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कपड़ों के बिना जिंदगी जीने की वकालत

Wed, 27 Jul 2016 04:09 PM IST
लिंडसे बेकर/बीबीसी
लिंडसे बेकर/बीबीसी Updated Wed, 27 Jul 2016 04:09 PM IST
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Naked artists perform in london
- फोटो : bbc

लंदन में इन दिनों एक खास नुमाइश लगी हुई है। ये नुमाइश स्टूडियो वॉल्तेयर गैलरी में लगी है। जो अस्सी के दशक में महिलाओं के एक आंदोलन की याद दिलाती है। ये आंदोलन 'नियो-नैचुरिस्ट्स' ने चलाया था। ये लोग कुदरत से नजदीकी और बिना कपडों के जिंदगी बसर करने के पैरोकार हैं।

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80 के दशक में क्रिस्टीन बिनी, उनकी बहन जेनिफर और विल्मा जॉनसन नाम की तीन महिलाओं ने बिना कपडों के कई जगह प्रदर्शन करके लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचने की कोशिश की थी।
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विल्मा जॉनसन उन दिनों को याद करके कहती हैं कि सबसे मजेदार वाकया लंदन के रॉयल ओपेरा हाउस में हुआ था। वहां मशहूर बैले डांसर माइकल क्लार्क ने उन्हें अपने एक कार्यक्रम में बुलाया था। ये कार्यक्रम कुछ लोगों की मदद के लिए पैसे जमा करने के लिए हो रहा था।
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जब रॉयल ओपेरा हाउस में विल्मा जॉनसन, क्रिस्टीन बिनी और जेनिफर बिनी अपने बदन पर सिर्फ बॉडी पेंट लगाकर लोगों के सामने आईं, तो सन्नाटा पसर गया। विल्मा कहती हैं कि वो सन्नाटा बेहद मजेदार था।

कुछ को महिलाओं का नंगे बदन घूमना सदमा दे गया

Naked artists perform in london

अस्सी के दशक में 'नियो-नैचुरिस्ट्स' के इस ग्रुप ने ऐसे कई कारनामे किए थे। कभी सडक पर प्रदर्शन, तो कभी, नाइट क्लब या आर्ट गैलरीज में नंगे बदन की नुमाइश। उन्हें इस हालत में देखकर अक्सर लोग हैरत में पड जाते थे। कुछ लोगों तो महिलाओं का यूं नंगे बदन खुले में घूमना सदमा दे गया।

इनका मकसद जमाने के चलन को, समाज के कायदों को चुनौती देना था। इसीलिए ये गुरिल्ला युद्ध के अंदाज में कभी भी, कहीं भी पहुंचकर अपनी नुमाइश करने लगते थे। लेकिन कुछ वक्त बाद लोग उन्हें भूल गए। अब उसी पुरानी याद को ताजा कर रही है स्टूडियो वॉल्तेयर गैलरी में लगी इन 'नियो-नैचुरिस्ट्स' के कारनामों की नुमाइश। इसमें तस्वीरें हैं, वीडियो है और दूसरी यादगार चीजें हैं।

वैसे 'नियो-नैचुरिस्ट्स' के इस ग्रुप की हरकत बेहद बचकानी होती थीं, इसमें कोई शक नहीं कि उन पर हंसी आती थी। इस समूह की सदस्य क्रिस्टीन बिनी एक ऐसे ही मौके को याद करके बताती हैं कि उन्होंने सेंट्रल लंदन में एक बार मछुआरों और जलपरियों के नाटक को पेश किया था। क्रिस्टीन कहती हैं कि एक पुलिसवाला वहां आकर उन्हें करीब दस मिनट तक समझाता रहा। लेकिन उसने उन तीनों को गिरफ्तार नहीं किया। बस ये गुजारिश की कि वो कपडे पहन लें।

'नियो-नैचुरिस्ट्स' समूह की तीनों महिलाओं ने लंदन के कई कलाकारों के साथ मिलकर अपना संदेश देने की कोशिश की। इनमें माइकल क्लार्क, बॉय जॉर्ज, डेरेक जारमैन, जॉन मेबरी और ग्रेसन पेरी जैसे अपने अपने क्षेत्र की मशहूर हस्तियां शामिल हैं। उनके आंदोलन में कलाकारों के अलावा, छात्र, क्लब जाने वाले लोग भी शामिल हुए थे। इसे न्यू रोमांटिक आंदोलन का नाम दिया गया था। समूह के सदस्यों को 'ब्लिट्ज किड' के नाम से भी जाना जाता था।

समलैंगिकों का खुला माहौल हौंसला देता था

Naked artists perform in london

'नियो-नैचुरिस्ट्स' समूह की सदस्य जेनिफर बिनी कहती हैं कि वो लोग समलैंगिकों के ज्यादा करीब रहे। उनके बीच का खुला माहौल उन्हें वो करने का हौसला देता था, जो उन्होंने कर के दिखाया। 'नियो-नैचुरिस्ट्स' का ये ख्याल क्रिस्टीन को 70 के दशक में जर्मनी के दौरे से आया था। जहां उन्होंने देखा था कि जर्मनी में समाज से बगावत कर रहे लोग खुलेआम नंगे टहलते थे।

