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गुरमीत राम रहीम बोले, चढ़ावा न दें तो कोई पाखंडी बनेगा क्यों

Fri, 11 Sep 2015 09:06 AM IST
Updated Fri, 11 Sep 2015 09:06 AM IST
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gurmeet ram rahim exclusive interview

संत गुरमीत राम रहीम सिंह की एमएसजी-द मैसेंजर इसी साल फरवरी में रिलीज हुई थी। इस कड़ी की दूसरी फिल्म एमएसजी-2 द मैसेंजर 18 सितंबर को रिलीज हो रही है। युवाओं को नशा मुक्ति के लिए प्रेरित करने के बाद नई फिल्म में लोगों को बुरी आदतें छोड़ने का संदेश होगा। गुरमीत राम रहीम सिंह से फिल्म को लेकर बातचीत की रवि बुले ने।

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एमएसजी-1 ने टिकट खिड़की पर कितनी कमाई की, इसे लेकर भ्रम है। आपकी टीम इसे सौ करोड़ के पार कह रही है जबकि ट्रेड पत्रिकाओं में 12 से 20 करोड़ तक बताया जा रहा है। ऐसा क्यों? इसके जवीब में राम रहीम कहते हैं कि हम खुद इस बात से हैरान थे। हम पहली फिल्म की रिलीज से पहले ही दूसरी फिल्म की शूटिंग में लग गए थे। हमें पता चला कि अखबार लिख रहे हैं बड़ी भीड़ आ रही है सिनेमाघरों में, फिल्म ने चार में 80 करोड़ कमा लिए, पर ट्रेड पत्रिकाएं देख आश्चर्य हुआ।
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उन्हें काफी-कुछ आंकड़े नहीं मिले थे। बाद में हमने उन लोगों से बात की, कागज दिखाए तो वे लोग तथ्य सुधार रहे हैं। मगर फिर भी 60 करोड़ के आस-पास दिखा रहे हैं। हमारी कंपनी ने पहली बार फिल्म बनाई थी तो कलेक्शन को लेकर कई बातें हमें भी नहीं पता थी। अभी तक हम सुधार कर रहे हैं।
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यह भी कहा गया कि दर्शक खुद फिल्म देखने नहीं पहुंचे बल्कि आपके लोग सिनेमाघरों के सारे टिकट खरीद कर लोगों को मुफ्त बांट रहे थे? इस पर राम रहीम ने कहा कि हमने भी यह बातें सुनी। कुछ लोगों ने ऐसा किया कि पहले से सारी टिकटें खरीद लीं। लोगों ने टिकटें ब्लैक भी की। सबका अपना-अपना चक्कर था। कुछ को यह था कि हम गरीबों को फिल्म दिखाएंगे, कुछ को था कि नशेड़ियों को फिल्म दिखा कर उन्हें बदलने की कोशिश करेंगे।

'इस बार असल जिंदगी से प्रेरित कहानी है'

gurmeet ram rahim exclusive interview

एमएसजी-2 में क्या मैसेज है? इसके जवाब में राम रहीम कहते हैं कि इस बार असल जिंदगी से प्रेरित कहानी है। साल 2000 में राजस्थान-गुजरात के इलाके में हमें ऐसे आदिवासियों का पता चला जो कच्चा मांस खाते थे, महुए की शराब पीते थे, कपड़े नहीं पहनते थे, अंधविश्वासी थे, हत्याएं करते थे।

यह उनके सुधार और समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की कहानी है। सुधरने के बाद उन्होंने बताया कि वे एकलव्य के वंशज हैं। हम लोग डेढ़ साल वहां रहे और उन्हें प्यार से बदला। फिल्म का मैसेज है कि जिन्हें असभ्य और जंगली कहते हैं अगर वे ईश्वर के नाम से अपने आप को बदल सकते हैं तो सभ्य समाज में रहने वाले लोग अपनी गलत आदतें क्यों त्याग नहीं सकते!

आदिवासियों को उद्योगों के नाम पर जमीन-जंगलों से बेदखल किया जा रहा है। क्या इस पर कोई मैसेज है? इस पर वो कहते हैं कि हमने जहां की कहानी दिखाई है वहां ऐसा कुछ नहीं था। संसार में कई पुरानी जनजातियों को बचाए रखने की कोशिशें हैं। अंदमान में जारवा जनजाति को मूल रूप में बचाया जा रहा है। खुद को एकलव्य का वंशज कहने वालों को बदल देने से क्या इतिहास के झरोखे की कोई चीज खो नहीं जाती?

खो तो जाती है लेकिन इससे उनका जीवन सुधर जाता है। वे बीमार थे, अनेक के अंग-भंग थे, उनका इलाज नहीं हो सकता था, वे शराब पीते रहते थे, जल्दी मर जाते थे। आज उन्हें जीने की राह मिल गई है। वे खेती करते हैं। शांति से जीवन जीते हैं।

'हमारे यहां पाखंडवाद हमेशा से है'

gurmeet ram rahim exclusive interview

यह देश सदा साधु-संतों में विश्वास करता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसे तथाकथित संत आए जिनका आचरण बहुत गंदा है। क्या वजह है इसकी? इस पर राम रहीम कहते हैं कि रीत और कुरीत हमारे यहां श्रीराम जी के समय से चली आई है। पाखंडवाद सदा से है। आज कलियुग में यह बहुत ज्यादा बढ़ गया है।

मुझे लगता है कि पाखंडियों को जनता ही बढ़ावा देती है। वेदों में साफ लिखा है कि ‘भगवान से मांगो’। उससे मांगो अच्छी धरती, अच्छी हवा, अच्छा पानी, अच्छी तंदरुस्ती, अच्छी संतान। वहां कहीं नहीं लिखा है कि ‘भगवान को दो’। जो हमें बना सकता है, संसार बना सकता है क्या वो कागज के टुकड़े (रुपये) को नहीं बना सकता!

लोगों का लालच है जो पाखंडवाद को पैदा कर रहा

gurmeet ram rahim exclusive interview

हम अगर यह समझ लें और किसी को चढ़ावा न दें तो कोई पाखंडी बनेगा क्यों? लोग शॉर्ट कट चाहते हैं। उन्हें लगता है कि सौ रुपये की हेरा-फेरी करके पांच इसको दे देंगे तो अपन भी खुश और भगवान भी खुश। लोगों का लालच है जो पाखंडवाद को पैदा कर रहा है।

आप फिल्मों में हीरो बन गए हैं। क्या सिनेमा देखते हैं? इस पर वो कहते हैं कि बिल्कुल भी समय नहीं मिलता। बीमारों और नशे के शिकार लोगों से मिलने में वक्त चला जाता है। ट्विटर-फेसबुक पर सवाल आते हैं तो उनके जवाब भी देते हैं। फिल्में बेटे-बेटी देखते हैं। उनके साथ बैठे-बैठ अगर वे कुछ दिखा दें तो देख लेते हैं।

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