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शक्ति कपूर की आपबीती, पहला हवाई सफर था, मगर प्लेन में बार-बार जेब का ख्याल...
टीम डिजिटल / अमर उजाला
Updated Sun, 03 Dec 2017 03:37 PM IST
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यूनिट के सारे लोग मुंबई से कई घंटों का सफर तय कर लंदन पहुंचे थे। सफर के दौरान एक बात बुरी तरह मेरे दिलो-दिमाग पर छाई हुई थी। हवाई सफर के दौरान बार-बार अपनी जेब का ध्यान आता था। मेरी जेब में मात्र सात डॉलर थे।
मैं बचपन में बहुत शरारती था। अपने चार भाई-बहनों में मैं दूसरे नंबर का था और उन तीनों से सबसे ज्यादा परेशान अपने माता-पिता को मैं ही करके रखता था। अपनी शरारतों के कारण तीन स्कूलों से निकाला भी गया था। फिर जब बड़ा हुआ, तो सबको यह चिंता थी कि मैं जीवन में करूंगा क्या? स्पोर्ट्स कोटे से किरोड़ीलाल कॉलेज में दाखिला मिल गया। कॉलेज में अपने दोस्तों के साथ पिताजी की गाड़ी लेकर इधर-उधर घूमता रहता था। पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता था।
पिताजी चाहते थे कि मैं उनके बिजनेस को ही संभाल लूं, लेकिन मैं टूर एंड ट्रैवल का बिजनेस करना चाहता था। इन सबको लेकर पिताजी और मेरे बीच कई बार झगड़े भी हुए। कॉलेज के बाहर एक दुकान से अक्सर सिगरेट लिया करता था। वह दुकान वाला मुझे अक्सर मॉडलिंग करने की सलाह दिया करता था, फिर मुझे भी लगा कि मैं मॉडलिंग कर सकता हूं। मैंने पहला ऐड सूर्य बंशी सूटिंग्स के लिए किया। मुझे 150-300 रुपये मिला करते थे, जो मैं सिगरेट और शराब पीने में खर्च कर दिया करता था।
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इसी दौरान कुछ दोस्तों ने सुझाव दिया कि मुझे फिल्मों में ट्राई करना चाहिए। उन्होंने एफटीआईआई में अपना फॉर्म भरा और उसके साथ ही मेरा फॉर्म भी भर दिया। मेरा टेस्ट हुआ और ऑडिशन के लिए मेरे दोस्तों ने ही मेरी तैयारी करवाई। मेरा सेलेक्शन भी हो गया, लेकिन उन दोस्तों का नहीं हो पाया। बस यहीं से आगे सफर शुरू हो गया।
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मैं बचपन में बहुत शरारती था। अपने चार भाई-बहनों में मैं दूसरे नंबर का था और उन तीनों से सबसे ज्यादा परेशान अपने माता-पिता को मैं ही करके रखता था। अपनी शरारतों के कारण तीन स्कूलों से निकाला भी गया था। फिर जब बड़ा हुआ, तो सबको यह चिंता थी कि मैं जीवन में करूंगा क्या? स्पोर्ट्स कोटे से किरोड़ीलाल कॉलेज में दाखिला मिल गया। कॉलेज में अपने दोस्तों के साथ पिताजी की गाड़ी लेकर इधर-उधर घूमता रहता था। पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता था।
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पिताजी चाहते थे कि मैं उनके बिजनेस को ही संभाल लूं, लेकिन मैं टूर एंड ट्रैवल का बिजनेस करना चाहता था। इन सबको लेकर पिताजी और मेरे बीच कई बार झगड़े भी हुए। कॉलेज के बाहर एक दुकान से अक्सर सिगरेट लिया करता था। वह दुकान वाला मुझे अक्सर मॉडलिंग करने की सलाह दिया करता था, फिर मुझे भी लगा कि मैं मॉडलिंग कर सकता हूं। मैंने पहला ऐड सूर्य बंशी सूटिंग्स के लिए किया। मुझे 150-300 रुपये मिला करते थे, जो मैं सिगरेट और शराब पीने में खर्च कर दिया करता था।
