Chup Review: गुरुदत्त के शागिर्द का समीक्षकों से बदला, दोहराई साहिर की लाइन, यहां इक खिलौना है इंसां की हस्ती
हिंदी फिल्में देखने वालों के अरमान बहुत हैं। उनको भी लगता है कि ‘सीता रामम’ जैसी फिल्म कोई हिंदी में क्यों नहीं बनाता? अरमान हिंदी फिल्में बनाने वालों के भी कम नहीं हैं, उन्हें लगता है कि जैसी तारीफें ‘सीता रामम’ की हिंदी फिल्म समीक्षक करते हैं, उनकी फिल्मों की क्यों नहीं होती?
विस्तार
गुरुदत्त निर्देशित आखिरी फिल्म ‘कागज के फूल’ (1959) नहीं चली तो क्या इसमें उस दौर में लिखी गईं फिल्म समीक्षाओं का हाथ रहा होगा? और, क्या वाकई सिर्फ अपनी फिल्मों की आलोचनाओं से अवसादग्रस्त होकर गुरुदत्त ने कथित आत्महत्या कर ली होगी? लेकिन फिल्म ‘कागज के फूल’ के बाद तो गुरुदत्त ने कम से कम नौ फिल्मों में और काम किया और इनमें से तीन फिल्मों ‘चौदवीं का चांद’, ‘साहब बीवी औऱ गुलाम’ व ‘बहारें फिर भी आएंगी’ के तो वह निर्माता भी रहे। क्या अपनी एक फिल्म की समीक्षाओं से परेशान कोई निर्देशक व अभिनेता ऐसा कर भी सकता है। ‘कागज के फूल’ के बाद बनाई उनकी फिल्मों ने पैसा भी खूब कमाया। परदे पर फिल्म ‘चुप’ चल रही है। और, दिमाग में ये सारे सवाल भंवर की तरह मंडरा रहे हैं। फिल्म ‘चुप’ की मानें तो गुरुदत्त को उस दौर के समीक्षकों की समीक्षाओं ने मार डाला। उनका शागिर्द तभी तो अपने दौर के समीक्षकों को मारने निकला है। जिस सीट पर बैठे मैं ये फिल्म देख रहा हूं, उसकी ठीक पीछे की तीसरी कतार में वहीदा रहमान बैठी हैं। गुरुदत्त की कहानी जाननी हो तो उनसे बेहतर भला और कौन बता सकता है? लेकिन, पता नहीं फिल्म ‘चुप’ के निर्देशक आर बाल्की अपनी इस फिल्म पर शोध के लिए उनसे मिले भी कि नहीं, कम से कम उनकी फिल्म को देखकर तो नहीं लगता। मिले होते तो उन्हें ये जरूर पता होता कि ‘कागज के फूल’ गुरुदत्त की आखिरी फिल्म नहीं है।
जाने क्या तूने कही..
खैर, फिल्म शुरू होती है। सब ‘चुप’ हैं। बहस के बाद हुए सवाल जवाब के सिलसिले में एक हिंदी पत्रकार के पूछे आखिरी सवाल को सनी देओल अपनी ‘दमदार आवाज’ से चुप करा चुके हैं। गाना बजता है ‘जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैं सुनी, बात कुछ ही बन ही गई’। मन प्रफुल्लित हो उठता है। एकबारगी तो ख्याल ये भी मन में आता है कि काश, इन दिनों फिल्मों के लिए रचे जाने वाले अक्सर कानफोड़ू गीत संगीत की बजाय हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग कहे जाने वाले दौर की फिल्मों का संगीत ही क्यों नहीं फिर से प्रयोग में लाया जाता? शुरू शुरू में इस फिल्म में पार्श्वसंगीत भी बहुत जरूरी होने पर ही बजता है। लेकिन, घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, सब धान बाईस पसेरी हो ही जाते हैं। हिंदी फिल्में देखने वालों के अरमान बहुत हैं। उनको भी लगता है कि ‘सीता रामम’ जैसी फिल्म कोई हिंदी में क्यों नहीं बनाता? अरमान हिंदी फिल्में बनाने वालों के भी कम नहीं हैं, उन्हें लगता है कि जैसी तारीफें ‘सीता रामम’ की हिंदी फिल्म समीक्षक करते हैं, उनकी फिल्मों की क्यों नहीं होती?
जाने क्या मैंने सुनी...
