स्क्रिप्ट हिंदी में दीजिए नहीं तो फाड़ दूंगाः अमिताभ
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उम्र के इस मोड़ पर पीछे मुड़ कर देखते हैं तो क्या पाते हैं?
क्या देखें पीछे मुड़ कर! ज्यादातर मैं पीछे मुड़ कर नहीं देखता। आगे ही देखता हूं कि क्या होने वाला है। पीछे की कुछ यादें हैं, जैसा समान्यतः सभी के साथ होता है। अगर पीछे मुड़ कर देखना चाहूंगा तो वे दिन देखूंगा जो मां और बाबूजी के साथ बिताए हैं।
अब आराध्या (पोती) भी आपके जीवन में है।
हां, उनके साथ खुशी मिलती है। नाती-पोती के साथ जीवन का अपना सुख है। लेकिन काम इतना है कि कई बार उनके साथ वक्त बिताना भी दुर्लभ हो जाता है। कल ही मैं लौट कर आया तो चार-पांच दिन के बाद आराध्या से मिला था।
क्या आज भी आप अपने आप को एंग्री यंग मैन मानते हैं?
अरे नहीं, ये सब खिताब मीडिया के लोगों ने दिया है।
अमिताभ बच्चन क्या अपनी इमेज को लेकर सजग रहते हैं?
इमेज क्या होती है? मैं इसे नहीं मानता। काम है, करना है। जितना उसको करना है जीना है, उतना करते हैं जीते हैं। अगर आप उसे इमेज समझते हैं तो आप जानिए।
आप पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं। क्या कभी आत्मकथा लिखेंगे?
क्या लिखेंगे उसमें! ऐसा कुछ खास बताने को नहीं है हमारे पास।
बदल रहा है सोचने का तरीका
आप सौभाग्यशाली हैं कि आपके माता-पिता साथ रहे, बेटे-बहू भी साथ हैं लेकिन ऐसे लाखों-करोड़ों सीनियर सिटीजंस हैं जिनके परिवार उनके साथ नहीं रहते?
इस बात का मुझे दुख होता है। मेरे मन में यही भावना है कि भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है जब बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो जाए तो उसे माता-पिता का खयाल रखना चाहिए। जब मैं बड़ा हुआ था तो मुझे हमेशा यही व्यग्रता रहती थी कि कब मां-बाबूजी से कहूंगा कि अब आप मेरे साथ आकर रहिए। आराम का जीवन बिताइए। जैसे ही वह संभव हुआ तो मैंने ऐसा किया।
मैं देखता हूं कई बार मीडिया के माध्यम से कि संतान अपने माता-पिता का ध्यान नहीं रखती। मैं युवाओं को यही संदेश देना चाहूंगा कि मां-पिता न हो तो हम न होते। उन्होंने आपकी परवरिश की और लायक बनाया। मुझे लगता है कि हमारे देश के महानगरों में पश्चिमी संस्कृति का असर आ रहा है। फिर भी आम तौर पर बाकी भारत में संतान अपने माता-पिता का खयाल रखती है। फिल्में और टेलीविजन भारतीय संस्कृति को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। वे दर्शकों पर प्रभाव डालते हैं।
प्रभाव देखें तो इधर ऐसे गाने खूब बज रहे हैं जो अपसंस्कृति मालूम पड़ते हैं। आप ऐसे संगीत को कैसे देखते हैं?
मुझे लगता है कि वक्त के साथ बहुत सारी चीजें बदलती हैं। हो सकता है कि आजकल के लोग ऐसा संगीत पसंद करने लगे हों। संगीत से इधर सुर, लय, शब्दावली यह सब गायब हो गए हैं। अब रफ्तार बढ़ गई है। लोगों मैं धैर्य नहीं रहा। संगीत में भी यही हुआ। परंतु इस बीच यह भी है कि पुराना संगीत खत्म नहीं हुआ और उसे भी लोग बहुत मन से सुनते हैं।
बदल रहा है हमारा भी सिनेमा
हॉलीवुड की फिल्में भारत में खूब आ रही हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को उसके मुकाबले आप कहां पाते हैं?
हम बहुत विविधतापूर्ण सिनेमा बनाते हैं। अपनी हर भाषा में बनाते हैं। मुझे लगता है कि हमारा सिनेमा अभी बहुत आगे बढ़ेगा। विश्व में हिंदी सिनेमा की स्वीकृति काफी बढ़ी है। चालीस साल पहले विश्व सिनेमा के लोग हमसे कहते थे कि क्या नाच-गाना कर रहे हो। परंतु आज विश्व बाजार के लोग ढूंढते आ रहे हैं कि आप क्या बना रहे हैं।
इसका एक कारण और भी है कि जब से अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर खुल गई है, उससे दुनिया के व्यापारियों को लगने लगा है कि यहां 125 करोड़ ग्राहक मौजूद हैं। इस बाजार की वे उपेक्षा नहीं कर सकते। कुछ समय पहले स्टीवन स्पिलबर्ग जैसे निर्देशक मुंबई आए थे तो मैंने उनसे सवाल किया था कि क्या वाकई हमारे सिनेमा में आपकी दिलचस्पी है या आप इसे बाजार की तरह देखते हैं, तो वह गोलमोल जवाब देकर आगे बढ़ गए। दुनिया आज हमें सुपरपावर के रूप में देख रही है।
लेकिन क्या यह बाजार की संस्कृति हमारे समाज को प्रभावित नहीं कर रही है?
मैं ऐसा नहीं मानता। हम पांच हजार साल पुरानी संस्कृति और समाज हैं। ऊपरी तौर पर भले ही कहीं-कहीं ऐसा दिखे परंतु इसे बदला नहीं जा सकेगा। आज भी हम सारे तीज-त्यौहार मनाते हैं। अपने संस्कारों से जुड़े हैं। विदेश में बसे भारतीयों को भी देखेंगे तो पाएंगे उनकी जड़ें यहीं हैं। विदेश में भी हमारे त्यौहार मनने लगे हैं।
हॉलीवुड से कुछ बिगड़ेगा क्या?
विदेशी बाजार के साथ आ रहे हॉलीवुड से क्या हमारी फिल्म इंडस्ट्री को खतरा नहीं है?
यही एक खतरा है कि हॉलीवुड का सिनेमा जहां जहां गया, उसने स्थानीय फिल्मों को खत्म कर दिया। लेकिन मुझे लगता है कि हमारे संस्कार और रहन-सहन पश्चिम से बिल्कुल अगल हैं। वे इसमें सेंध नहीं लगा सकेंगे। हॉलीवुड की टाइटैनिक, सुपरमैन और रोबोट वाली फिल्में तो हमारे यहां चल सकती हैं, लेकिन वे भारतीय संस्कृति का सिनेमा नहीं बना सकेंगे।
तकनीक के साथ हिंदी कदम मिला कर चल रही है। परंतु लोकप्रियता बढ़ने के बावजूद हिंदी की देवगानरी लिपि संकट में आ रही है। लोग फेसबुक-ट्विटर-एसएमएस और साधारण परिस्थितियों में भी रोमन लिपि (अंग्रेजी) में हिंदी लिख रहे हैं?
मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं। मैं भी जब सैट पर होता हूं और कोई मुझे रोमन में लिख कर डायलॉग देता है तो मैं फाड़ कर फेंक देता हूं और उनसे कहता हूं कि इसे सही ढंग से दीजिए। हालांकि मैं रोमन पढ़ सकता हूं लेकिन हिंदी के उच्चारण बिल्कुल स्पष्ट हैं।
हिंदी का चंद्रबिंदु क्या अंग्रेजी में है? जब नहीं तो उसे रोमन में कैसे पढ़ा जाएगा? जब हिंदी को ठीक तरह से लिखेंगे नहीं तो पढ़ेंगे कैसे? इसलिए मैंने जितने भी हमारे प्रोडक्शन वाले हैं उनके अंदर एक डर डाल दिया है कि स्क्रिप्ट अगर देना है तो देवनागरी में देना, वर्ना देना मत।
पर युद्घ क्यों नहीं चला?
हां, यह सही है। टीआरपी जिससे टीवी पर सफलता का आकलन होता है, वह इस सीरियल की कम थी और इसका साफ मतलब है कि लोगों ने हमारे सीरियल युद्ध को पसंद नहीं किया। परंतु मैं इससे निराश नहीं हूं और जब भी अवसर मिलेगा मैं टीवी पर फिर ऐक्टिंग करूंगा। वह अनुभव मेरे काम आएगा।
पिछले दिनों अभिषेक बच्चन ने एक कबड्डी टीम बनाई और प्रोफेशनल लीग में उतरे। क्या आपको लगता है कि इस तरह की प्रतियोगिताओं से देश में खेलों को बढ़ावा मिलेगा?
बिल्कुल। इसका नतीजा तो मुझे मीडिया में आ रही खबरों से ही मिल गया है। कबड्डी प्रोफेशनल लीग को टीवी के माध्यम से देश भर में देखा गया और उसके परिणाम देख कर कहा जा रहा है कि क्रिकेट के बाद कबड्डी देश का दूसरा सबके लोकप्रिय खेल है। ऐसी लीग प्रतियोगिताओं में आप अगला नंबर अब फुटबॉल का देखेंगे। लेकिन टीम लेने का यह मतबल भी है कि आपको पूरे खेल को प्रमोट करना है। आप कैसे भूल सकते हैं कि आप दुनिया के सबसे युवा देश हैं।