धर्मेंद्र बोले, 'मन करता है कि सदाशिव को दबा दूं'
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सदाशिव अमरापुर को फिल्मों में पहला मौका गोविंद निहलानी ने अर्द्धसत्य में दिया था। लेकिन मुख्यधारा के सिनेमा में खलनायक के रूप में सदाशिव की पहचान बनाने का श्रेय निर्देशक अनिल शर्मा को जाता है। उनकी फिल्म ‘हुकूमत’ में वह डीबीडीएन उर्फ दीनबंधू दीनानाथ के रूप में ऐसे जमे कि हर कोई उनके अंदाज का कायल हो गया। सदाशिव अमरापुरकर को याद कर रहे हैं अनिल शर्मा...
हमने काफी काम साथ में किया और हम लगातार संपर्क में थे। उनके साथ मैंने जिंदगी के कई अच्छे पल गुजारे। वह बहुत अच्छे ऐक्टर और कमाल के इंसान थे। जब मैं अपनी फिल्म हुकूमत की तैयारी कर रहा था तो मुझे विलेन के रोल में अच्छा ऐक्टर चाहिए था।
राजकमल स्टूडियो में मैं एक फिल्म की मिक्सिंग कर रहा था तो वहीं पर फिल्म अर्द्धसत्य की भी मिक्सिंग होती देखी। उस फिल्म में मैंने उन्हें देखा। दो-तीन सीन थे। उनका किरदार कमाल का था। तब मैंने उनसे तुरंत संपर्क किया और बुलाया। तब उन्हें कल्पना नहीं थी कि मैं उन्हें धर्मेंद्र के अपोजिट मुख्य खलनायक की भूमिका देने जा रहा हूं। वह बहुत ही सरल-सीधे व्यक्ति थे।
मैं चल नहीं पा रहा हूं
मैंने हुकूमत में उन्हें सूट-बूट वाले खलनायक का रोल दिया। उनका पहला ही सीन धर्मेंद्र के साथ प्री-क्लाइमेक्स का रखा। उन्हें ओवरकोट, पैंट-शर्ट और बूट पहनाए। तब उन्होंने बड़ी सहजता से कहा कि आज से पहले मैंने कभी सूट-बूट नहीं पहने हैं। ये पहन कर काम कर पाना मुश्किल लग रहा है। स्थिति यह हुई कि सदाशिव अमरापुरकर बूट पहन कर चल भी नहीं पा रहे थे।
उन्होंने हंस कर कहा कि अनिल जी मुझे इनके साथ थोड़ी प्रैक्टिस करने दीजिए। इन्हें पहन कर थोड़ा चल-फिर लूं। तब मैंने कहा कि ठीक है कि आप ये कपड़े रखो, जूते रखो और इन्हें पहने रहो। उन्होंने वही किया। पूरे दिन पहने रहे। तब जाकर अगले दिन काम शुरू हुआ। उनकी यह सादगी मैं कभी नहीं भूल सकता।
धर्मेंद्र के सामने भी जमे
जब उन्हें हुकूमत में लिया था तो कई लोगों ने कहा कि धर्मेंद्र जैसे मसलमैन और स्टार के सामने कैसा विलेन लिया है। उसकी बॉडी तो है ही नहीं। परंतु मैंने कहा था कि बॉडी में पावर नहीं है, लेकिन बंदे की आंखें बहुत पावरफुल है, डायलॉग डिलेवरी में बहुत दम है। हुआ भी यही।
जब पर्दे पर ‘हम चींटियों को तब तक नहीं मसलते जब तक वो हमें काटने लायक न हो जाएं’ डायलॉग उन्होंने बोला तो देखने वाले देखते रह गए। उनका डीबीडीएन (दीनबंधू दीनानाथ) का किरदार अमर हो गया। कई लोग आज भी उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं।
इसके बाद मैंने उन्हें दो और फिल्मों (ऐलान-ए-जंग और फरिश्ते) में लिया। मुझे याद है कि जब हम ऐलान-ए-जंग का पहला शो गेटी सिनेमा (मुंबई) में देख रहे थे, उनकी एंट्री पर जोरदार तालियां-सीटियां बजीं और उनके डायलॉग ‘नाग हूं मैं नाग... काला नाग’ पर पूरा थियेटर उठ कर तालियां बजाते हुए खड़ा हो गया। एक वक्त उनका जबर्दस्त क्रेज हो चुका था। उन्होंने हर तरह के रोल किए। वे उस रंग की तरह थे जो पानी में मिल जाता है।
मन करता है कि मार डालू
धर्मेंद्र जी के साथ उनकी केमेस्ट्री बहुत अच्छी थी। वैसे मजेदार बात यह है कि जब पहली बार धर्मेंद्र ने सदाशिव अमरापुरकर को देखा था तो मुझसे कहा था कि क्या विलेन ले आए यार। लेकिन फिर जब पहला सीन हुआ तो वह मेरे पास आए कि यह बहुत अच्छा है। इसकी आंखों में आग है। ऐसे-ऐसे एक्सप्रेशन देता है कि चिढ़ा देता है। मन करत है, दबा दूं। इसके साथ काम करने में बहुत मजा आएगा। इतने पावरफुर ऐक्टर थे सदाशिव अमरापुरकर।
काम के प्रति उनका समर्पण यह था कि वे हमेशा सीन पहले ले लेते थे और सैट पर पूरी तैयारी से आते थे। थियेटर के ऐक्टर थे तो उन्हें कुछ भूलता नहीं था। एक-एक लाइन याद रहती थी। पूरा सीन याद रहता था। वन-टेक ऐक्टर थे। धीरे-धीरे हमारे घरेलू संबंध बन गए थे।
उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था। खास तौर पर साहित्य पढ़ते थे। आते थे तो बहुत कहानियां सुनाते थे। हिंदी से भी कहीं ज्यादा वे मराठी सिनेमा और नाटकों के बड़े स्टार थे। डीबीडीएन (हुकूमत) और महारानी (सड़क) जैसे किरदार जो उन्होंने किए वह हमारी फिल्मों में मील का पत्थर हैं। अगर आप हिंदी फिल्मों के टॉप टेन खलनायकों की सूची बनाएंगे तो उन्हें जरूररखना पड़ेगा।
(जैसा की अनिल शर्मा ने रवि बुले के साथ शेयर किया)