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'शादी में जरूर आना', क्योंकि इससे कनेक्ट होता है पूरा हिन्दुस्तान

Sat, 04 Nov 2017 11:20 AM IST
मायादर्पण डेस्क / अमर उजाला
मायादर्पण डेस्क / अमर उजाला Updated Sat, 04 Nov 2017 11:20 AM IST
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shaadi mein zaroor aana, producer vinod bachchan exclusive interview

2011 में आई 'तनु वेड्स मनु' ने कंगना रनौत, निर्देशक आनंद एल. राय समेत निर्माता विनोद बच्चन को भी बॉलीवुड में प्रतिष्ठा दिलाई। 'जिला गाजियाबाद' और 'जिगरिया' बनाने वाले विनोद अब ‘शादी में जरूर आना’ लेकर आ रहे हैं।

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'शादी में जरूर आना' से पहले आप यारों की बारात बनाने वाले थे, क्या हुआ?
सही कास्टिंग नहीं हो पा रही थी इसलिए आगे बढ़ा दिया। कहानी अच्छी और कास्टिंग खराब हो, तो फिल्म में आपको फिल्म नहीं दिखेगी।

'शादी में जरूर आना' आप तक कैसे आई?
'टॉम डिक हैरी', 'शागिर्द', 'साहेब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स' जैसी फिल्मों के राइटर हैं कमल पांडे। डायरेक्टर रत्ना सिन्हा ने यह कहानी सुनवाई। टाइटल था, 'यथा कथा प्रेमकथा' कहानी पसंद आई, लेकिन टाइटल नहीं। तब मैंने नाम दिया 'शादी में जरूर आना'। आप कहीं भी रहें, हिंदी प्रदेश से हैं, तो इसे देखते हुए आपको लगेगा कि घर में पहुंच गए।

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राजकुमार राव एवं कृति खरबंदा क्या पहली पसंद थे?
रत्ना जी ने राजकुमार को पहले ही कहानी सुना दी थी। मैंने बिजनेस प्वॉइंट ऑफ व्यू से हटकर कहानी पर गौर किया, तो वह परफेक्ट लगे। तापसी पन्नू को साइन किया परंतु उनकी 'जुड़वा-2' की डेट हमारी शूटिंग से टकरा रही थी। उनके लिए वह बड़ी फिल्म थी। हमने करीब 100 लड़कियों के ऑडिशन किए, उसमें कृति खरबंदा मिलीं। हमने 50 दिनों में इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ में शूटिंग पूरी की।

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'तनु वेड्स मनु' में भी शादी का मामला था, इस बार भी शादी। क्यों?
शादी से पूरा हिन्दुस्तान कनेक्ट करता है। जैसी शादियां इन फिल्मों में हैं, वैसे ही गली-मोहल्लों में पला-बढ़ा हूं। कहानी चुनता हूं, तो उसमें तीस-चालीस साल पुराने विनोद बच्चन को देखता हूं। जब मैं पहली कतार में बैठ कर फिल्में देखता था। वह अलग ही माहौल होता था, घर-परिवार और अपने लोगों-सा। उसी माहौल से ऐसे सिनेमा की समझ मिली।

'तनु वेड्स मनु' को लीजिए। दो साल तक स्क्रिप्ट इंडस्ट्री में घूमती रही। हर कॉर्पोरेट में गई। हर टाई वाले ने पढ़ी। किसी की समझ नहीं आई। जबकि पहले ही नरेशन के बाद मैंने कह दिया कि यह बना रहा हूं। मेरे दिमाग में उस हिंदुस्तान का रंग चढ़ा है जिसमें 80 करोड़ लोग रंगे हैं।

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राजकुमार राव

'तनु वेड्स मनु' ने कंगना का करियर बदल दिया। तब की कंगना और आज की कंगना में क्या फर्क पाते हैं?
कंगना बहुत इमोशनल पर्सन हैं। अच्छी इंसान हैं। अच्छी सोच रखती हैं। जो सफलता पाई उसकी हकदार हैं। वह जिस जगह पर हैं, वहां के योग्य खुद को साबित किया। उन्होंने अपने भाग्य, मेहनत और ईमानदारी से सब पाया।

लेकिन विवादों ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया?
मैं सहमत हूं। देखने वाली बात यह है कि इस मुकाम पर आपके आस-पास कौन लोग हैं। कौन आपका काम देखते हैं। आपको मैनेज करते हैं। ये लोग आपको क्या आईना दिखाते हैं और आप अपने दिमाग से कितना सोचते हैं। कंगना के साथ मेरे अच्छे संबंध हैं और काफी समय साथ रहा हूं, तो मुझे कहीं नहीं लगा जब मैंने उनके इंटरव्यू पढ़े कि यह कंगना की भाषा है। मुझे नहीं पता कौन लोग उन्हें मैनेज कर रहे हैं, समझा रहे हैं। ये कंगना के अंदर की आवाज नहीं है।

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