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Hindi News ›   Entertainment ›   Bollywood ›   Rhythm kala Mahotsav: Rashtriya Puruskar and Sangeet Natak Akademi Awardee Sanjay Mehta told the specialty of theater, said the only difference between film and theater is the medium

रिदम कला महोत्सव: संजय मेहता जी ने बताई रंगमंच की खासियत, कहा- फिल्म और रंगमंच में सिर्फ माध्यम का ही है फर्क

Mon, 14 Feb 2022 10:23 PM IST
हर्षिता सक्सेना एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: हर्षिता सक्सेना Updated Mon, 14 Feb 2022 10:23 PM IST
सार

यह कला महोत्सव बीते 8 सालों से आयोजित किया जा रहा है और आगे भी ऐसे ही आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव का मकसद युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ना है।

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Rhythm kala Mahotsav: Rashtriya Puruskar and Sangeet Natak Akademi Awardee Sanjay Mehta told the specialty of theater, said the only difference between film and theater is the medium
कला महोत्सव का आयोजन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अंजना वेलफेयर सोसायटी के सहयोग से रिदम कला महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव के दौरान संगीत एवं नृत्य की कार्यशाला आयोजित की जा रही है। 26 जनवरी से शुरू हुआ यह कला महोत्सव 45 दिन तक आयोजित किया जाएगा। यह कला महोत्सव बीते 8 सालों से आयोजित किया जा रहा है और आगे भी ऐसे ही आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव का मकसद युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ना है। इस महोत्सव के तहत हर सप्ताहांत में कला के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इस महोत्सव के तहत आयोजित होने वाली कार्यशाला का हिस्सा बनते हैं। 

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इसी क्रम में इस सप्ताहांत आयोजित हुई कार्यशाला में बतौर मेहमान नजर आए संगीत नाटक अकादमी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता संजय मेहता जी। इस दौरान अंजना वेलफेयर सोसाइटी की फाउंडर कत्थक नृत्यांगना माया कुलश्रेष्ठ ने कहा कि संस्था की यह कोशिश है कि कला के क्षेत्र से जुड़े ऐसे कलाकारों का मार्गदर्शन आगे आने वाले युवाओं को मिले जो कला के क्षेत्र में आना चाहते हैं या इससे जुड़ना चाहते हैं। इस दौरान संजय मेहता जी से बातचीत करते हुए माया कुलश्रेष्ठ ने उनसे सवाल- जवाब भी किए। 

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सवाल: जब आपने रंगमंच में आने के बारे में सोचा तो इस बारे में आप का विचार क्या था और इसके लिए आप की प्रेरणा क्या थी?
जवाब: जबलपुर के कटनी जिले में जहां मैं पढ़ रहा था, उस समय थिएटर जैसी कोई चीज हुआ ही नहीं करती थी। ऐसे में इस बारे में कुछ सोचने का विषय ही नहीं था। इसके बाद मैं वहां से पढ़ाई करने के लिए उज्जैन गया। उस समय उज्जैन में मध्य प्रदेश नाटक लोक कला एकेडमी थी और वहां रंग समूह के नामक एक समूह भी था। मैं वहां से जुड़ा और मैंने मध्यप्रदेश नाटक लोक कला एकेडमी से डिप्लोमा शुरू किया और वही से नाटक की तरफ मेरा रुझान बढ़ा।

 

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सवाल: 17 साल के अपने लंबे करियर में अपने 200 से ज्यादा थिएटर का डायरेक्शन और उसमें अभिनय किया है, लेकिन आपके परिवार में अभिनय या नाटक का कोई बैकग्राउंड नहीं था। ऐसे में क्या आपको कभी यह नहीं लगा कि यह आपके लिए पार्ट टाइम विकल्प हो सकता है बजाय फुल टाइम करियर के?