उनके मुकाबले ब्रिटेन में नया चलन चलाने की कोशिश कर रहे लोग कमजोर मालूम होते थे। वो काले कपडे पहनते थे और अक्सर घरों के भीतर ही रहना पसंद करते थे। लेकिन, क्रिस्टीन ने ब्रिटेन में जर्मनी से लाकर इंकलाब का पौधा रोप दिया। इसमें उन्हें अपनी बहन जेनिफर और दोस्त विल्मा से मदद मिली।

हालांकि कोई उनके कारनामों को गंभीरता से नहीं लेता था। मगर क्रिस्टीन कहती हैं कि वो नंगे बदन की नुमाइश करके समाज को एक संदेश देना चाहते थे। वो कहती हैं कि उस दौर में ही क्या, आज भी औरतों पर सज-संवरकर रहने का दबाव है। ज्यादातर महिलाएं इसी दबाव में बन-ठनकर रहती हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि औरत की सच्चाई हमेशा तस्वीरनुमा बनावटीपन के पर्दे में छुपी रहे।

क्रिस्टीन का कहना है कि औरत का कुदरती रूप दुनिया को दिखाई देना चाहिए। यही उनका और साथियों का मकसद था, अपने बदन की खुली नुमाइश के पीछे।

एक उम्र के बाद लोग औरत की तरफ देखते तक नहीं

Naked artists perform in london

अस्सी के दशक का वो दौर अब पीछे छूट चुका है। आज विल्मा जॉनसन सर्फिंग करती हैं। उस पर एक किताब भी लिख चुकी हैं। वहीं बिनी बहनें अब सिरैमिक का काम करती हैं। लेकिन तीनों की दोस्ती अब भी कायम है। क्रिस्टीन कहती हैं कि एक उम्र के बाद लोग औरतों की तरफ देखते तक नहीं। वो पास से गुजर जाती हैं और लोग ध्यान नहीं देते।

वैसे, समाज में आज भी किसी को नंगे बदन देखकर लोगों को झटका लगता है। कई बार ऐसे नजारे हमें उकसाते हैं। कभी हंसाते हैं। और कभी सोचने पर मजबूर कर देते हैं। हालांकि नंगे बदन कि नुमाइश करने वालों का हमेशा मजाक बनता रहा है।

जैसे कि अमरीकी फोटोग्राफर स्पेंसर ट्यूनिक जो अक्सर बडी संख्या में नंगे लोगों को जमा करके उनकी तस्वीरें लेते हैं। अभी हाल ही में उन्होंने ब्रिटेन के हल शहर में तीन हजार नंगे बदन लोगों की तस्वीर खींची थी। इसका मकसद, हल शहर को 2017 के सिटी ऑफ कल्चर का दर्जा मिलने का प्रचार करना था।

ब्रिटन के चैनल 4 पर एक शो भी हुआ, जिसका नाम था, 'लाइफ स्ट्रिप्ड बेयर' जिसमें लोगों को अपने बदन के सारे कपडे और जूते-जुराबें उतारनी होती थीं। उसके बाद उन्हें अपने एहसास बयां करने को कहा जाता था।

कपडे उतारकर विरोध शोहरत की गारंटी देता है

Naked artists perform in london
रूस का पुसी राइट ग्रुप और यूक्रेन का फेमेन समूह भी अपने कपडे उतारकर किए जाने वाले प्रदर्शनों की वजह से चर्चा में रहे हैं। आज की तारीख में कपडे उतारकर विरोध दर्ज कराने का तरीका, शोहरत की गारंटी देता है। लंदन की 'नियो-नैचुरिस्ट्स' नुमाइश की देख-रेख करने वाली जेसिका वॉन कहती हैं कि बिनी बहनें और विल्मा जो अस्सी के दशक में कर रही थीं, वो अपने वक्त से बहुत आगे की बात थी।

आज फेमेन और पुसी राइट ग्रुप के सदस्य सिर्फ ऊपर के कपडे उतारकर विरोध करते हैं। मगर 'नियो-नैचुरिस्ट्स' तो पूरी तरह कपडे उतारकर प्रदर्शन करते थे।

औरत के बदन पर बाल देख उसे बेसलीका कहते हैं

Naked artists perform in london

जेसिका कहती हैं कि 'नियो-नैचुरिस्ट्स' का अस्सी के दशक का संदेश आज और प्रासंगिक हो गया है। आज महिलाएं और भी कारोबारी चीज बनती जा रही हैं। उन पर हमेशा खूबसूरत, बन-संवरकर रहने का दबाव है। उनके बदन की कमी का मजाक बनाया जाता है। अगर उनके बदन पर बाल हैं और वो दिख जाते हैं तो लोग मखौल उडाते हैं। बेशऊर, बेसलीका ठहराते हैं।

'नियो-नैचुरिस्ट्स' जमाने के इसी चलन को तो चुनौती दे रही थीं। आखिर औरत पर इतना दबाव क्यों हो? वो कुदरतन जैसी हैं वैसी ही दुनिया के सामने क्यों नहीं आ सकतीं? उन पर बनावटी होने का दबाव क्यों डाला जा रहा है? मीडिया में और सोशल मीडिया के हिसाब से हर वक्त सजना जरूरी क्यों हो गया है? क्रिस्टीन बिनी, विल्मा जॉनसन और जेनिफर के उठाए इन सवालों के जवाब समाज आज तक नहीं दे पाया है।

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