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ऐतिहासिक प्रेम कहानियां, कुछ ऐसा ताना बाना...थोड़ी हकीकत थोड़ा फसाना

Sun, 11 Aug 2019 12:23 PM IST
Avinash Pal विजय जैन, अमर उजाला
विजय जैन, अमर उजाला Published by: Avinash Pal Updated Sun, 11 Aug 2019 12:23 PM IST
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Evergreen Love Stories in bollywood mughal-e-azam heer ranjha jodha akbar bajirao mastani
जब प्यार किया तो डरना क्या - फोटो : अमर उजाला

'मुगल-ए-आजम', 'हीर-रांझा', 'सोहनी-महीवाल', 'जोधा-अकबर' और 'बाजीराव-मस्तानी'... बॉलीवुड को प्रेम के किस्से लुभाते रहे हैं और शायद हर लार्जर दैन लाइफ फिल्म बनाने वाले निर्देशक का सपना होता है कि वह अतीत की किसी ऐसी ही कहानी को भव्य तरीके से प्रस्तुत करें। 

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थोड़ा पलट के देखें तो बॉलीवुड की ये ऐतिहासिक प्रेम कहानियां भी दो तरह की हैं। एक वो किस्से जिन्हें हम इतिहास की प्रामाणिक मानते हैं और इतिहास की वो घटनाएं जिनमें हकीकत के अंश से ज्यादा लोगों की कल्पनाओं का रंग है, जैसे सलीम-अनारकली की कहानी या फिर बाजीराव-मस्तानी। इन सब कहानियों में बस एक ही समानता है, वो है प्रेम का उत्कट आवेग जो अक्सर मौत को छु जाता है।

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प्रेम कहानियों का गढ़ रहा है पंजाब

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हीर रांझा - फोटो : सोशल मीडिया


पंजाब इन प्रेम कहानियों का गढ़ रहा है। पंजाब की इन प्रचलित कहानियों में मिर्ज़ा-साहिबा, सस्सी-पुन्नुँ और सोहनी-माहीवाल तो सुने-सुनाए जाते हैं, हीर रांझा की कहानी सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुई। वैसे तो पंजाबी साहित्य में लगभग 30 किस्से हीर या हीर ऱांझा नाम से मौजूद हैं मगर बाबा वारिस शाह की रचना को जो मकबूलियत मिली वह किसी और को नहीं।

'हीर रांझा'
वारिस शाह की इसी रचना पर सन 1970 में चेतन आनंद 'हीर रांझा' फिल्म लेकर आए। कैफी आजमी के बिना इस क्लासिक फिल्म की चर्चा अधूरी रह जाएगी। ‘हीर-रांझा’ कैफी की सिनेमाई कविता कही जा सकती है। इस फिल्म के सारे डॉयलॉग पद्य में थे। ठीक उसी तरह जैसे 1996 में आई 'रोमियो+जुलिएट' फिल्म में शेक्सपियर के नाटक को आधुनिक परिवेश में प्रस्तुत किया गया मगर उसके सारे संवाद मूल नाटक के रखे गए। 'हीर-रांझा' फिल्म की दूसरी खासियत थी हीर यानी प्रिया राजवंश। लंदन की रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट से पढ़ी और अंगरेजी नाटकों की पृष्ठभूमि वाली प्रिया इस फिल्म में पंजाब के गांव की एक लड़की बनी थीं।

'सोहनी-महीवाल'

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लैला मजनू - फोटो : सोशल मीडिया

पंजाब की एक और दुखांत प्रेम कहानी सोहनी-महीवाल पर भी कई बार फिल्म बनी, न सिर्फ भारत में बल्कि पाकिस्तान में भी। हमारे यहां सबसे लोकप्रिय दो ही फिल्में रहीं। पहली आई 1958 में जिसमें भारत भूषण और निम्मी थे। इसके गीत बहुत लोकप्रिय हैं और आज भी यूट्यूब पर देखे जा सकते हैं। दूसरी 1984 में उमेश मेहरा और रशियन निर्देशक लतीफ फैजीएव की 'सोहनी महीवाल' आई। सनी देओल और पूनम ढिल्लो की यह फिल्म अपने वक्त में ठीक-ठाक चली।

'लैला-मजनूं'
लैला-मजनूं की कहानी जब बनी तब सुपरहिट रही। सत्तर के दशक में आई सुपरहिट फिल्म 'लैला-मजनूं' में ऋषि कपूर थे। इसकी लैला को याद करना चाहिए। लैला बनी रंजीता की यह पहली फिल्म थी, मगर इस फिल्म ने रातों-रात उन्हें सुपरस्टार बना दिया। फिल्म के गीत सुपरहिट थे। "इस रेशमी पाजेब की झंकार के सदके" या "कोई पत्थर से ना मारो" जैसे कई गीत आज भी बजते हैं और लोग पसंद करते हैं।

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'मुगल-ए-आजम' 

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मुगल-ए-आजम - फोटो : सोशल मीडिया


'मुगल-ए-आजम' के बाद के.आसिफ इसी कहानी पर एक भव्य फिल्म बनाना चाहते थे। उन्होंने 'लव एंड गॉड' बनानी चाही मगर इसको बनाने की कोशिश अपने आप में एक कहानी बन गई और 1963 में शुरु की गई इस फिल्म को आखिरकार कई मौतों और उतार-चढ़ाव के बाद 1986  में अधूरा ही रिलीज करना पड़ा। बहुत कम लोगों को पता होगा कि इसे बॉलीवुड का सबसे लंबा प्रोडक्शन माना जाता है और यह गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। इन्हीं के.आसिफ ने इससे पहले 'मुगल-ए-आजम' बनाई और एक ऐतिहासिक मिथक को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया वह फिल्म एक विश्व क्लासिक बन गई। इसके संवाद, अभिनय, दृश्य और गीत सब कुछ आज भी हमें बांध लेता है।

और लंबी हो सकती है इन फिल्मों की फेरहिस्त

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सोहनी-महिवाल - फोटो : सोशल मीडिया

फिल्मों की फेहरिस्त तो और भी लंबी हो सकती है मगर हर बार यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर ऐसा क्या है जो इन कहानियों को हर दौर में प्रासंगिक बनाए रखता है? शायद हर प्रेम कहानी दरअसल एक विद्रोह की कहानी भी होती है। 

पहले यह विद्रोह आत्मपीड़ा में छिपा हुआ था। यानी प्रेम करने की आजादी को कुचलने की तकलीफ सोहनी-महीवाल और लैला-मजनूं की दुखांत कहानियों में बदलकर रह जाते थे। मगर इनके किरदारों की खुद को खत्म करने की हद तक जिद हमें दीवाना बना देती है। 'मुगल-ए-आजम' के "प्यार किया तो डरना क्या" गीत में मधुबाला की बेबाकी तो उस दौर के युवाओं को इस कदर भाई कि वह उनके सामाजिक विद्रोह की अभिव्यक्ति बन गया।

'मुगल-ए-आजम' के एक और गीत की लाइनें हैं- "हमें काश तुमसे मोहब्बत न होती... कहानी हमारी हकीकत न होती"। शायद कहानियों की खूबसूरती यही होती है कि वह हमारी एक ऐसी हकीकत से जुड़ी होती हैं जिन्हें उनके सिवा कोई और बयान नहीं कर सकता।  

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