40 साल बाद लेखक ने खोला दिल का राज, कैसे लिखी शोले
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सब मुझसे कहते हैं सलीम साब क्या डायलॉग लिखा है आपने- ‘होली कब है?’ या फिर- ‘कितने आदमी थे?’ ‘शोले’ में हमने और बहुत शानदार डायलॉ़ग लिखे थे जैसे- ‘जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा बोझ क्या होता है...बूढ़े बाप के कंधे पर जवान बेटे का जनाज़ा।’ लेकिन, लोग तारीफ करते हैं- ‘कितने आदमी थे?’
हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्म ‘शोले’ को रिलीज़ हुए 40 बरस हो चुके हैं। यूं तो इस फिल्म से जुड़ा शायद ऐसा कुछ भी नहीं रह गया है, जिसका ज़िक्र ना हुआ हो। लेकिन कहते हैं कि जेहन में सबसे आगे खड़ी मशहूर यादों के पीछे झांककर देखा जाए, तो कई छोटी दिलचस्प यादें उछलकर बाहर आ जाती हैं। मैं और जावेद अख्तर ‘शोले’ का महज चार लाइन का आइडिया लेकर निर्माता जीपी सिप्पी और उनके बेटे निर्देशक रमेश सिप्पी से मिलने गए थे।
साथ में फिल्म ‘मजबूर’ की डायलॉग समेत पूरी स्क्रिप्ट थी। मगर जीपी सिप्पी और रमेश सिप्पी बड़ी फिल्म बनाना चाहते थे, इसलिए ‘शोले’ का आइडिया चुन लिया। स्क्रिप्ट के लिए हमें डेढ़ लाख रुपये दिए गए, जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी। ये अलग बात है कि ‘मजबूर’ की स्क्रिप्ट के लिए मुझे और जावेद को ‘शोले’ से भी ज्यादा दो लाख रुपये मिले। शुरुआत में इस फिल्म का नाम ‘अंगारे’ रखने की भी बात हुई, लेकिन फिर सबको ‘शोले’ नाम ज्यादा पसंद आया।
बांद्रा जिमख़ाना में मैंने दिलीप कुमार से...
‘शोले’ में डाकू गब्बर सिंह की कास्टिंग के बारे में तो आपने कई क़िस्से सुने होंगे, लेकिन ठाकुर बलदेव सिंह (जिसे संजीव कुमार ने निभाया) के रोल के लिए सबसे पहले ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार से बात की गई थी। दिलीप कुमार को लगा कि इस रोल में करने के लिए कुछ खास नहीं है, क्योंकि उस दौर में उनका ध्यान कॉमेडी और इमोशनल रोल की ओर ज्यादा था।
बांद्रा जिमख़ाना में मैंने दिलीप कुमार से ‘जंजीर’ में काम करने के लिए भी बात की थी। बाद में एक बार मैंने दिलीप साहब से पूछा कि वो कौन सी फिल्में हैं, जिसके बारे में आपको लगता है कि इंकार नहीं करना चाहिए था?
दिलीप कुमार ने जवाब दिया- “बैजू बावरा, प्यासा, जंजीर और शोले।” फिल्म में जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू (धर्मेन्द्र) के किरदारों के नाम मेरे कॉलेज के दोस्त वीरेंदर सिंह ब्यास और जय सिंह राव कलेवर के नाम पर रखे गए थे। जबकि ठाकुर बलदेव सिंह तो मेरे ‘फादर इन लॉ’ का नाम था, जो बंबई में मशहूर डेंटिंस्ट थे।
मुझे हैरत होती है कि लोग अब भी मुझसे कहते हैं...
हिंदी सिनेमा को ‘शोले’ से पहले और ‘शोले’ के बाद के दौर में विभाजित किया जाए, तो शायद गलत नहीं होगा। मुझे हैरत होती है कि लोग अब भी मुझसे कहते हैं सलीम साब क्या डायलॉग लिखा है आपने- ‘होली कब है?’ या फिर- ‘कितने आदमी थे?’ क्या आपको वाक़ई लगता है कि ये बेहतरीन डायलॉग थे?
‘शोले’ में हमने और बहुत से शानदार डायलॉ़ग लिखे थे जैसे- ‘जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा बोझ क्या होता है...बूढ़े बाप के कंधे पर जवान बेटे का जनाज़ा।’ लेकिन, लोग तारीफ करते हैं- ‘कितने आदमी थे’ और ‘चल धन्नो, आज बसंती की इज्जत का सवाल है।’
मेरी समझ में आज तक ये बात नहीं आती। जिस तरह क्रिकेट में कभी जीतने वाली टीम को बदलते नहीं। मैं भी शोले में रत्ती भर बदलाव नहीं करना चाहूंगा। शोले दोबारा नहीं बन सकती।