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Exclusive: उस फिल्म को देखकर ऐसा लगा जैसे मेरी दुनिया बदल गईः शबाना आजमी

Sun, 07 Jan 2018 02:28 PM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 07 Jan 2018 02:28 PM IST
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after seeing that film it change my life Shabana Azmi
shabana
कॉलेज के दिनों में हम लोग थियेटर करते थे। खर्च फारूख शेख की जेब से जाता था। उस दौरान फिल्म इंस्टीट्यूट की कुछ डिप्लोमा फिल्में देखा करती थी। उन्हीं दिनों एक फिल्म देखी- ‘सुमन’, जया भादुड़ी की फिल्म थी। उस फिल्म को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई और उस दिन से मेरी दुनिया बदल गई।
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उस माहौल में मेरी परवरिश हुई, उसमें दो बहुत ही बड़े लोगों का प्रभाव मेरे ऊपर था। एक मेरे वालिद कैफी आजमी, जो एक जाने-माने कवि थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे और मेरी वालिदा शौकत आजमी,  जो पृथ्वी थियेटर में काम करती थीं। मेरी मां मुझे अक्सर अपने साथ टूर पर लेकर जाती थीं। पृथ्वीराज कपूर ने मेरे लिए कुछ कॉस्ट्यूम बनवा दिए थे और जब कोई भी ग्रुप सीक्वेंस या कुछ होता था, तो मुझे उसमें डाल दिया जाता था। 
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shabana azmi
दूसरी तरफ, मेरे वालिद कैफी साहब कॉम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे और मजदूर किसानों के साथ काम करते थे, तो उनके साथ मैं भी जाती थी और सारे कार्यकर्ता मुझे कंधों पर बैठाकर घूमते थे। इन दोनों का ही बहुत मजबूत प्रभाव मुझ पर था। हम रहते भी एक ऐसी जगह थे, जहां आठ परिवार एक साथ रहते थे। एक कमरे में सरदार जाफरी रहा करते थे, एक कमरे में हमारा परिवार था। वहीं अन्य कमरों में पार्टी के बाकी लोग। पारिवारिक माहौल से काफी कुछ हमने सीखा। 

फिर एक वक्त आया जब मुझे करियर चुनना था, तो मैंने अपनी वालिदा का करियर चुना और उसके बाद अपने वालिद की तरह सामाजिक कार्यकर्ता भी हूं। मैं जब स्कूल में थी, तो हमेशा नाटकों में हिस्सा लेती थी, पर हमेशा लड़कों का रोल ही करती थी। फिर जब सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ने गई, तो वहां कोई हिंदी थियेटर ग्रुप नहीं था। फिर मैंने और फारूख शेख, जो मुझसे दो साल सीनियर थे, ने मिलकर 'हिंदी नाट्य मंच' बनाया। इसके प्रेसिडेंट वह थे और जनरल सेक्रेटरी मैं थी। 

 

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शबाना - फोटो : SELF

हमें कॉलेज से थियेटर चलाने के लिए एक भी पैसा नहीं मिलता था। सारा पैसा फारूख की जेब से जाता था और जब कभी प्ले में फर्नीचर की जरूरत पड़ती, तो मैं अपनी एक दोस्त के घर से फर्नीचर मंगवाती थी। हमें हमेशा वाहवाही मिलती थी। हमें बेस्ट प्ले, बेस्ट एक्टर और बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिलता था। सही मायनों में मेरी दिलचस्पी वहीं से हुई। उस दौरान मैंने फिल्म इंस्टीट्यूट की कुछ डिप्लोमा फिल्में देखीं। उनमें जया भादुड़ी की एक फिल्म थी 'सुमन'। उस फिल्म को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई। मैंने सोचा कि मुझे भी ऐसा ही काम करना है। 

मैंने अपने वालिद को बताया कि मुझे एक्ट्रेस बनना है, आपको कोई ऐतराज तो नहीं है? मेरे वालिद ने मुझे कहा, 'अपने लिए जो भी रास्ता चुना है, उसमें मुझे कोई भी ऐतराज नहीं होगा, बशर्ते आप यह वादा करें अपने आप से कि आप सबसे बेहतरीन अदाकारा बनेंगी।' मुझे इस बात की बेहद खुशी हुई कि मेरे पिता ने मेरे फैसले में साथ दिया। फिर जब मैं फिल्म इंस्टीट्यूट गई, वहां पढ़ने के दौरान ही मुझे मेरी पहली फिल्म मिली, जो ख्वाजा अहमद अब्बास की 'फासला' थी और उसके बाद मुझे कांतिलाल राठौड़ की फिल्म 'परिणय' मिली, जिसकी शूटिंग मैंने हमारा कोर्स खत्म होने के बाद शुरू की थी। 

 
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लखनऊ साहित्य महोत्सव में शबाना अजमी - फोटो : अमर उजाला
फिल्मों में काम करने के दौरान ऐसी दो फिल्में मिलीं, जो मेरे जीवन में तब्दीली लेकर आईं। एक है फिल्म गौतम घोष की 'पार'। जिस तरह के किरदार मैं करती हूं, उनमें मेरी कोशिश रहती है कि मैं उसे पूरी ईमानदारी से निभाऊं। इस फिल्म के दौरान भी मैंने ऐसा ही किया। हमारे गेस्ट हाउस में एक लड़की झाड़ू लगाती थी, मैंने उसे देखना शुरू किया। उसकी एक्टिविटीज पर गौर करती थी, फिर हमारी दोस्ती हो गई। उसने मुझे अपने घर बुलाया। 

मैं उसके घर गई और वहां का नजारा देखकर स्तब्ध थी। उसके घर में बिजली नहीं थी, थोड़ा-सा पानी था और एक छोटे से कमरे में आठ लोग रहते थे। मैं हैरत में पड़ गई कि इतनी परेशानियों के बावजूद यह औरत मुरस्कुराती हुई अपना काम करती है। फिर मैंने सोचा कि अगर मैं मुंबई वापस गई और इस जैसी औरत के लिए काम नहीं किया, तो यह इसके लिए नाइंसाफी होगी। 


 

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इसी वजह से मैं 'निवारा हक', जो झुग्गी-झोपड़ियों के लिए काम करने वाली संस्था है, के साथ जुड़ी और उनके साथ काम करने लगी। दूसरी फिल्म महेश भट्ट की 'अर्थ' है। इस फिल्म के साथ भी कई दिलचस्प किस्से जुड़े हैं। उदाहरण के लिए, जब हमने फिल्म बनाई और डिस्ट्रीब्यूटर को दिखाई, तो उन्हें फिल्म बहुत पसंद आई, लेकिन उन्होंने कहा कि हम इस फिल्म को तभी खरीदेंगे, जब आप इसका क्लाइमैक्स बदल देंगे। 

इसका कारण उन्होंने दिया कि लोग इसे स्वीकार ही नहीं करेंगे कि किसी हिंदी फिल्म में ऐसा हो कि शौहर अपनी पत्नी से माफी मांग रहा हो और पत्नी उसे अपनाने से मना कर दे। बहरहाल, कई चर्चाओं के बाद फिल्म रिलीज हुई। लोगों ने इसे बहुत सराहा। मेरे काम की तारीफ हुई और मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
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