Sudipto Sen Exclusive: मेरे किसी भी सवाल पर आरएसएस नेता गुस्सा नहीं हुए, उनके जवाबों पर मैंने बनाई नॉलेज सीरीज
Sudipto Sen Exclusive: सुदीप्तो मानते हैं कि भारतीय सिनेमा की जो पहचान दुनिया में होनी चाहिए, उसमें वह सिनेमा सबसे बड़ी बाधा है जिसमें भारतीयता सिरे से गायब है। भारतीयता की तलाश ही उन्हें नागपुर लेकर गई और इसी भारतीयता को लेकर वह इस बार कान भी गए।
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विस्तार
निर्देशक सुदीप्तो सेन की फिल्म ‘द लास्ट मॉन्क’ कान फिल्म फेस्टिवल में तब हो आई है, जब इसका इतना हल्ला भी नहीं मचा था। उनकी एक और फिल्म ‘द अदर वेल्थ’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है। हिमालय वह पैदल नाप चुके हैं। भरी जवानी में दिल पर ठोकर खा चुके हैं। उनकी फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ लागत पर मुनाफा कमाने के अनुपात से भारतीय सिनेमा का रिकॉर्ड बना चुकी है और अब वह फिल्म निर्माता भी बन चुके हैं। उनकी फिल्म निर्माण कंपनी सिपिंग टी सिनेमाज की पहली फिल्म ‘चरक’ का इस बार कान फिल्म फेस्टिवल में खूब हल्ला रहा। सुदीप्तो मानते हैं कि भारतीय सिनेमा की जो पहचान दुनिया में होनी चाहिए, उसमें वह सिनेमा सबसे बड़ी बाधा है जिसमें भारतीयता सिरे से गायब है। भारतीयता की तलाश ही उन्हें नागपुर लेकर गई और इसी भारतीयता को लेकर वह इस बार कान भी गए। कान फिल्म फेस्टिवल से लौटने के बाद सुदीप्तो ने एक लंबी बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से, बातचीत का वीडियो लिंक इस इंटरव्यू के आखिर में है, यहां पढ़िए इसके कुछ खास अंश।
कान फिल्म फेस्टिल में इस बार आपकी फिल्म ‘चरक’ का खूब शोर रहा, वजह?
मैं यूरोपीय फिल्म आयोग के न्यौते पर कान गया था, उन्होंने ही मेरी बनाई फिल्म ‘चरक’ की वहां स्क्रीनिंग की। भारत पैवेलियन में हमारी फिल्म का ट्रेलर लॉन्च आदि हुआ। फिल्म देखकर सबसे ज्यादा मेरे पास यूरोप के ही निर्माता और वितरक आए जो सदियों से चली आ रही इस भारतीय परंपरा को देख अचंभित हो गए। फिल्म में दिखाए गए दृश्य ऐसे हैं कि आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि अब तक कोई फिल्मकार वहां तक क्यों नहीं पहुंचा। ये एक तांत्रिक मेला है, जिसकी परंपरा ओडिशा, बिहार और बंगाल में आदि काल से बताई जाती है।
आपने पूरा हिमालय पैदल नापा है। नक्सलियों के इलाके में बरसों रहे है। तकरीबन पूरा देश मथ डाला है, आपको क्या लगता है कि हिंदी सिनेमा में दिक्कत क्या है?
जब तक हमारा सिनेमा ये ‘वुड’, बॉलीवुड, टॉलीवुड, कॉलीवुड आदि में बंटा रहेगा, हम विश्वस्तर पर धमाका नहीं कर पाएंगे। हमारा सिनेमा भारतीय सिनेमा है। मुझे याद है जब फिल्म ‘प्रोफेट’ रिलीज हुई तो डिस्कवरी चैनल के अमेरिका कार्यालय में मुझसे पूछा गया कि इस्लाम पर फिल्म है, ईसाई धर्म पर फिल्म है, पर हिंदू धर्म पर आज तक कोई फिल्म क्यों नहीं बनी? कैसे जानेंगे लोग इसके बारे में?
फिर आपने क्या किया?
मैं उस बंगाल से हूं जहां धर्म के बारे में बात करना ही मना है। बचपन मेरा नक्सलबाड़ी आंदोलन के बीच गुजरा। मैं अमेरिका से लौटा तो मुझे मुंबई में बताया गया कि हिंदू धर्म की मीमांसा कठोपनिषद में मिलती है और इसके जानकार मुझे नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय में मिल सकते हैं। बस मैं रेशम बाग पहुंच गया। वहां मुझे रवींद्र शर्मा के बारे में पता चला, जिन्होंने मुझे मनमोहन वैद्य के बारे में बताया तो मैं उनसे मिलने चेन्नई चला गया।
तो मिली वह जानकारी जिसकी आप खोज में थे?
