Yeh Kaali Kaali Ankhein Review: नेटफ्लिक्स की ‘मिर्जापुर’ बनाने की नाकाम कोशिश, ये हैं पांच कमजोर कड़ियां

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Fri, 14 Jan 2022 04:47 PM IST
ये काली काली आंखें
ये काली काली आंखें - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
ये काली काली आंखें
कलाकार
ताहिर राज भसीन , आंचल सिंह , सौरभ शुक्ला , ब्रजेंद्र काला , अनंत जोशी , श्वेता त्रिपाठी , सूर्या शर्मा और अरुणोदय सिंह
लेखक
अनाहता मेनन , सिद्धार्थ सेनगुप्ता और वरुण बडोला
निर्देशक
सिद्धार्थ सेनगुप्ता
निर्माता
ज्योति सागर
रेटिंग
2/5
शेक्सपीयर की मशहूर रचना ओथेलो की लाइन ‘फॉर शी हैज आईज एंड चोज़ मी’ से शुरू होने वाली नेटफ्लिक्स की नई टेम्पलेट सीरीज ‘ये काली काली आंखें’ ऐसे समय में रिलीज हुई है जब उत्तर प्रदेश में गैर यादव पिछड़ों के नेताओं ने अगड़ी जातियों के नेताओं से सम्मान न मिलने को मुद्दा बनाकर राजनीतिक भूचाल ला रखा है। उत्तर प्रदेश में ‘काम बोलता है’ का नारा लगाने वाले नेता भी जब विरोधियों को उन्हीं के दांव से चित्त करने निकल पड़ें और सेहत, शिक्षा, नौकरियों के मुद्दे सब हाशिये पर चले जाएं तो फिर सब कुछ ‘ये काली काली आंखें’ ही हो जाता है। समझ आता है कि सुरमा लोग आंखों में सिर्फ अपनी आंखें सजाने के लिए ही नहीं बल्कि दूसरी की आंखों में धूल झोंकने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। बस वेब सीरीज ‘ये काली काली आंखें’ बनाने वालों में कोई ढंग का ऐसा राइटर नहीं है जिसे यूपी की पॉलीटिक्स का ये च्यवनप्राश पता हो।
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ये काली काली आंखें
ये काली काली आंखें - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
‘ये काली काली आंखें’ की पहली कमजोर कड़ी इसकी गोरखपुरिया कहानी है। कुछ कुछ हरिशंकर तिवारी टाइप का नेता है अखिराज। मामला यूपी का है तो सारी गाड़ियां भी यूपी के नंबर की हैं। शहर का नाम नेटफ्लिक्स ने ओंकारा कर दिया है। लेकिन जगह का नाम ओंकारा कर देने से अगर सीरियल ओंकारा फिल्म जैसा बन जाता तो बात ही क्या थी। यहां बनाने वालों के पास एक उनको लगने वाला धांसू आइडिया है। आइडिया यही है कि एक पंडित नेता की इकलौती बेटी का अपने पिता के अकाउंटेंट के इकलौते बेटे पर दिल आ गया है। वह भी बचपन से। जब लड़का सात साल का था। लड़की का ये पागलपन क्यों है, किसी को नहीं पता। वह बाहर पढ़ने क्यों चली गई, ये भी किसी को नहीं पता। लौटकर आई तो उसके स्वीमिंग पूल से निकलते समय दोनों फिर टकराते हैं। लड़का अच्छा भला इंजीनियरिंग की नौकरी पा चुका है। पिताजी के कहने पर नेताजी से मिलने आता है। बिटिया के कहने पर नेताजी उसकी आंख के तारे को लाख रुपये की नौकरी दे देते हैं। लड़का मना करता है तो लगता है कि आगे चलकर वह अमिताभ बच्चन बनेगा। लेकिन, लड़की ने जरा सी चाभी कसी नहीं कि वह ताहिर राज भसीन निकलता है।

ये काली काली आंखें
ये काली काली आंखें - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नेटफ्लिक्स की भारतीय टीम हर साल अपने ग्राहकों का साल का पहला महीना जरूर खराब करती है। इस बार भी उनको बोहनी ऐसी ही है। ताज्जुब की बात ये है कि ताहिर राज भसीन की आगे पीछे दो सीरीज ओटीटी पर रिलीज हुईं। दोनों में वह लीड रोल में हैं और दोनों में कहानी दिखाई कम, सुनाई ज्यादा जाई रही है। सीरीज की दूसरी कमजोर कड़ी बने ताहिर राज भसीन के लिए ये खतरे की घंटी होनी चाहिए थी, पर उन्होंने शायद सुनी नहीं। वेब सीरीज ‘ये काली काली आंखें’ से ये भी पता चलता है कि कमाल की विदेशी सीरीज बनाने वाले इस ओटीटी को अब भी भारत के लिए कुछ कायदे के क्रिएटिव लोग मिलना बाकी हैं। ये सीरीज बनाने वाली टीम ने भी शायद यूपी की राजनीति को कभी न देखा न पढ़ा और इतनी बेढंगी सीरीज बना डाली।

