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Kaala Paani Review: अंडमान के कैनवस पर रचा कमाल का सरवाइवल ड्रामा, विश्वपति, समीर और अमित की नई तीरंदाजी

Wed, 18 Oct 2023 05:22 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 18 Oct 2023 05:22 PM IST
सार

दर्शकों को कहानी के मर्म के साथ जोड़ना और फिर उन्हें उतनी ही बेचैनी महसूस कराना जितनी बेचैनी कहानी के किरदार जिंदा रहने के लिए महसूस कर रहे हैं।

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Web Series Kaala Paani Review by Pankaj Shukla Biswapati Sarkar Sameer Saxena Ashutosh Gowariker Amey Wagh
काला पानी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
काला पानी
कलाकार
आशुतोष गोवारिकर , मोना सिंह , सुकांत गोयल , अमेय वाघ , आरुषि शर्मा , चिन्मय मांडलेकर , राजेश खट्टर और वीरेंद्र सक्सेना
लेखक
विश्वपति सरकार और अमित गोलानी
निर्देशक
समीर सक्सेना और अमित गोलानी
निर्माता
पोशम पा पिक्चर्स
रिलीज:
18 अक्तूबर 2023
रेटिंग
3/5

विस्तार

नेटफ्लिक्स की भारत में किस तरह की ब्रांडिंग है, ये समझना हो तो इसे देखने वाले दर्शकों की जो डाटा एनालिसिस इस कंपनी में होती है, उस पर गौर करना चाहिए। लाख कमाल की फिल्में इस ओटीटी पर हों, लेकिन क्या आपको पता है कि भारतीय दर्शकों द्वारा सबसे ज्यादा देखी जाने वाली दो फिल्में इस प्लेटफॉर्म की कौन सी हैं? ये फिल्में ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘लस्ट स्टोरीज 2’। फिल्म ‘खुफिया’ की भी खूब तारीफ इसकी कहानी और इसमें तब्बू व अजमेरी हक आदि के अभिनय की हो रही है लेकिन, लोग फास्ट फारवर्ड करके बार बार देख रहे हैं, वामिका गब्बी के सीन। इस ओटीटी की ग्राहकी खरीदने वाले दर्शक मोटी रकम हर महीने खर्च करते हैं। और, इन ग्राहकों के लिए ‘काला पानी’ जैसी सीरीज बनाना भी कम से कम उन लोगों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है, जिन्हें लोगों की पतंग सद्दी से काट देने में महारत हासिल है।
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काला पानी - फोटो : अमर उजाला
बेचैन कर देने वाला सरवाइवल ड्रामा
वेब सीरीज ‘काला पानी’ सरवाइवल ड्रामा है। ऐसे विषयों पर बनी फिल्म ‘मिशन रानीगंज’ हाल ही में बड़े परदे पर रिलीज हुई है। इस तरह की कहानियां विदेशी सिनेमा में खूब बनती हैं। कभी कोई बर्फीली वादियों की किसी खाई में फंसा दिखता है, कभी किसी ऊंची इमारत में लगी आग से बचने की चुनौती है तो कभी पूरा का पूरा शहर अपना वजूद खोने को होता है। सरवाइवल ड्रामा की पहली चुनौती है दर्शकों को कहानी के मर्म के साथ जोड़ना और फिर उन्हें उतनी ही बेचैनी महसूस कराना जितनी बेचैनी कहानी के किरदार जिंदा रहने के लिए महसूस कर रहे हैं। विश्वपति सरकार, समीर सक्सेना और अमित गोलानी कॉमेडी के मास्टर हैं। उनके रचे किरदारों पर बनी वेब सीरीज के नए नए सीजन बनाकर टीवीएफ वाले अब भी माल बटोर रहे हैं, इधर तीनों ने टीवीएफ छोड़कर जबसे नई कंपनी खोली है, ये अपनी मूलभूत पहचान से हटकर कुछ करना चाह रहे हैं। और, कोरोना के ठीक बाद के समय में कोई तीन साल आगे घटती कहानी में काफी कुछ कहा भी है। 