मनमोहन वैद्य के साथ मैंने आधा हिंदुस्तान घूम लिया। उन्होंने मार्क्सवाद, लेनिनवाद जैसे सारे विषयों पर बात की, बस कठोपनिषद नहीं बताया। तो मैंने उनसे सवाल करने शुरू किए। मै डर रहा था कि मेरे सवालों से वह नाराज हो सकते हैं। उनकी प्रतिक्रिया के बारे में सोचकर ही मैं डर रहा था। लेकिन, उन्होंने और उसके बाद मिले दूसरे तमाम आरएसएस पदाधिकारियों ने जिस तरह मेरे सवालों को और मुझे गले लगाया, उसने मुझे इस संगठन पर एक ‘नॉलेज सीरीज’ बनाने के लिए प्रेरित किया। ये सीरीज आप आरएसएस के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं।
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हां, फिल्में तो आप खूब पहले से बनाते रहे हैं। आपकी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘द अदर वेल्थ’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। ‘द लास्ट मॉन्क’कब की कान हो आई? अब ‘केरल स्टोरी’ की कामयाबी ने क्या कुछ बदला है?
इस फिल्म ने अपनी लागत की 13 गुना कमाई की जो किसी हिंदी फिल्म के लिए रिकॉर्ड है। शुक्रवार को सात सौ स्क्रीन्स से शुरू हुई फिल्म सोमवार को दो हजार स्क्रीन्स के ऊपर निकल गई थी। फिल्म का कलेक्शन शुक्रवार से ज्यादा, सोमवार को था। इस सफलता ने मुझे भारतीयता दिखाने वाली फिल्में बनाने की ताकत दी। मैंने जो ‘केरल स्टोरी’ में पाया वह सब ‘चरक’ में लगा दिया है और आगे भी मैं ऐसी ही फिल्में बनाता रहूंगा। सिनेमा से कमाकर सिनेमा में ही लगाता रहूंगा।
सिनेमा में अपने समय के समाज का दिखना कितना जरूरी मानते हैं आप?
बहुत जरूरी है ये और इस पर सबको ध्यान देना चाहिए। एक अच्छी भली चलती हिंदी फिल्म में एकाएक कोई पंजाबी या गुजराती गाना डाल देने से इसकी प्रामाणिकता पर चोट पहुंचती है। जबर्दस्ती पंजाबी घुसाने से ही हिंदी सिनेमा इस हाल में है। इस सोच ने ही हमारी दृष्टि बाधित कर दी है। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन कोई किरदार वहां का हो और ऐसा कुछ हो रहा हो तो ठीक है, लेकिन यूपी की कहानी में हीरो क्यों गाए पंजाबी गाना? और, बंगाली क्यों नहीं गा सकता फिर?
मेरा मानना है कि बंटवारे से पहले या उसके बाद पश्चिमी पाकिस्तान से आए परिवारों का ही हिंदी सिनेमा में वर्चस्व रहा, पूर्वी पाकिस्तान से आए लोगों का कुछ हुआ नहीं?
ये बहुत बड़ा मुद्दा उठाया है आपने पंकज जी। आपको पता है, पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए लाखों हिंदू बंगाली परिवारों को शरणार्थियों का जीवन बिताना पड़ा है। लेकिन, ये मुद्दा कभी राष्ट्रीय मुद्दा बना ही नहीं। ऋत्विक घटक जैसे बांग्ला फिल्मकारों ने इस मुद्दे को लगातार उठाया भी, पर मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा ने पूरब की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया जितना पंजाब के दो टुकड़े होने पर पश्चिमी पाकिस्तान से आए लोगों पर दिया है।
भारत को विश्वगुरु बनाने में भारतीय सिनेमा की ‘सॉफ्ट पॉवर’ क्या योगदान दे सकती है?
सबसे पहले तो उन लोगों को सिनेमा में लाना जरूरी है जो भारत को जानते हैं, इसकी मिट्टी की सुगंध पहचानते हैं। देश की बुनियादी हकीकत जानने वाले ही इस देश के लिए वैसा सिनेमा बना सकते हैं जिसके आगे पूरी दुनिया नतमस्तक हो। सिनेमा भावनाओं की अनुभूति है जिसने भारत को कभी महसूस ही नहीं किया वह भारतीय सिनेमा कैसे बनाएगा? भारत की अनुभूतियां बड़े परदे पर आएंगी तभी भारत विश्व गुरु बनेगा, सिर्फ अखबारों की हेडलाइंस से ऐसा होने वाला नहीं।
ये पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं।