइन से अनुबंध तोड़ दिया।
सर्जो लियोने की लेनिनग्राद
1984 में 'वंस अपॉन अ टाइम इन अमरीका' बनाने के बाद सर्जो लियोने युद्ध को केंद्र में रखते हुए एक फिल्म बनाना चाहते थे। उन्होंने इतिहासकार हैरिसन सेल्सबरी की किताब 'द 900 डेज: द सीज़ ऑफ लेनिनग्राद' पर फिल्म बनाने की योजना बनाई।
लियोने ने इसमें अभिनय के लिए रोबर्ट डी नीरो को चुना जिन्हें एक अमरीकी फोटोग्राफर का किरदार निभाना था, जो लेनिनग्राद पर जर्मन कब्जे के दौरान वहां वर्षों तक फंसा रहा था।
लियोने ने इसके लिए 10 करोड़ डॉलर की रकम की व्यवस्था भी कर ली थी साथ ही सोवियत सरकार को सहयोग के लिए भी राजी कर लिया था। लेकिन 60 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई और इसके साथ ही यह फिल्म भी डिब्बे में बंद हो गई।
विस्कोंटी की 'इन सर्च ऑफ लॉस्ट टाइम
इटली के ये निर्देशक बड़ी फिल्मों के लिए कोई अजनबी नाम नहीं थे। 'दे लेपर्ड' से वह अपनी खास पहचान बना चुके थे। यह साढ़े तीन घंटे की फिल्म थी। उन्होंने प्रोस्ट के सात संस्करणों के उपन्यास 'इन सर्च ऑफ लॉस्ट टाइम' पर फिल्म बनाने का सोचा और इस पर शोध भी किया।
वह इस फिल्म को चार घंटे की बनाना चाहते थे। लेकिन बजट इतना बड़ा था कि इसका इंतजाम नहीं हो सका। बाद में 1970 के दशक में अमरीकी निर्देशक जोसेफ लूसी ने भी इसे स्क्रीन पर उतारना चाहा, लेकिन वह भी नाकाम रहे।
टेरेंस मलिक की 'द मूविगोअर
वर्ष 1978 में ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनाई फिल्म 'डेज ऑफ हेवन' से चर्चा में आए टेरेंस मेलिक अचानक पेरिस चले गए और 1980 के दशक तक कई प्रोजेक्ट्स में हाथ आजमाए।
वॉकर पर्सी के उपन्यास पर आधारित 'मूवीगोअर' एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी जो अपने परिवार और नौकरी को छोड़ देता है और असली जिंदगी के बजाय फिल्मों में सच्चाई ढूंढ़ता है। हालांकि यह फिल्म कभी पर्दे पर नहीं आ सकी।
ऑर्सन वेलेस की 'हार्ट ऑफ डार्कनेस'
वर्ष 1940 में आरकेओ पिक्चर्स ने वेलेस को दो फ़िल्मों को निर्देशित करने की पेशकश इस गारंटी के साथ की कि उन्हें हर हाल में पूरा किया जाएगा। उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि निर्माता उनके काम में दखल नहीं देंगे बशर्ते वे बजट को बढ़ने न दें। उन्होंने पहली फिल्म के रूप में 'हार्ट ऑफ डार्कनेस' को चुना।
इसमें एक सब्जेक्टिव कैमरा का प्रयोग किया गया था, लेकिन प्रोजेक्ट इतना महंगा होता गया कि फिल्म को छोड़ना पड़ा।
वेलेस की 'डॉन क्विक्जोट'
'हार्ट ऑफ डार्कनेस' वेलेस की इकलौती अधूरी फिल्म नहीं थी। एक और फिल्म थी जिस पर 1950 के बाद से उन्होंने कई बार काम करने की योजना बनाई, वह थी 'डॉन क्विक्जोट'।
इस फिल्म के लिए उनके दोस्त ने उन्हें 25 हजार डॉलर की मदद भी की, लेकिन फिल्म पूरी करने के लिए वह और धन की व्यवस्था नहीं कर सके। हालांकि उनकी मौत के बाद इस फिल्म की फुटेज को एक फिल्म महोत्सव में दिखाया गया, जिसमें उनके अलग नजरिए की झलक मिली।
टेरी गिलियम की 'द मैन हू किल्ड डॉन क्विक्जोट'
टेरी गिलियम की इस फिल्म का प्री-प्रोडक्शन 1998 में शुरू हो गया था। जॉनी डेप को इसमें आज के जमाने के मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव की भूमिका निभानी थी, जबकि डॉन क्विक्जोट की भूमिका में फ्रांसिसी अभिनेता ज्यां रॉशफोर्ड को होना था।
वर्ष 2000 में जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई तो रॉशफार्ड की खराब सेहत से शूटिंग रोकनी पड़ी। बाद में इस फिल्म की फुटेज को डॉक्यूमेंट्री के रूप में दिखाया गया तो इसकी खूब तारीफ हुई।
डेविड लिंच की 'रॉनी रॉकेट'
लिंच की 1977 की फिल्म 'इरेजरहेड' से बेहद प्रभावित मेल ब्रुक्स और उनके निर्माता स्टुअर्ट कॉर्नफील्ड ने लिंच से उनके लिए फिल्म बनाने को कहा। लिंच पहले चाहते थे कि वह मूल स्क्रिप्ट से रॉनी रॉकेट को निर्देशित करें, जो कि उन्होंने खुद लिखी थी।
पटकथा एक जासूस पर केंद्रित थी, जो एक ऐसे तीन साल के बच्चे से मिलता है जिसे एक हादसे के बाद हर समय बिजली की सप्लाई देनी होती है। यह लड़का रॉक स्टार बन जाता है और इसका नाम होता है रॉनी रॉकेट। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह एक कॉमर्शियल प्रोजेक्ट नहीं था।