क्या आप भी बोर हुए थे इन लंबी फिल्मों से?
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मैैरी कॉम फिल्म की लंबाई पर हुई चर्चा के बाद यह बातें उठने लगी हैं कि आखिर किसी फिल्म की आदर्श लंबाई क्या हो। जहां तक फिल्म के पिटने का सवाल है तो उसमें फिल्म की लंबाई कितनी महत्वपूर्ण है?
निर्देशक ओमंग कुमार की ‘मैरी कॉम’ जब जन गण मन की धुन के साथ अपने अंत तक पहुंचती है, तो 120 मिनट (दो घंटे) सिनेमा हॉल में गुजारने के बावजूद दर्शक को लगता है कि कुछ कमी-सी रह गई। ओलंपिक में पदक जीतने वाली बॉक्सर मैरी कॉम की कहानी अधूरी-सी मालूम पड़ती है। लगता है कुछ अनकहा-अनदेखा ही रह गया।
एक तो कहानी के बिखरे हुए सूत्र और उस पर निर्देशक की काफी कुछ तेजी से समेटने की जल्दबाजी। आखिर ओमंग कुमार को किस बात की हड़बड़ी थी? जबकि संजय लीला भंसाली जैसी शख्सीयत का उन्हें क्रिएटिव डायरेटर के रूप में सहयोग प्राप्त था। ओमंग की हड़बड़ी में फिल्म में मैरी के रिंग और निजी जीवन का संतुलन गड़बड़ा जाता है।
कहानी में लंबी छलांग भरने के बजाय ओमंग ने 20 मिनट और फिल्म को दिए होते तो यह किसी जीवित शख्स पर बनी सबसे बेहतरीन फिल्म होती। आखिर ओमंग ने 20 मिनट और क्यों नहीं पर्दे पर रचे? क्या उन्हें डर था कि फिल्म लंबी हो जाएगी और दर्शक ऊबने लगेंगे? इस सवाल का जवाब संभवतः हां होगा।
बनती रही हैं लंबी फिल्में
बीते एक दशक में हिंदी फिल्मों ने जो कीमती तत्व गंवाए हैं उसमें एक प्रमुख बात यह है कि मनोरंजन तीन घंटे का नहीं रहा। शो का समय सिमट कर, होते-होते कुछ डेढ़ घंटे तक भी आ चुका है। इसका कारण हॉलीवुड की उन फिल्मों को माना जा सकता है, जो छोटी और कसी हुई होती हैं। जिनमें गीत नहीं होते।
रोमांच-रफ्तार होती है। परंतु पूरी दुनिया में भारतीय सिनेमा की पहचान उसका रंग-बिरंगा जीवन, भावनाओं से भरा ड्रामा, गीत-संगीत और नाच रहे हैं। क्या हम अपनी पहचान खो रहे हैं। निर्देशक बाजार के दबाव में आ कर अपनी नैसर्गिक प्रतिभा से समझौते कर रहे हैं। यह सच है कि लंबी फिल्में बनाने के लिए विख्यात रहे जेपी दत्ता, सुभाष घई, संजय लीला भंसाली और आशुतोष गोवारिकर जैसे निर्देशकों को अपनी कुछ फिल्मों के लिए बॉक्स ऑफिस पर नाकामी देखनी पड़ी।
परंतु फिल्मों का लंबा होना ही इनकी विफलता का कारण नहीं रहा। कहीं न कहीं इन्होंने अपनी फिल्मों पर पकड़ खोई थी। इसमें संदेह नहीं कि निर्देशक बॉक्स ऑफिस के लिए फिल्म बनाते हैं और सफल होने का जबर्दस्त दबाव उन पर होता है।
आमतौर पर इतनी लंबी होतीं फिल्में
1990 के दशक में छोटे पर्दे पर अंग्रेजी सिने-चैनलों के खुलने के साथ ही हिंदी फिल्मों की लंबाई घटती चली आई है। इसी दौर में पहली बार यह तय हुआ कि हमारे सिनेमा की लंबाई कम हो सकती है। 1999 में जब सुभाष घई ने जहां 181 मिनट लंबी ‘ताल’ बनाई थी, वहीं राम गोपाल वर्मा ने इससे ठीक आधी अवधि मात्र 90 मिनट में ‘कौन’ बना कर हैरान कर दिया था।