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इसी दौरान कुछ दोस्तों ने सुझाव दिया कि मुझे फिल्मों में ट्राई करना चाहिए। उन्होंने एफटीआईआई में अपना फॉर्म भरा और उसके साथ ही मेरा फॉर्म भी भर दिया। मेरा टेस्ट हुआ और ऑडिशन के लिए मेरे दोस्तों ने ही मेरी तैयारी करवाई। मेरा सेलेक्शन भी हो गया, लेकिन उन दोस्तों का नहीं हो पाया। बस यहीं से आगे सफर शुरू हो गया।
एफटीआईआई आते वक्त ट्रेन में ही मेरी मुलाकात अनिल वर्मन से हुई थी, तभी से हम दोस्त बन गए। अनिल ने ही मुझे अपनी बहन के घर मुंबई चलने को कहा। मैं चल दिया, वहीं पहली बार मैंने विनोद खन्ना को देखा। दरअसल, विनोद के भाई के साथ अनिल वर्मन की बहन की शादी हुई थी। और विनोद खन्ना के साथ राकेश और राजेश रोशन भी थे।
वही लोग हमें एफटीआईआई छोड़ने भी आए। एफटीआईआई में घुसते ही मैंने एक लूंगी पहने हुए लड़के को दारू की बोतल ऑफर करते हुए पूछा, ‘यू वॉना हैव सम बियर?’उसने मना कर दिया, लेकिन रात होते ही तीन लड़के मुझे अपने कमरे में ले गए। उन्होंने मेरे मुंह पर पानी फेंका और मेरे बाल काट दिए और मुझे दारू न पीने की वॉर्निंग दी। उसके बाद डर से मैं चार दिनों तक कमरे से नहीं निकला और बाद में पता चला कि वे तीनों मिथुन, विजयेन्द्र घटगे और एक सीनियर थे। इसके बाद से मिथुन से मेरी बहुत गहरी दोस्ती हो गई। मैं कई ऐड फिल्मों में भी लगातार काम कर रहा था और इस वजह से फिल्म 'खेल खिलाड़ी का' में मुझे एक रोल मिल गया।
फिल्म तो चली नहीं, पर ऐड फिल्मों में काम मिलता रहा। ऐड फिल्मों से मिले पैसों से मैंने एक फिएट कार खरीद ली। बस मुंबई की सड़कों पर अपने दोस्तों के साथ उसमें घूमने निकल पड़ता। एक बार ऐसे ही मैं अपनी गाड़ी से घूम रहा था कि एक गाड़ी ने पीछे से मुझे टक्कर मारी। मैं जैसे ही गुस्से से उस गाड़ी की ओर दौड़ा, तो देखा उसमें फिरोज खान थे। बस अपना नुकसान भूलकर, मैं उनसे फिल्म में रोल मांगने लगा। लोगों की भीड़ जमा हो गई पर मैं फिर भी उनसे एक ही रट करता रहा।
वही लोग हमें एफटीआईआई छोड़ने भी आए। एफटीआईआई में घुसते ही मैंने एक लूंगी पहने हुए लड़के को दारू की बोतल ऑफर करते हुए पूछा, ‘यू वॉना हैव सम बियर?’उसने मना कर दिया, लेकिन रात होते ही तीन लड़के मुझे अपने कमरे में ले गए। उन्होंने मेरे मुंह पर पानी फेंका और मेरे बाल काट दिए और मुझे दारू न पीने की वॉर्निंग दी। उसके बाद डर से मैं चार दिनों तक कमरे से नहीं निकला और बाद में पता चला कि वे तीनों मिथुन, विजयेन्द्र घटगे और एक सीनियर थे। इसके बाद से मिथुन से मेरी बहुत गहरी दोस्ती हो गई। मैं कई ऐड फिल्मों में भी लगातार काम कर रहा था और इस वजह से फिल्म 'खेल खिलाड़ी का' में मुझे एक रोल मिल गया।
फिल्म तो चली नहीं, पर ऐड फिल्मों में काम मिलता रहा। ऐड फिल्मों से मिले पैसों से मैंने एक फिएट कार खरीद ली। बस मुंबई की सड़कों पर अपने दोस्तों के साथ उसमें घूमने निकल पड़ता। एक बार ऐसे ही मैं अपनी गाड़ी से घूम रहा था कि एक गाड़ी ने पीछे से मुझे टक्कर मारी। मैं जैसे ही गुस्से से उस गाड़ी की ओर दौड़ा, तो देखा उसमें फिरोज खान थे। बस अपना नुकसान भूलकर, मैं उनसे फिल्म में रोल मांगने लगा। लोगों की भीड़ जमा हो गई पर मैं फिर भी उनसे एक ही रट करता रहा।