ये काली काली आंखें
ये काली काली आंखें - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वेब सीरीज ‘ये काली काली आंखें’ औसत सी सीरीज है, औसत सी कहानियां देखकर टाइमपास करने वालो के लिए। इसमें दिल बाग बाग कर देने जैसा कुछ नहीं है। हीरो का किरदार इतना कमजोर लिखा गया है कि तीसरे एपीसोड तक आते आते दर्शक का मन उसे चपत लगाने का करने लगता है। इतने कमजोर और कायर लड़के तो यूपी के किसी जिले के नहीं होते। हो सकता है कि नेटफ्लिक्स वाले कहानी का असली पोटाश दूसरे सीजन के लिए बचा के रखे हों, लेकिन सच ये भी है कि नेटफ्लिक्स की किसी हिंदी सीरीज का दूसरा सीजन बनेगा ही, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता।

ये काली काली आंखें
ये काली काली आंखें - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
प्रबंधन में भारी फेरबदल के बाद भी नेटफ्लिक्स का कॉन्टेंट नहीं बदला है। ऑल्ट बालाजी के लिए ‘अपहरण’ बनाने वाले सिद्धार्थ सेनगुप्ता इससे पहले टीवी के लिए ‘बालिका वधू’ बना चुके हैं। राइटिंग उनकी टीवी सीरीयल जैसी ही है। यही इस सीरीज की तीसरी कमजोर कड़ी है। सिद्धार्थ की दिक्कत ये है कि वह कभी भी कुछ भी कहानी में डाल सकते हैं। लेकिन, यहां उनको ध्यान ये रखना चाहिए कि टीवी सीरियल के दर्शकों जैसे दिलदार ओटीटी के दर्शक नहीं होते और कोई सीरीज ऐसे फालतू से सस्पेंस पर लाकर भी दूसरे सीजन के लिए नहीं छोड़ी जाती कि दर्शक को पूरे आठ एपोसीड देखना बेकार लगने लगे।

ये काली काली आंखें
ये काली काली आंखें - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कलाकारों के डिपार्टमेंट में सीरीज आंचल सिंह के नाम है। वही इस पूरी सीरीज में करंट बनाए रखने में कामयाब रही हैं। ताहिर राज भसीन को इतना बचकाना किरदार करने की जरूरत अपने करियर के शुरूआत में थी नहीं। ‘रंजिश ही सही’ के बाद ये दूसरी बड़ी गलती  उन्होंने अपने करियर में की है। श्वेता त्रिपाठी सीरीज की चौथी कमजोर कड़ी हैं। उनको शूटिंग में किसी शोपीस की तरह इस्तेमाल किया गया है। जब जी चाहा, वहां सजा दिया गया। एक दुर्दांत ब्राह्मण राजनीतिज्ञ के रूप में सौरभ शुक्ला का काम कमाल है। हां, वह गाली देते हुए बचकाने से लगते हैं। उससे बेहतर और ज्यादा डरावने संवाद हिंदी सिनेमा के खलनायकों ने बिना गाली दिए हुए बोले हैं। धर्मेंश का रोल करने वाले सूर्या शर्मा ओवरएक्टिंग का शिकार हैं। अनंत जोशी जब भी परदे पर आते हैं, सीन महका जाते हैं। ब्रजेंद्र काला और सुनीता राजवर की जोड़ी ठीक है लेकिन वेब सीरीज बनाने वालों को सहायक कलाकारों के तौर पर नए लोग भी अब लाने चाहिए।

ये काली काली आंखें
ये काली काली आंखें - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, ‘ये काली काली आंखें’ की पांचवीं कमजोर कड़ी है इसकी तकनीकी टीम। फिल्म की गीत संगीत पक्ष आज के युवाओं के हिसाब से बनाने के चक्कर में सीरीज न तो ‘मिर्जापुर’ चाहने वालों को समझ आती है और न ही ‘सैक्रेड गेम्स’ का पहला सीजन पसंद करने वालों को। सीरीज की शुरुआत लेह के किसी सुनसान इलाके से होती है। फिल्म इसके बाद तमाम भारत दर्शन कराकर वापस यहीं आती है। सिनेमैटोग्राफी इसकी इस मामले में ठीक है लेकिन इसकी कलर स्कीम अगर प्राकृतिक ही रहने दी जाती तो मामला और नयनाभिराम हो सकता था। वीकएंड पर देखने को इस बार प्राइम वीडियो पर हिंदी में ‘पुष्पा पार्ट वन’ मौजूद है, उसके सामने ‘ये काली काली आंखें’ पसंघा भर भी नहीं है।
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