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Hindi News ›   Entertainment ›   Bollywood ›   Naushad Ali Birth Anniversary was an Indian composer for Hindi films remembered as Moseeqar e azam

बचपन से थे संगीत के दीवाने, नौशाद अली की यादों में हमेशा जिंदा रहा नवाबों का शहर

Thu, 25 Dec 2025 07:26 AM IST
अंजू बाजपेई एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: अंजू बाजपेई Updated Thu, 25 Dec 2025 07:26 AM IST
सार

Naushad Ali Birth Anniversary: मशहूर संगीतकार नौशाद अली हिंदी फिल्मों के सबसे बड़े नामों में से एक हैं। उन्होंने सिर्फ 65-67 फिल्मों में ही संगीत दिया, लेकिन उनका संगीत आज भी लोगों के दिलों में बसता है। 

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Naushad Ali Birth Anniversary was an Indian composer for Hindi films remembered as Moseeqar e azam
नौशाद अली की जयंती - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज 25 दिसंबर को संगीतकार नौशाद अली की जयंती है। उन्होंने हिंदी सिनेमा में शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाया और फिल्म संगीत को एक नई ऊंचाई दी। आज उनकी जयंती के मौके पर जानते हैं उनकी जिंदगी की कुछ खास बातें।

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नौशाद का जन्म
नौशाद अली का जन्म 25 दिसंबर 1919 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में हुआ था। लखनऊ को नवाबों का शहर कहा जाता है, जो संस्कृति और संगीत का बड़ा केंद्र रहा है। उनके पिता वाहिद अली एक मुंशी थे। घर में संगीत को अच्छा नहीं माना जाता था, लेकिन नौशाद को बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था।

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लखनऊ की यादें
वह देवा शरीफ के मेले में जाते थे, जहां बड़े कव्वाल और संगीतकार गाते थे। उन्होंने उस्तादों से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखा। साइलेंट फिल्में देखकर नोट्स बनाते थे और हारमोनियम बजाने का मौका पाने के लिए एक दुकान पर काम करते थे। लखनऊ की गलियां और मुहल्ले उनकी यादों में हमेशा जिंदा रहे। उन्होंने एक गजल में लिखा था- 'वह गलियां, वह मुहल्ले, सब बन गए कहानी, मैं भी था लखनऊ का, यह बात है पुरानी।'

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संघर्ष के दिन और मुंबई का सफर
17 साल की छोटी उम्र में 1937 में नौशाद लखनऊ छोड़कर मुंबई चले गए। शुरुआती दिनों में बहुत संघर्ष किया। फुटपाथ पर सोना पड़ा। पहले बड़े संगीतकारों के सहायक बने। फिर 1940 में फिल्म 'प्रेम नगर' से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में शुरुआत की। असली सफलता 1944 में फिल्म 'रतन' से मिली। इसके गाने इतने हिट हुए कि वह रातोंरात स्टार बन गए।

करियर की चमक और मशहूर फिल्में
नौशाद ने शकील बदायुनी जैसे गीतकारों और मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर जैसे गायकों के साथ काम किया। उन्होंने रफी और लता को बहुत मौके दिए। उन्होंने उनकी फिल्मों में शास्त्रीय रागों का इस्तेमाल किया, जो उस समय नया था। उनकी कुछ मशहूर फिल्में हैं- 'बैजू बावरा', 'अंदाज', 'मदर इंडिया', 'मुगल-ए-आजम', 'गंगा जमुना' और राम और श्याम'। उन्होंने अपने संगीत से लोगों को कई फिल्मों में झूमने पर मजबूर किया।

सम्मान और आखिरी सफर
मुगल-ए-आजम को जब रंगीन किया गया, तो नौशाद बहुत खुश हुए। उनकी आखिरी फिल्म 'ताज महल' (2005) थी। उनके योगदान के लिए 1981 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 1992 में पद्म भूषण मिला। 5 मई 2006 को उनका निधन हो गया। 

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