दोनों ही फिल्मों को दर्शक मिले थे। तेज रफ्तार जीवन में जहां वन डे के बाद टी-20 क्रिकेट आया, ऐसे में फिल्मों को भी छोटा होना ही था। साल 2000 तक सुभाष घई की फिल्में करीब करीब तीन घंटे (180 मिनट) की होती थीं। कर्मा (194 मिनट), राम लखन (174 मिनट), खलनायक (191 मिनट) और परदेस (191) मिनट को देखिए। लेकिन फिल्मों की लंबाई घटने के दौर में उनके लंबे ड्रामे पिटे।
2008 में उनकी ‘युवराज’ जहां 162 मिनट की थी, वहीं उसी साल आई उनकी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ 138 मिनट की। कुछ महीने पहले रिलीज हुई सुभाष घई की ‘कांची’ 140 मिनट की थी।संजय लीला भंसाली को भी वक्त के साथ खुद को समेटना पड़ा। 1999 में उन्होंने ‘हम दिल दे चुके सनम’ 188 मिनट की बनाई तो 2002 में ‘देवदास’ 183 मिनट की। दोनों तीन घंटे पार। परंतु 2007 में उन्होंने ‘सांवरिया’ को 140 मिनट और ‘गुजारिश’ को 116 मिनट में समेटा।
रामलीला थोड़ी लंबी हुई
यह जरूर है कि इसके बाद वह पिछले साल ‘गोलियों की रासलीसः राम-लीला’ जरूर 155 मिनट तक खींच ले गए। क्या यह लंबाई दर्शकों को भाई, इस पर दो राय हैं। एक और लंबी फिल्म जो हाल में आई वह थी, ‘भाग मिल्खा भाग’ (189 मिनट)। निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा को तारीफें भी मिली और आलोचना भी।
बीते बरस की सबसे कामयाब फिल्म शाहरुख खान की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ 142 मिनट की थी। निःसंदेह ढाई घंटे की यह फिल्म कसा हुआ मनोरंजन थी, जिसका लाभ इसे बॉक्स ऑफिस पर मिला।
परंतु ऐसी फिल्में रोज-रोज नहीं बनतीं। ऐसा नहीं है कि लंबे कथानक पर्दे से पूरी तरह गायब ही हो गए हैं। 2010 में राम गोपाल वर्मा ने फिल्म ‘रक्त चरित’ को दो हिस्सों में बनाया था। पहला हिस्सा 123 मिनट और दूसरा 121 मिनट का था। कुल 244 मिनट की कहानी।
लंबी फिल्मों से बचे निर्देशक
इसी प्रकार 2012 में निर्देशक अनुराग कश्यप ने 319 मिनटों की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ बनाई, परंतु उसे दो हिस्सों में बांट दिया। पहला हिस्सा 160 मिनट का और दूसरा 159 मिनट का। अगर इसे खंडित किए बगैर देखें तो इसे हिंदी की ही नहीं, दुनिया की सबसे लंबी फिल्मों में जगह मिलती है।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि नाच गाने और इमोशनल ड्रामा से भरपूर फिल्में ही हमारी पहचान रही हैं। जल्दबाजी में हम इनसे दूरी बना रहे हैं। कहानी कहने की अपनी शैली को छोड़ रहे हैं।
सच यह भी है कि देसी ठाठ वाली फिल्मों में कसावट बनाए रखने की जो योग्यता वी. शांताराम, के.आसिफ, महबूब खान से लेकर राज कपूर, मनमोहन देसाई और सुभाष घई में दिखती थी वह अब लुप्तप्राय है। ऐसा शायद इसलिए कि अब फिल्में दिल के सांचे में कम और सैट-अप तथा बाजार के सांचे में ज्यादा ढाली जाती हैं।