बिंदास लटके-झटकों में अटक गई हैं परिणीति
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नया साल परिणीति चोपड़ा के लिए आत्मावलोकन का है। इस वक्त उनके पास कोई फिल्म नहीं है और चोपड़ा-जौहर कैंप के बाहर का उन्हें खास अनुभव नहीं है। वह फिल्म लेडीज वर्सेज रिक्की बहल में हवा के ताजा झोंके की तरह आई थीं, मगर उसके बाद ऐक्टिंग के नाम पर एक ही जैसे हाव-भाव हर फिल्म में दिखाती रहीं। परिणीति आज अपने बबली और बिंदास लटकों-झटकों में अटक गईं हैं।
परिणीति की पिछली दो फिल्मों किल दिल और दावत-ए-इश्क ने उनकी उम्मीदों को जबर्दस्त धोखा दिया। दोनों ही फिल्में टिकट खिड़की पर हलचल नहीं मचा सकीं और परिणीति तक इनके नतीजों से हिल गईं। ये फिल्में उत्तर भारत के दर्शकों को केंद्रित करके बनी थीं और वही लोग इन्हें देखने नहीं गए।
फिल्में तो कमजोर थी हीं, लेकिन इनके बुरे नतीजों के पीछे फिल्मों की मार्टेकिंग और परिणीति के पीआर का बड़ा हाथ है। ये लोग यह नहीं समझ सके कि उत्तर भारत में इन फिल्मों और परिणीति को कैसे प्रमोट किया जाना चाहिए। खुद परिणीति भी नाकामियों के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं।
नखरों से मीडिया को किया नाराज
फिल्मों में आने से पहले वह खुद पीआर रह चुकी हैं और मीडिया की कार्यशैली को खूब जानती हैं। सच यह भी है कि ऐक्टर बनने के बाद परिणीति ने खुद को ‘सुपर स्टार’ समझ लिया और अपने ‘नखरों’ से मीडिया की नाराजगी मोल ली।
परिणीति की समकालीन अभिनेत्रियों ने जितना विविधतापूर्ण काम करके जगहें बनाई है, वह इस अभिनेत्री के लिए खतरे की घंटी है।
परिणीति के लिए फिल्मों से एक ब्रेक उन्हें नए सिरे से सोचने-समझने का समय देगा कि उनकी कोशिशों में क्या कमियां रह गईं। वैसे इसमें संदेह नहीं कि इस अभिनेत्री में लंबी रेस लगाने का दम है।