रणदीप हुड्डा का ओपन लेटर- 'हंसने के लिए मुझे फांसी पर मत लटकाओ'
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इस स्माइली के कारण हुड्डा को भी लोगों ने घेरा। कई लोगों का मानना है कि हुड्डा की यह स्माइली गुरमेहर कौर की ट्रोलिंग करने वालों के पक्ष में है। पिछले हफ्ते रामजस कॉलेज में एबीवीपी और वामपंथी छात्र संगठनों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इसे लेकर एबीवीपी की आक्रामकता पर लोगों ने सवाल खड़े किए। इसी दौरान गुरमेहर कौर सामने आईं और उन्होंने कहा, ''मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं। मैं एबीवीपी से नहीं डरती हूं। मैं अकेली नहीं हूं। भारत के सभी छात्र मेरे साथ हैं।''
एक तबके को गुरमेहर का यह कदम पसंद नहीं आया और लोगों ने ऑनलाइन ट्रोलिंग शुरू कर दी। ट्रोल करने वालों ने सहवाग और हुड्डा के ट्वीट का भी खूब इस्तेमाल किया। अब हुड्डा ने अपने ट्वीट को लेकर फेसबुक पर सफाई में एक पोस्ट लिखी है।
रणदीप हुड्डा का ओपन लेटर- 'हंसने के लिए मुझे फांसी पर मत लटकाओ'
हुड्डा ने लिखा है- हंसने के लिए मुझे फांसी पर लटकाओ मत। वीरू ने एक जोक साझा किया था और मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे उस जोक पर हंसी आई थी। वह बहुत मजाकिया है और यह उन कई चीजों में से एक था जिसने मुझे हंसने पर मजबूर किया। बस इतना ही था!!
लेकिन अब मैं हैरान हूं कि मुझे एक युवती के खिलाफ नफरत भड़काने के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है। वह लड़की भी ऐसा ही मानती है। उसने यह बात कही थी और वह खुलकर सामने आई थी। ऐसे में उसे अपने खिलाफ आवाज भी धैर्य से सुनने का साहस दिखाना चाहिए था।
यदि आप किसी पर उंगली उठाते हैं और उस पर आने वाली प्रतिक्रियाओं के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराते हैं तो यह सही नहीं है। मैं बिल्कुल उस लड़की के खिलाफ नहीं हूं। मैं मजबूती के साथ इस बात को मानता हूं कि हिंसा गलत है। महिला को धमकी देना एक जघन्य अपराध है। ऐसा करने वालों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
मैं उस लड़की के वीडियो को पसंद करता हूं जिसमें उसने युद्धरत देशों के बीच शांति की अपील की है। यह सराहने लायक है, लेकिन टकराव का बिन्दु यह नहीं है। उसे अधिकार है कि वह जो सोचती है उसके आधार पर किसी भी चीज का विरोध करे। दूसरी तरफ वीरू को भी अधिकार है कि वह मजाक उड़ाएं। हम एक लोकतंत्र में रहते हैं और हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक हासिल है। हम पर बदमाशी का आरोप लगाना और उस लड़की को ट्रोल करना गलत है।
रणदीप हुड्डा का ओपन लेटर- 'हंसने के लिए मुझे फांसी पर मत लटकाओ'
उन्होंने अपने एजेंडे के हिसाब से हमें घेरना शुरू कर दिया। यह बदमाशी है। यदि आप सोचते हैं आप किसी को सता सकते हैं तो आपको दूसरी तरफ से भी सामना करना होगा। डीयू में हुई हिंसा को युद्ध के खिलाफ उसकी अपील से कैसे जोड़ा गया? वीरू के जोक को हिंसा के समर्थन में कैसे जोड़ दिया गया?
मुद्दा यह है कि यह कोई मुद्दा ही नहीं है, लेकिन इस मामले में चीजों को जानबूझकर घालमेल किया जा रहा है। लड़की की आवाज बहुत अहम है लेकिन सभी नागरिकों की आवाज से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसा नहीं है कि वह सभी शहीदों और उनके बच्चों का प्रतिनिधित्व करती है।
यह उसकी निजी राय थी और उसी रूप में लिया जाना चाहिए। मेरी निजी राय है कि लोगों को युवाओं के कंधे पर बंदूक रखकर नहीं दागना चाहिए। छात्रों को पढ़ना चाहिए, बहस करनी चाहिए और उन्हें एक-दूसरे से सीखना चाहिए।
वे हमारे देश के भविष्य हैं और मैं अपने भविष्य को लेकर दुखी नहीं हूं क्योंकि हमलोगों के चारों तरफ ऐसे साहसिक और खुलकर बोलने वाले लोग हैं। एक शहीद की बेटी के प्रति असंवेदनशीलता को लेकर मैं आप सबसे कहना चाहता हूं कि मेरे 6 दोस्तों ने देश के लिए अपनी जान दे दी। इनके साथ मेरे और कई लोग भी हैं। मेरे राज्य के हर गांव में शहीद हैं।
हां, युद्ध गलत है, लेकिन इसकी शुरुआत हम नहीं करते हैं। हम अपनी सीमा की रक्षा करने से पीछे नहीं हट सकते चाहे इसके लिए हमें जान ही गंवानी पड़े। हम आखिर इससे कैसे निपट सकते हैं? हंसी और मजाक से? अब इस मुद्दे को मैं यहीं खत्म करना चाहता हूं।