यूं ही नहीं 'न्यूटन' ने की ऑस्कर में दावेदारी, कहानी और डायलॉग्स हैं बेहद दमदार

amarujala.com- Presented by: संध्या द्विवेदी Updated Sat, 23 Sep 2017 07:08 PM IST
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Newton - फोटो : Newton
'न्यूटन' दरअसल एक ऐसा किरदार है जो बहुत कुछ बदलना चाहता है। उसे लगता है कि बदलना संभव है। वह वैज्ञानिक न्यूटन के लॉ की तरह गरीब और अमीर के बीच कोई फर्क नहीं रहने देना चाहता है। हां, जैसे ग्रेविटेशनल फोर्स गरीब हो या अमीर किसी के बीच फर्क नहीं करता। न्यूटन फेयर चुनाव करवाना चाहता है वो भी देश के उस हिस्से में जहां चुनाव मजाक से ज्यादा कुछ नहीं। ऐसे हिस्से जहां लोकतंत्र सस्पेंड है अनिश्चितकाल के लिए। 

पढ़ें- राजकुमार राव की 'न्यूटन' को लगी नजर, ऑस्कर में आने के 24 घंटे बाद ही आई ये बुरी खबर
न्यूटन के डायलॉग हैं खास 
1-फिल्म का एक डायलॉग है- न्यूटन यानि राजकुमार राव चुनाव बूथ में कहता है 'ताश अंदर रखिए...सहकर्मी जवाब देता है बूथ में तो ताश खेलने की पुरानी परंपरा है तो न्यूटन जवाब देता है डिपार्टमेंट में सस्पेंड करने की भी पुरानी परंपरा है।

2-'न्यूटन' के ये दो डायलॉग पूरी फिल्म का किस्सा कहते हैं 'मां-बाप ने नूतन कुमार नाम रखा था तो सब लोग बहुत मजाक उड़ाते थे तो मैंने दसवीं के फॉर्म में‘नू’ का ‘न्यू’ और ‘तन’ का ‘टन’ कर दिया।'  

3-एक दूसरा डायलॉग है, मुझसे पहले भी एक न्यूटन था, पढ़ाई करते वक्त उसकी बात समझ नहीं आईपर अब काम करते वक्त आ रही है कि जब तक कुछ नहीं बदलोगे न दोस्त तो कुछ नहीं बदलेगा।' 

4-संजय मिश्रा का एक डायलॉग है-वह राजकुमार राव से कहता है, 'तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है न्यूटन पता है...तो न्यूटन का जवाब मिलता है ईमानदारी...संजय मिश्रा कहता है नहीं ईमानदारी का घमंड।'

5-पंकज त्रिपाठी का एक डायलॉग है - इलेक्शन कराने के लिए वो लोग जंगल में जाते हैं तो वो न्यूटन से पूछता है क्रिकेट खेलते थे..जवाब मिलता है, हां। बालिंग या बैटिंग तो जवाब मिलता है...नहीं अपायर..पंकज का जवाब मिला 'लगा मुझे।' पंकज त्रिपाठी का ये कहने का अंदाज उन लोगों पर व्यंग था जो वाकई देश में भी दूर खड़े रहकर अंपायर की भूमिका निभाते हैं। 

6-बंदूक थमाकर जब पंकज त्रिपाठी राजकुमार राव से कहते हैं कि, 'भारी है न...ये देश का भार है जो हमारे कंधों पर है। और आखिर में राजकुमार राव बंदूक उठाकर सबपर तान देने का सीन सच्चे लोकतंत्र की उम्मीद के छलावे की कहानी कहता है। 

हल्के-फुल्के अंदाज लोकतंत्र के सबसे बड़े हथियार चुनाव का किस्सा

फिल्म 'न्यूटन' इलेक्शन सिस्टम की सच्ची कहानी कहती है। आदिवासी इलाकों के दृश्य और जवानों की जिंदगी को इतने असली अंदाज में अभी तक किसी ने परदे पर नहीं उतारा। पोलिंग बूथ के करीब जले हुए झोपड़े। दीवारों पर पुराने जमाने की चित्रकारी। देश के पॉलिटिकल सिस्टम में ट्रैप जवानों की कहानी। जिन लोगों ने वाकई में ऐसे इलाके देखे हैं उन्हें ये कहानी सच के बेहद करीब लगेगी। 

इस फिल्म में बहुत कुछ है जो ऑस्कर में न्यूटन की दावेदारी पक्की करता है। ये फिल्म सुपर-डुपर स्टार्स की नहीं बल्कि सुपर-डुपर कलाकारों की है। राजकुमार राव न्यूटन के रोल में तो पंकज त्रिपाठी एक जवान के रोल में और संजय मिश्रा की कुछ मिनटों की एक्टिंग ही इस फिल्म में अपनी छाप छोड़ जाती है। 

 

 

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