जवाब: नहीं, जहां तक रुझान की बात है तो हमारे जो दादाजी गोविंद राम शास्त्री उस समय सिरोंज के एक बड़े पंडित और ज्योतिषाचार्य भी थे। लेकिन हमारे घर में एक परंपरा थी कि लोगों को संगीत का बड़ा ज्ञान था। उस जमाने में हमारे दादा ने अपना एक खुद का नाटक भी लिखा था। मेरे पिता भी स्वयं गाते और हारमोनियम बजाते थे। उनके भाई भी गाते और तबला बजाते थे। कहीं ना कहीं हमारे घर में संगीत से जुड़ी कुछ चीजें मौजूद थी। इसलिए मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं कुछ चीजे आपके अंदर अपने आप ही आ जाती है। 

 

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सवाल: आपने रंगमंच के अलावा कई फिल्मों में भी काम किया है। ऐसे में जब आप रंगमंच से फिल्मों की तरफ आते हैं, तो दोनों में क्या अलग होता है। क्योंकि आजकल ज्यादातर लोगों की यही धारणा है कि रंगमंच इसलिए करना है, क्योंकि फिल्मों में जाना है, तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

जवाब: मुझे लगता है कि जब तक आप ने एक बहुत अच्छा थिएटर नहीं किया है और इसे लंबे समय तक नहीं किया है, अब तक आपको फिल्मों में भी थोड़ी दिक्कत होगी। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि जिसने थिएटर नहीं किया हो वह फिल्मों में नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे बहुत चुनिंदा लोग होते हैं, जिनमें जन्म से ही अभिनय की कला होती है। लेकिन कहीं ना कहीं एक ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है। भले यह ट्रेनिंग आपको थिएटर से मिले या स्कूल से मिले। आप जब विधिवत तरीके से सारे नाटकों में काम करते हैं और आपका एक अनुभव रहता है, तो मुझे लगता है कि वह अनुभव आपको तब काम आता है जब आप फिल्म करने जाते हैं। फिल्म में और रंगमंच में सिर्फ माध्यम का ही फर्क होता है। अभिनय तो अभिनय ही है, भले ही आप रंगमंच में कर रहे हो या फिल्म में, लेकिन माध्यम की वजह से उसमें थोड़ा अंतर आ जाता है।

 

सवाल: जैसा कि आजकल देखने को मिलता है कि अभिनय के लिए कई तरह के क्रैश कोर्स उपलब्ध है, तो आपको लगता है कि अभिनय सिखाया जा सकता है या अभिनय का हुनर जन्म से ही मिलता है? साथ ही अभिनय करने या अभिनेता बनने के लिए व्यक्ति में कौन-कौन सी खूबियां होनी चाहिए?

जवाब: पहली बात कि व्यक्ति में लगन होनी चाहिए, क्योंकि अगर लगन ही नहीं है तो फिर इसका कोई अर्थ ही नहीं निकलेगा। साथ ही स्पष्टता होनी चाहिए कि आप करना क्या चाहते हैं। अगर आप में लगन है और आप इसे सीखना चाहते हैं तो आप इस क्षेत्र में आ सकते हैं। इस क्षेत्र में आने के लिए आपको हर कुछ जानना होगा के लिए। आपको नृत्य का अध्ययन करना पड़ेगा, संगीत का अध्ययन करना पड़ेगा, धर्म की किताबें पढ़नी पड़ेगी, राजनीति के बारे में भी जानना पड़ेगा। कुल मिलाकर इस क्षेत्र में आने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, पढ़ना पड़ेगा, जीवन को देखना भी पड़ेगा और बहुत कुछ अनुभव करना पड़ेगा।

 

सवाल: आजकल बॉलीवुड फिल्मों का क्रेज थोड़ा कम होता दिख रहा है। पहले के मुकाबले आजकल लोग इसकी तरफ कम आकर्षित लग रहे हैं। क्या यह रंगमंच के लिए एक अच्छा संकेत हो सकता है?

जवाब: मैं जहां तक समझता हूं रंगमंच के लिए कभी बुरा समय रहा ही नहीं है। सिर्फ फर्क इतना रहता है कि कभी कुछ चीज ज्यादा रहती है तो कभी कुछ कम रहती है। जहां तक फिल्मों की बात है तो फिल्मों के अच्छे होने या खराब होने से किसी भी माध्यम की बढ़ोतरी नहीं होती। वह उस माध्यम की अपनी ताकत की वजह से होती है। थिएटर एक लाइव माध्यम है, जिससे आप जुड़ जाते हैं। रंगमंच हमेशा से ही महत्वपूर्ण रहा है, इसलिए किसी भी माध्यम के बढ़ जाने या घट जाने से इस पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। रंगमंच तब ही बढ़ता या घटता है, जब हमारे अंदर कोई कमी आती है। अमर उजाला इसमे मीडिया पार्टनर है।



वीडियो यहां देखें

 

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