रात 11.30 बजे करीब फिल्म ‘चुप’ देखकर सिनेमा हाल से बाहर आते वहीदा रहमान फिर मिलती हैं। सिनेमाघर की सीढ़ियां उतरते हुए। उनका हाथ थामे मेजबानों में से बस एक महिला हैं। आगे, पीछे और कोई दूसरा ना तो सितारा है, ना ही उनको विदा करने वाला। फोटोग्राफर सब आपस में ही तय रहे हैं। फ्लैश नहीं चमकाना है, सीढ़ियां उतरने में दिक्कत होगी। वहीदा रहमान अकेले ही कार से आईं थी। अकेले ही अपने ड्राइवर के साथ चली गईं। सिनेमा का ही यही अफसाना है। लौटकर दिमाग को फिर फिल्म तक ले चलते हैं। उनके बहुत करीबी साथी रहे गुरुदत्त को अपना द्रोणाचार्य मान चुके एक एकलव्य की कहानी फिल्म ‘चुप’ में सबने अभी अभी देखी है। फिल्म सेंसर बोर्ड के मुताबिक केवल वयस्कों के लिए है। लेकिन, फिल्म में सिनेमा का बचपना बहुत है।
बात बनेगी या नहीं...
फिल्म ‘चुप’ कहानी है एक ऐसे शख्स की जो फिल्म समीक्षकों को चुप कराने निकलता है। उसका मानना है कि फिल्म समीक्षक अपनी समीक्षाओं में जो सितारे फिल्म की गुणवत्ता के बारे में दर्शकों को बताने के लिए देते हैं, उससे किसी भी फिल्मकार की दुनिया तबाह हो सकती है। वह कहता भी है कि फिल्म एक नवजात शिशु की तरह होती है। पुणे के भारतीय फिल्म एवं टीवी प्रशिक्षण संस्थान का बोर्ड दिखता है। फिल्म की रीलें नजर आती हैं। और, साथ ही चलती दिखती है एक प्रेम कहानी जो इस फिल्म का इकलौता मजबूत पहलू है। नायक खुद से बातें करते दिखता है। नायिका भी शुरू में खुद से बातें करती दिखती हैं। फिर नायिका का ये अलग सा चरित्र चित्रण फिल्म को आगे ले जाने की भागदौड़ में इसे बनाने वाले भूल जाते हैं।
ये है मुंबई मेरी जान
याद क्या रह जाता है? हां! मुंबई शहर, बहुत खूबसूरत भी है और बहुत डरावना भी है। इस बार गुरुदत्त की फिल्म ‘सीआईडी’ का गाना बजता है, ‘ये है मुंबई मेरी जान’। समंदर किनारे साइकिल की कैंची में सूरज को कैद करने की कोशिश करता नायक अच्छा लगता है। मासिक धर्म के चलते अपने प्रेमी से आलिंगनबद्ध न हो पाने की मजबूरी बताती नायिका भी सुंदर लगती है। एक मां है। उसका अलग कल्पनालोक है। आंटी कहने पर वह झल्लाती है। उसके सपनों का राजकुमार अब भी उसके आसपास है। वह दुनिया को मन की और बेटी को दिल की निगाहों से देखती है । फिल्म ‘द लायन किंग’ को लेकर लिखी गई बेटी की टिप्पणी को उसने संभाल कर रखा है और जब बेटी को पहली फिल्म समीक्षा लिखने का मौका मिलता है, तो वही कॉपी तलाश भी लाती है।
सिनेमा के सौ साल
समय आगे बढ़ता जाता है। सिनेमा भी आगे बढ़ रहा है। अगले साल अपने देश भारत में ये एक सौ दस साल का हो जाएगा। 1913 में धुंडीराज गोविंद फाल्के की बनाई फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से आरंभ हुआ भारतीय सिनेमा का सफर अब वहां आ पहुंचा है, जहां दादा साहब फाल्के के नाम से मशहूर हो चुके धुंडीराज गोविंद फाल्के के सम्मान में दिए जाने वाले भारत सरकार के पुरस्कार को लोग भूलते जा रहे हैं। मुंबई के सैकड़ों कलाकारों के घरों में अब सजे दिखते हैं फाल्के के नाम पर दिए जाने वाले ऐसे दर्जनों पुरस्कार जिनका अच्छे सिनेमा को पालने पोसने से कोई लेना देना नहीं है। इसी बनावटी दुनिया पर साहिर लुधियानवी की लिखी नज्म भी फिल्म ‘चुप’ में बजती है तो याद आती हैं उसकी लाइनें, ‘यहां इक खिलौना है इंसां की हस्ती, ये बस्ती है मुर्दापरस्तों की बस्ती’। सुबह राजू श्रीवास्तव के न रहने पर भर भर के श्रद्धांजलि देने वाला जमाना उसी शाम इस बहस मुबाहिसे में उलझा दिखा कि फिल्म की समीक्षा कब, कैसे और कौन लिखे?
