S Mohinder Passed Away: ‘गुजरा हुआ जमाना आता..’ के संगीतकार का मुंबई में निधन, ये है पूरी संघर्ष कथा
हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम संगीत युग के आखिरी पुरोधा, संगीतकार एस मोहिंदर का रविवार को निधन हो गया। 95 वर्षीय मोहिंदर सिंह सरना पिछले तीन दशक से अमेरिका में ही रहते रहे और लॉक डाउन से पहले मुंबई आए थे। उनका निधन अपने आवास पर हृदयगति रुक जाने से हुआ। आज की पीढ़ी अब भी उन्हें उनके संगीतबद्ध किए गीत ‘गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा, हाफिज खुदा तुम्हारा’ से याद करती है।
एस मोहिंदर ने अपने करियर में सैकड़ों सुरीले गीत बनाए और जब जमाना वेस्टर्न म्यूजिक की तरफ ताक ही रहा था तब उन्होंने पश्चिमी वाद्य यंत्रों में उस्तादी हासिल कर ली थी। एस मोहिंदर को बंबई (अब मुंबई) में पहला मौका 1948 में रिलीज हुई फिल्म ‘सेहरा’ के लिए मिला। इस फिल्म के लिए उन्होंने कुल 10 गीत तैयार किए। ये जानना भी यहां दिलचस्प रहेगा कि ये फिल्म अभिनेता गोविंदा के माता पिता (अरुण कुमार आहूजा और निर्मला देवी) की फिल्म थी। दोनों ने इस फिल्म में गाने भी गाए।
एस मोहिंदर की मुंबई में आमद भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। वह आल इंडिया रेडियो के लिए काम किया करते थे और एक दिन घर वापस जाने के लिए लायलपुर स्टेशन पहुंचे तो पता चला उनकी ट्रेन कैंसिल हो चुकी है। जिधर से ट्रेन आनी थी, उधर दंगे छिड़ चुके थे। स्टेशन पर मौजूद कुली ने कहा कि जान बचानी हो तो सामने खड़ी ट्रेन मिले उसी में चढ़ जाओ। और, जो ट्रेन उस वक्त प्लेटफॉर्म से छूट रही थी वह एस मोहिंदर को लेकर बंबई आ गई। अनजान शहर में उतरते ही उन्होंने नजदीकी गुरुद्वारे का पता पूछा। दादर गुरुद्वारे में वह करीब एक महीने तक सबद कीर्तन गाते रहे और खुद को संभालते रहे।
जेब में उस वक्त उनके एक विजिटिंग कार्ड सुरक्षित रह गया था जो मशहूर गायिका सुरैया ने उन्हें लाहौर में दिया था। महीने भर करीब गुरुद्वारे में रहने के बाद वह सुरैया से मिलने पहुंचे और सुरैया ने उन्हें बंबई में पहला आसरा औऱ सहारा दोनों दिए। 1925 में जन्मे एस मोहिंदर को संगीत का शौक अपने पिता सुजान सिंह बख्सी से मिला जो थे तो पुलिस में दरोगा लेकिन बांसुरी बहुत बढ़िया बजाते थे। अपने पिता की नौकरी के साथ साथ वह भी जगह जगह घूमे। ननकाना में उनके पिता लगातार चार साल रहे, वहीं एस मोहिंदर ने मैट्रिक की परीक्षा पास की औऱ वहीं के गुरुद्वारे में उन्होंने गायन की पहली शिक्षा हासिल की।
बंबई में रहते हुए एस मोहिंदर ने जब फिल्म ‘शादी की रात’ के लिए लता मंगेशकर से गाना गवाया तो उनकी शोहरत पूरे फिल्म जगत में रातों रात फैल गई। रंजीत मूवीज के मालिक सेठ चंदूलाल शाह ने उनको फिल्म ‘नीली’ के लिए साइन किया। फिल्म में हीरो देव आनंद थे और हीरोइन सुरैया। शाह की शर्त यही थी कि पैसे तभी मिलेंगे जब गाने सुरैया ओके कर देंगी। सुरैया तो पहले से एस मोहिंदर को जानती थीं, उन्होंने पहली बार में ही सारे गाने पास कर दिए और एस मोहिंदर को उस जमाने में तब 10 हजार रुपये मिले थे एक फिल्म के गाने बनाने के। इसके बाद तो एस मोहिंदर का नाम हो गया और उन्होंने खूब काम किया।
1956 में रिलीज हुई फिल्म ‘शीरीं फरहाद’ के गाने ‘गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा, हाफिज खुदा तुम्हारा’ ने उन्हें चोटी के संगीतकार के तौर पर स्थापित कर दिया। साठ के दशक तक वह लगातार काम करते रहे। तमाम पंजाबी फिल्मों में भी उन्होंने संगीत दिया। 1969 में रिलीज हुई फिल्म ‘नानक नाम जहाज’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। साल 1982 में वह अपने परिवार के साथ वाशिंगटन जाकर रहने लगे थे। लेकिन, इसके बाद भी उनका मुंबई आना जाना नियमित लगा रहता था।
एस मोहिंदर के निधन पर लता मंगेशकर ने दुख जताते हुए ट्वीट किया, 'आज बहुत अच्छे संगीतकार एस मोहिंदर जी का स्वर्गवास हुआ ये सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ। वो बहुत शरीफ और नेक इंसान थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।'
Aaj bahut acche sangeetkar S Mohinder Ji ka swargwas hua ye sunkar mujhe bahut dukh hua. Wo bahut shareef aur nek insan the.Ishwar unki aatma ko shaanti pradan karein.
— Lata Mangeshkar (@mangeshkarlata) September 6, 2020