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काला पानी - फोटो : अमर उजाला
भविष्य में फैली संक्रामक बीमारी
वेब सीरीज ‘काला पानी’ की कहानी समंदर से घिरे टापू अंडमान निकोबार की है। बड़ा पर्यटन स्थल है। छुट्टियों के मौसम में दुनिया भर के लोग यहां इकट्ठे होते हैं। टापू की अपनी असली पहचान बदल रही है। आदिवासी अपनी ही जमीन और जंगलों में अब देखने की चीज बनते जा रहे हैं। और, प्रकृति अपने साथ होने वाली नाइंसाफी को बहुत लंबे समय तक अनदेखा करती नहीं है। आबादी जरूरत से ज्यादा बढ़े तो उसे कम करने का उसका अपना तरीका है। लालच हद से ज्यादा बढ़े तो उसे भी भी ठीक करने का प्रकृति का अपना तरीका है। यहां कहानी का सूत्र एक बीमारी है। जैसा कि आमतौर पर होता ही है और कोरोना के दौरान भी लोगों ने देखा ही कि जब कोई डॉक्टर किसी बड़ी आफत की तरफ इशारा करता है तो लोग उसे पागल समझते हैं। और, फिर जब उसकी कही बात सच साबित होनी शुरू होती है। लोग उसकी बताई बातों पर गौर करना शुरू करते हैं तब तक देर हो चुकी होती है।  

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काला पानी - फोटो : अमर उजाला
उम्दा लेखन, कसा हुआ निर्देशन
विश्वपति सरकार ने टीवीएफ के दिनों के अपने साथियों समीर सक्सेना और अमित गोलानी के साथ मिलकर वेब सीरीज ‘काला पानी’ में एक ऐसी कहानी रची है, जिसे दर्शकों ने दो साल पहले ही काफी कुछ महसूस भी किया है। दर्शकों का इस कहानी से ये वास्ता इसलिए भी बनता है क्योंकि इस सीरीज में इसे बनाने वालों ने सिर्फ कहानी पर दांव खेला है। कहानी का विस्तार विशाल और साथ में तमाम क्षेपक कथाएं भी हैं। वायरस के पता चलने के बाद से लेकर इसके संक्रामक रूप अख्तियार करने, लोगों को क्वारंटाइन करने की कोशिशों में बाधाएं आने, बचाव कार्य में लोगों की हैसियत के भी सामने आने से लेकर सामूहिक दाह संस्कार जैसे तमाम किस्से इसकी लेखन टीम ने बहुत चतुराई पिरोए हैं। इन दृश्यों को देखकर दर्शकों की कहानी में उत्सुकता भी बनती है और बहुत कुछ ऐसा भी एहसास होता है कि हम जो कुछ कर रहे होते हैं, उसका कुछ न कुछ परिणाम प्रकृति भी हमारे लिए सोचती रहती है। सीरीज का डायरेक्शन बढ़िया है। सिनेमैटोग्राफी उम्दा है। संपादन शायद थोड़ा सुस्त हैं क्योंकि ट्रॉली साइकोलॉजी जैसे कुछ सीन जरूरत से ज्यादा लंबे हैं। औसतन घंटे घंटे भर के सात एपिसोड थोड़े धीरज के साथ एक एक करके हफ्ते भर में देखे जा सकते हैं। 

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काला पानी - फोटो : अमर उजाला
मोना, आशु और अमेय की अद्भुत अदाकारी
वेब सीरीज ‘काला पानी’ में गिनती के कलाकार ही नामचीन हैं और बाकी तमाम कलाकार ऐसे हैं जो सिर्फ अपने काम से अपना नाम बनाते नजर आ रहे हैं। उपराज्यपाल के तौर पर आशुतोष गोवारिकर की वापसी सीरीज का आधार बनाने का काम करती है। वह ऐसे प्रशासक हैं जिन्हें चिकित्सकों पर विश्वास तो है लेकिन वह कॉरपोरेट लॉबी से भी घिरा हुआ है। मुख्य सचिव उसका वैसा ही अफसर है जो हर हाल में खुद को सेफ रखना चाहता है। वापस दिल्ली जाने को बेकरार पुलिस अफसर के रूप में अमेय वाघ का काम गौर करने लायक है। वह थियेटर के कलाकार हैं और उनकी भाव भंगिमाएं बताती हैं कि सिचुएशन के हिसाब से अपने देह भाषा और चेहरे के भाव बदलने में उन्हें महारत हासिल है। मोना सिंह का किरदार कहानी का उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) है। और, मानवीय संवेदनाएं जगाए रखने की जिम्मेदारी सीरीज में आई है विकास कुमार के जिम्मे। अपने बेटे को मनाने की कोशिश करते पिता के रूप में जब वह बोलते हैं, ‘पापा लोग थोड़ा अनट्रेंड होते हैं’ तो कलेजा कचोट आता है। आरुषि शर्मा, चिन्मय मांडलेकर और सुकांत गोयल ने भी अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं हालांकि उनके किरदार काफी तय खांचे के हैं। 

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