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो..
फिल्म ‘चुप’ भी हो सकता है कि आधी सदी बाद के लोगों को क्लासिक फिल्म लगे। लेकिन, ‘चीनी कम’ और ‘पा’ जैसी बेहतरीन फिल्में निर्देशित करने वाले आर बाल्की की आज के समय में ये एक अधपकी कोशिश दिखती है। फिल्म पूरी तरह से दुलकर सलमान की हो सकती थी, अगर वह यहां एक खालिस प्रेमी की ही भूमिका में नजर आते। निर्देशक शुरू से बता देता है कि इस आदमी के भीतर दस बीस हो न हों, दो आदमी जरूर रहते हैं। बस उस दूसरे आदमी के बारे में ढंग से लिखना बाल्की की टीम भूल गई। श्रेया धन्वन्तरि में चपलता है, चंचलता है और अभिनय की कुशलता है। वह सुंदर भी खूब दिखती है और अपने किरदार में खो जाने के लिए मेहनत भी खूब करती हैं। दुलकर और श्रेया दोनों का भविष्य सिनेमा में काफी उज्ज्वल है। बस, पता नहीं क्यों ‘चुप’ में दोनों के किरदार दर्शकों से तारतम्य बिठाने में कहीं न कहीं चूक जाते हैं।
इस फिल्मी मां पर सब कुर्बान
साथ में सनी देओल और पूजा भट्ट भी हैं और हैं सरन्या पोनवान्नन। सरन्या इस फिल्म का सबसे सुखद सरप्राइज हैं। नई पौध को ऐसे ही माली चाहिए। बिंदास, बेतकल्लुफ और बेझिझक। पूजा भट्ट को जिन्होंने ‘दिल है के मानता नहीं’ जैसी फिल्मों में देख रखा है, उनके लिए उनका ये रूप किसी ज्यादती से कम नहीं है हालांकि एक मनोवैज्ञानिक का किरदार उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया है। उधर, श्वेत श्याम दाढ़ी और सलीके से खींचे गए बालों में सनी देओल अपनी तोंद छुपाने की कोशिश में मासूम दिखते हैं। किरदार उनका क्राइम ब्रांच के मुखिया का है और वह काम भी पूरी फिल्म में बढ़िया वाला करते हैं लेकिन फिल्म के क्लाइमेक्स में उनके भीतर का असली ‘सनी देओल’ जाग जाता है। और, इसके बाद एंड क्रेडिट्स में बाल्की की टीम को कोई बंदा साहिर लुधियानवी का नाम साहिर लुधियाना लिखकर गुरुदत्त के लिए बनी इस श्रद्धांजलि के आखिरी लम्हे और खराब कर देता है। बाल्की काबिल फिल्मकार हैं। ‘चुप’ में उनकी ये काबिलियत उनकी सोच की नवीनता को भी दिखाती है। वह फॉर्मूले को बार बार तोड़ने वाले निर्देशक भी हैं। लेकिन, कोई तो होना चाहिए उनके साथ जो उनको बता सके कि वह कहां गलत कर रहे हैं।
अब यहां से कहां जाएं हम...
तकनीकी तौर पर फिल्म ‘चुप’ अपनी सिनेमैटोग्राफी से प्रभावित करती है। बांद्रा के किसी बंगले के अहाते में उगते ट्यूलिप और उसके बागबान की पूरी दुनिया विशाल सिन्हा ने अपने कैमरे से महकाई है। साइकिल से ढलान उतरने वाला दृश्य याद रह जाता है। याद और भी तमाम वे रूपकों और उपमाओं जैसी छवियां रह जाती हैं जो फिल्म के अलग अलग हिस्सों में दिखती हैं। लेकिन, भूलता ये भी नहीं कि जो फिल्मकार नहीं है या फिल्म समीक्षक नहीं है, उस दर्शक का इस कहानी से तारतम्य कैसे बैठेगा? संगीत में अमित त्रिवेदी ने धुनों के कुछ अलग से प्रयोग किए हैं। लेकिन, किसी फिल्म में अगर एक बार अगर सचिन देव बर्मन की ‘जाने क्या तूने कही’ की धुन कानों में पड़ जाए तो फिर कोई दूसरी धुन अगले दो घंटे में सुनने वाले पर असर भी करेगी, सोचना भी नहीं चाहिए। फिल्म का ओटीटी और टीवी प्रसारण का सौदा जी5 और जी सिनेमा के साथ हो चुका है। इंतजार कीजिए, फिल्म आपके ड्राइंग रूम तक बस आने ही वाली है।