इस घटना के कुछ समय बाद मुझे केके शुक्ला ने बताया कि फिरोज खान अपनी फिल्म 'कुर्बानी’ में विलेन के रोल के लिए उस लड़के की तलाश में हैं, जिनसे उनकी कार की टक्कर हुई थी। बस फिर क्या था मैं तुरंत उनसे मिलने के लिए दौड़ा और इस तरह मुझे 'कुर्बानी' में काम करने का मौका मिल गया। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं पहली बार अपनी पहली विदेश यात्रा पर गया। इसका एक किस्सा मुझे याद है- मुंबई से कई घंटों का सफर तय कर लंदन पहुंचे थे यूनिट के सारे लोग।
मगर पूरे सफर के दौरान एक बात बुरी तरह मेरे दिलोदिमाग पर छाई हुई थी। वह यह कि मेरी जेब में मात्र सात डॉलर थे। मेरा दिल चिंता में डूबा हुआ था कि इतने कम पैसों में मैं क्या कर पाऊंगा? मगर जैसे ही हमारा विमान लंदन हवाई अड्डे पर उतरा, मैं फिरोज जी के पास गया और बड़े प्यार से अपनी परेशानी बता दी। मेरी बात उन्होंने बड़े गौर से सुनी और झट से अपनी जेब से सारी रकम निकालकर मुझे देते हुए बोले, 'जितना पैसा तुम्हें चाहिए उतना इसमें से ले लो, बाकी कल सुबह लौटा देना।' मैं दंग रह गया उनकी दरियादिली पर।
खैर, 'कुर्बानी' की शूटिंग शुरू हुई और कोई परेशानी नहीं आई, मगर एक ऐसी घटना घट गई, जिसको याद कर आज भी दिल कांप उठता है। शूटिंग चल रही थी और फिरोज जी एक शॉट लेने में व्यस्त थे कि ऊपर से एक पंजा (जिसका इस्तेमाल वहां क्रेन की तरह भारी सामानों को इधर से उधर ले जाने के लिए किया जाता है) कैमरे के ऊपर टूटकर गिरा और कैमरा चकनाचूर हो गया। संयोग अच्छा था कि फिरोज जी कैमरे के नीचे नहीं थे। फिर हमने शूटिंग पूरी की और वापस आ गए। मेरी यह पहली यात्रा बहुत सुखद थी। लंदन शहर अच्छा लगा और उस शहर का मैं कायल हो गया। फिल्म ‘कुर्बानी’करने बाद मेरी किस्मत बदल गई थी। इसके बाद मैं एक स्टार बन चुका था।
जिंदगी की डायरी से- शक्ति कपूर
मगर पूरे सफर के दौरान एक बात बुरी तरह मेरे दिलोदिमाग पर छाई हुई थी। वह यह कि मेरी जेब में मात्र सात डॉलर थे। मेरा दिल चिंता में डूबा हुआ था कि इतने कम पैसों में मैं क्या कर पाऊंगा? मगर जैसे ही हमारा विमान लंदन हवाई अड्डे पर उतरा, मैं फिरोज जी के पास गया और बड़े प्यार से अपनी परेशानी बता दी। मेरी बात उन्होंने बड़े गौर से सुनी और झट से अपनी जेब से सारी रकम निकालकर मुझे देते हुए बोले, 'जितना पैसा तुम्हें चाहिए उतना इसमें से ले लो, बाकी कल सुबह लौटा देना।' मैं दंग रह गया उनकी दरियादिली पर।
खैर, 'कुर्बानी' की शूटिंग शुरू हुई और कोई परेशानी नहीं आई, मगर एक ऐसी घटना घट गई, जिसको याद कर आज भी दिल कांप उठता है। शूटिंग चल रही थी और फिरोज जी एक शॉट लेने में व्यस्त थे कि ऊपर से एक पंजा (जिसका इस्तेमाल वहां क्रेन की तरह भारी सामानों को इधर से उधर ले जाने के लिए किया जाता है) कैमरे के ऊपर टूटकर गिरा और कैमरा चकनाचूर हो गया। संयोग अच्छा था कि फिरोज जी कैमरे के नीचे नहीं थे। फिर हमने शूटिंग पूरी की और वापस आ गए। मेरी यह पहली यात्रा बहुत सुखद थी। लंदन शहर अच्छा लगा और उस शहर का मैं कायल हो गया। फिल्म ‘कुर्बानी’करने बाद मेरी किस्मत बदल गई थी। इसके बाद मैं एक स्टार बन चुका था।
जिंदगी की डायरी से- शक्ति कपूर