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Ram Narayan Passed Away: मशहूर सारंगी वादक राम नारायण का 96 साल की उम्र में निधन, दुनियाभर में बनाई पहचान

Sat, 09 Nov 2024 10:30 AM IST
अंजू बाजपेई एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: अंजू बाजपेई Updated Sat, 09 Nov 2024 10:30 AM IST
सार

मशहूर सारंगी वादक राम नारायण का निधन हो गया है। उनका निधन 96 साल की उम्र में हुआ। दिवंगत वादक को अक्सर पंडित के नाम से जाना जाता है।

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Renowned Saranagi Player Ram Narayan has passed away became first internationally successful Indian musician
दिवंगत सारंगी वादक राम नारायण - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारतीय संगीतकार सारंगी वादक राम नारायण का 96 की उम्र में निधन हो गया है। बड़ी दुख की बात है कि संगीत की दुनिया का एक और सितारा बॉलीवुड इंडस्ट्री से कम हो गया। यह जानकारी सामने नहीं आई है कि उनका निधन कब और कितने बजे हुआ है।
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राम नारायण का जन्म
राम नारायण का जन्म 25 दिसंबर 1927 को उत्तर-पश्चिमी भारत में उदयपुर के पास आमेर गांव में हुआ था। उनके परदादा बागाजी बियावत आमेर के एक गायक थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राम नारायण और उनके परदादा सागद दानजी बियावत उदयपुर के महाराणा के दरबार में गाते थे। उन्हें पंडित के नाम से जाना जाता था। 
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मिली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान
राम नारायण एक ऐसे भारतीय संगीतकार थे, जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में एकल संगीत वाद्य के रूप में सारंगी को लोकप्रिय बनाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले सफल सारंगी वादक बने। उनके दादा हर लालजी बियावत और पिता नाथूजी बियावत किसान और गायक थे, नाथूजी झुके हुए वाद्य दिलरुबा बजाते थे और नारायण की मां एक संगीत प्रेमी थीं।
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कैसे मिली जीवन की पहली सारंगी
दिवंगत संगीतकार राम नारायण की पहली भाषा राजस्थानी थी और उन्होंने हिंदी और बाद में अंग्रेजी सीखी। लगभग छह साल की उम्र में, उन्हें परिवार के गंगा गुरु, एक वंशावली विशेषज्ञ द्वारा छोड़ी गई एक छोटी सारंगी मिली और उन्हें उनके पिता द्वारा विकसित एक उंगलियों की तकनीक सिखाई गई। नारायण के पिता ने उन्हें सिखाया, बाद में बियावत ने जयपुर के सारंगी वादक मेहबूब खान से अपने बेटे के लिए सारांगी सिखाने की मांग की।

ऑल इंडिया रेडियो में भी किया काम
उन्होंने सारंगी वादकों और गायकों के अधीन गहन अध्ययन किया और किशोरावस्था में ही संगीत शिक्षक और सफल संगीतकार के रूप में काम किया। ऑल इंडिया रेडियो, लाहौर ने 1944 में गायकों के लिए संगीतकार के रूप में उन्होंने काम किया। 1947 में भारत के विभाजन के बाद वे दिल्ली चले गए , लेकिन संगीत से आगे जाने की इच्छा और अपनी सहायक भूमिका से निराश होकर नारायण 1949 में भारतीय सिनेमा में काम करने के लिए मुंबई चले गए।


पद्म विभूषण से सम्मानित
दिवंगत संगीतकार ने 1956 में कॉन्सर्ट सोलो आर्टिस्ट बने और तब से उन्होंने भारत के कई प्रमुख संगीत समारोहों में प्रस्तुति दी। उन्होंने कई एल्बम रिकॉर्ड किए और 1964 में अपने बड़े भाई चतुर लाल के साथ अमेरिका और यूरोप का अपना पहला अंतरराष्ट्रीय दौरा किया, जो तबला वादक थे और 1950 के दशक में शंकर के साथ दौरे पर गए थे। नारायण ने भारतीय और विदेशी छात्रों को भी पढ़ाया और 2000 के दशक में अक्सर भारत के बाहर प्रदर्शन किया। उन्हें 2005 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
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