‘याद्दाश्त जाने पर भी मेरा नाम सुनकर रिएक्ट करते थे’, विशाल भारद्वाज ने बशीर बद्र के साथ अपने रिश्ते पर की बात
Vishal Bhardwaj Remembers Bashir Badr: विशाल भारद्वाज ने बशीर बद्र के साथ अपने रिश्ते पर बात की। उन्होंने बताया कैसे बशीर साहब ने उन्हें संगीतकार बनने की ओर प्रोत्साहित किया…
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निर्माता-निर्देशक विशाल भारद्वाज दिग्गज दिवंगत शायर बशीर बद्र के काफी करीब रहे हैं। हाल ही में बशीर बद्र के निधन के बाद विशाल भारद्वाज ने उनके साथ अपने संबंधों के बारे में बात की। विशाल ने बताया कि डिमेंशिया के चलते उनकी याददाश्त काफी हद तक मिट गई थी, लेकिन फिर भी मेरा नाम सुनकर वो प्रतिक्रिया देते थे।
मेरा नाम सुनकर देते थे प्रतिक्रिया
विशाल भारद्वाज पर बशीर बद्र की कविताओं का इतना गहरा प्रभाव था कि उन्हें आज भी वह पहला शेर याद है जो उन्होंने इतने साल पहले सुना था। ये शेर था- ‘ये एक पेड़ है, आ इससे मिल के रो ले हम, यहां से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं। पीटीआई से बातचीत में विशाल ने कहा कि जब भी मैं उनका हालचाल जानने के लिए फोन करता, उनके बेटे तैयब और राहत आपा (बद्र की पत्नी) मुझे बताते कि वो अब भी मेरा नाम सुनकर प्रतिक्रिया देते हैं।
मुझे याद है जब हमें पता चला कि उन्हें डिमेंशिया है, तो हम बहुत रोए थे। 2010 में उन्होंने कई दिनों तक बोलना बंद कर दिया था और एक दिन मैं एक शेर भूल गया था। मैंने कहा, 'मेरा दिमाग भी धड़कता है मेरे दिल की तरह...' और उनसे पूछा, 'डॉक्टर साहब, मुझे अगली पंक्ति याद नहीं आ रही' और उन्होंने अचानक कहा, 'मिटा दिए हैं फासले सब मोहब्बत ने'।
बशीर बद्र को पिता की तरह मानता हूं
विशाल भारद्वाज ने स्वतंत्र रूप से बशीर बद्र की कई गजलों का संगीत तैयार किया है और उन्हें रिलीज किया है। इनमें हाल ही में ‘मैं घना अंधेरा हूं’ शामिल है। उन्होंने कहा कि मेरे जीवन में कविता का सफर मेरे व्यक्तित्व, मेरी रचनात्मकता का सबसे मजबूत हिस्सा है।
मेरा संगीत मेरी कविता की वजह से है। मेरी फिल्में मेरी कविता की वजह से हैं। मेरे पिता भी कवि थे। मैं बशीर बद्र और गुलजार को अपने दूसरे माता-पिता के समान मानता हूं। उन्होंने मुझे संवारा है। मुझे बहुत खुशी है कि मेरे जीवन में उनका इतना प्रभाव रहा।
मेरठ से हुई थी बशीर बद्र और विशाल की दोस्ती की शुरुआत
अपनी दोस्ती को याद करते हुए विशाल ने बताया कि इसकी शुरुआत मेरठ में हुई, जहां बशीर बद्र रहते और पढ़ाते थे। उनकी बेटी और विशाल की बहन क्लासमेट थीं। सिंगर-संगीतकार ने कहा कि उस समय मेरी याददाश्त बहुत तेज थी, मैं आसानी से कविताएं याद कर लेता था। मैं हर वीकेंड डॉक्टर साहब से मिलने लगा। वे मुझे अपनी नई-नई कविताए पढ़कर सुनाते थे।
फिर एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, 1987 में उनका घर जलकर राख हो गया। उनकी अधिकांश नई कविताएं घर के साथ ही जल गईं। हम लोग इतने बुरे हैं कि कवियों के घर जला देते हैं। इसी समय के आसपास उन्होंने ने अपनी पहली पत्नी को भी खो दिया था।
मुझे उनकी बताई हुई 90 प्रतिशत बातें याद थीं। वे मुझसे उन दोहों के बारे में पूछते थे और मैं उन्हें सुना देता था। मैंने उन्हें कम से कम 90 प्रतिशत कविताएँ याद करने में मदद की, इसमें एक साल लग गया।
बशीर बद्र ने ही मुझमें संगीतकार की प्रतिभा पहचानी
विशाल भारद्वाज को एक संगीतकार के रूप में प्रोत्साहित करने में बशीर बद्र की बड़ी भूमिका है। विशाल ने बताया कि उन्होंने ही सबसे पहले मुझमें छिपे संगीतकार को पहचाना था। मैं उन दिनों एक संगीतकार था और उन्होंने मुझमें उस प्रतिभा को पहचाना। मुझे साहित्य में कोई दिलचस्पी नहीं थी। मैं पढ़ाई में बहुत कमजोर था।
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरा शेक्सपियर से कोई संबंध होगा। लेकिन गुलजार और बशीर बद्र की कोई भी किताब खोलिए, मैं पूरा पन्ना सुना सकता था। इन दोनों कवियों के बारे में मुझे इस तरह याद था।
जब मैं भोपाल में ‘मकबूल’ की शूटिंग कर रहा था, तो वो यहां आकर मेरे ही परिवार के साथ रहते थे। जब मैं मुंबई आया, तो वो मेरे घर आकर रुकते थे। गुलजार साहब और उनके साथ बिताए कई पल हमारे पास हैं। दोनों एक-दूसरे के काम के बड़े फैन थे।
विशाल भारद्वाज 4 जून को भोपाल के रवींद्र भवन में बशीर बद्र की याद में होने वाले कार्यक्रम में शामिल होंगे। वर्कफ्रंट की बात करें तो विशाल भारद्वाज के निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म इसी साल रिलीज हुई ‘ओ रोमियो’ है।
इसमें शाहिद कपूर, तृप्ति डिमरी, अविनाश तिवारी और नाना पाटेकर प्रमुख भूमिका में हैं। फिल्म को क्रिटिक्स और दर्शकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया ही हासिल हुई थी। वहीं बॉक्स ऑफिस पर भी फिल्म कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई।