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डायनों के किस्से सुनकर बड़ी हुई हूं: कोंकणा सेनशर्मा
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 20 Apr 2013 05:43 PM IST
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कोंकणा सेन शर्मा काफी लंबे समय के बाद 'एक थी डायन' फिल्म से हिंदी फिल्मों से अपनी वापसी कर रहीं हैं। इसके पहले वह 'सात खून माफ' फिल्म में नजर आयीं थीं। 'एक थी डायन' कोंकणा के लिए इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इस फिल्म की कहानी कोंकणा के पिता द्वारा लिखी गयी है।
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अमर उजाला के साथ बात करते हुए कोंकणा ने इस फिल्म से जुड़े किस्सों के अलावा अपने परिवार और कैरियर को लेकर लंबी बातचीत की। पेश हैं बातचीत के कुछ अंश,
लंबे अंतराल के बाद आप 'एक थी डायन' फिल्म से वापसी करने जा रही हैं। इस फिल्म को चुनने की कोई खास वजह?
अब मैं सिर्फ एक्ट्रेस नहीं रही मां भी बन गयी हूं इसलिए थोड़ा सा ब्रेक तो बनता था, लेकिन मैं दो साल तक मैं घर पर नहीं बैठी थी मैंने बांग्ला फिल्में भी की है। जो रिलीज हो रही हैं। हां यह मेरे पिता मुकुल शर्मा स्टोरी पर यह फिल्म लिखी गयी है इसलिए मैंने इस फिल्म को तुरंत हां कह दिया लेकिन विशाल और एकता जैसे नाम फिल्म से जुड़े थे। यह भी फिल्म को साइन करते हुए मेरे जेहन में रहा।
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आप अपनी फिल्मों को लेकर बहुत चूजी रही हैं ऐसे में हॉरर जॉनर की इस फिल्म में आपके भीतर की एक्ट्रेस को कितना उत्साहित किया?
बहुत ज्यादा, एक एक्ट्रेस के तौर पर इस फिल्म का अनुभव मेरे लिए बहुत खास रहा है क्योंकि अब तक मैं बहुत ही स्ट्रेट फारवॉर्ड, अच्छी, बुराईयों के खिलाफ लड़ती महिलाओं वाले किरदार ही निभाए हैं इस फिल्म ने मुङो ग्रे शेड़ परफॉर्म करने का मौका दिया है।
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आप अपने बचपन में इस तरह की कितनी कहानियां सुनती थी और क्या आप इन पर विश्वास करती हैं?
मेरे पिता ने इस फिल्म की कहानी लिखी है इसलिए मैंने डायनों की कहानियां नहीं सुनी बल्कि मुङो लगता है कि भारत का हर बच्चा ऐसी कहानियों को सुनकर बढ़ा हुआ है। बंगाल में इसे डायनबूढी और राकक्षोस कहा जाता है।
मां मुङो भी कहती थी कि जल्दी-जल्दी खाना खा लो और सो जाओ नहीं तो डायनबूढी आ जाएगी। मैं भी अपने बेटे को यही कहानी दोहराऊंगी लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम इन सब पर विश्वास करते हैं। बड़े होने पर हम जान जाते हैं कि वो सब कहानियों की बाते हैं। हकीकत से कोई उनका वास्ता नहीं है।
इस फिल्म में आपके साथ इमरान हाशमी भी हैं। उनके साथ काम करने में कोई हिचक तो नहीं हुई?
इमरान एक अच्छे एक्टर हैं। मुङो 'डर्टी पिक्चर' में उनका काम पसंद आया था।
इस फिल्म में आपके साथ हुमा और कल्की भी हैं उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा है?
सच कहूं तो इन दोनों एक्ट्रेस के साथ मेरा ज्यादा काम नहीं है। फिर भी इनके साथ काम करने में मजा आया।
क्या अब आप बॉलीवुड की किसी मसाला फिल्म में नजर आ सकती हैं?
ऐसा नहीं है कि मुङो केवल यथार्थवादी फिल्में ही पसंद हैं। मुङो सभी तरह की फिल्में पसंद हैं और मैंने की भी हैं। 'लागा चुनरी में दाग', 'आजा नचले', 'अतिथी तुम कब जाओगे' और 'वेकअप सिड' जैसी मेरी फिल्में इस बात का गवाह हैं। मैं फिल्मों का चयन मसाला और यर्थाथवादी सोचकर नहीं करती है।
अच्छी कहानी और अच्छे किरदार मेरी प्राथमिकता कल भी थे और आज भी। मैं ऐसा किरदार करना चाहती हूं, जिसमे बहुत लेयर हो। प्वाइंट ए से बी तक मेरा किरदार जाए। जहां तक बात ख्वाहिश की है तो मैं मसाला नहीं बल्कि अब एक बायोपिक फिल्म करना चाहती हूं।
मां बनने के बाद जिंदगी कितनी बदल गयी है?
मां बनने के बाद जिंदगी ही नहीं नजरिया भी पूरी तरह से बदल गया है। कामकाजी महिलाओं के लिए मेरी इज्जत और बढ़ गयी है। मुङो लगता है कि कामकाजी महिलाओं को एवार्ड मिलना चाहिए। मैं अपनी काम वाली बाई के बारे में सोचती हूं कि कैसे वो मैनेज करती होगी। उसके पास तो इतने साधन भी नहीं है।
काम और बेटे हारून को किस तरह से मैनेज करती हैं?
हर दिन आपको घर से निकलने से पहले सोचना पड़ता है। हमारी कोशिश होती है कि हारून अकेला न रहे। मैं या रणवीर उसके साथ हमेशा होते हैं। फिर भी अगर मैनेज नहीं होता तो मैं उसे अपने साथ शूटिंग पर ले आती हूं लेकिन घर पर अकेला नहीं छोड़ती हूं।
हिंदी फिल्म दर्शकों के लिए अब आपकी अगली फिल्म कौन सी होगी?
अब तो सिनेमा ग्लोबल हो गया है लेकिन मैं हमेशा से इस बात को मानती आयी हूं कि केवल हिंदी सिनेमा में अभिनय करना ही सब कुछ नहीं है इसलिए मैं अंग्रेज़ी और बंगाली फिल्मों में भी काम करती रही हूं। आगे भी जारी रखना चाहती हूं।
मैं खुद को खुशिकस्मत मानती हूं कि मैं बहुभाषी हूं। वैसे मैं विनय पाठक के साथ एक फिल्म हिंदी फिल्म कर रही हूं। जिसमें मैं अल्जाइमर से पीडित एक बूढी महिला के किरदार को निभा रही हूं। यह काफी हृदयस्पर्शी कहानी है।