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Hindi News ›   Entertainment ›   Bollywood ›   Abolish censorship: Shyam Benegal

'फिल्म सेंसर बोर्ड की समाज को जरूरत नहीं'

Wed, 23 Dec 2015 05:19 PM IST
Updated Wed, 23 Dec 2015 05:19 PM IST
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Abolish censorship: Shyam Benegal

समानांतर फिल्मों के निर्देशक श्याम बेनेगल का मानना है कि सेंसर बोर्ड या सेंसरशिप की समाज को जरूरत नहीं है। कोई संस्था अगर समाज को बताए कि क्या देखना सही है और क्या गलत, तो ऐसा करने में संस्था सक्षम नहीं है।

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कुछ दिन पहले 81 साल के हुए श्याम बेनेगल ने बीबीसी से खास बातचीत में सेंसर बोर्ड, अच्छा सिनेमा, उनकी पसंद के निर्देशकों पर अपने विचार साझा किए। वे कहते हैं, "मैं पहले भी सेंसर विरोधी था। मेरा यह रवैया आज भी नहीं बदला है। मैं मानता हूँ कि हर समाज में खुद की गलतियों को ठीक करने का तंत्र होता है। लोगों को पता है उन्हें क्या देखना चाहिए और क्या नहीं।"
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उन्होंने कहा, "फिल्म बनाने वाले अपनी सामाजिक जिम्मेदारी जानते हैं। फिल्मों के गलत प्रभाव की फिक्र करने वाले नहीं सोचते कि जिंदगी पर सबसे बड़ा प्रभाव जिंदगी का ही होता है।" वह मानते हैं, "फिल्मी दुनिया में स्पर्धा भी बहुत है, तो जाहिर है कि जब सेंसर अवरोध बनता है, तो लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए किसी न किसी तरीके से फिल्मों में मसाला डालेंगे।"

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यह चूहे-बिल्ली का खेल है

Abolish censorship: Shyam Benegal

वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि दर्शकों को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन जब सेंसर की वजह से कोई गाना या फिल्म चर्चा में आती है, तो रुचि बढ़ जाती है। यह चूहे-बिल्ली का खेल है। सेंसर का कोई तुक नहीं है, बल्कि वह लोगों के विचारों को और वीभत्स बनाता है।"

दिबाकर बनर्जी, अनुराग कश्यप, शूजीत सरकार जैसे निर्देशकों को पसंद करने वाले श्याम बेनेगल के मुताबिक, "अच्छी फिल्म वो होती हैं, जो इंद्रियों, संवेदना और बुद्धि पर असर करें। कोई भी एक पहलू अगर बाकी बच गया तो मुझे वह फिल्म इंटरटेनमेंट का पूरा पैकेज नहीं लगेगी।"

फिल्म निर्माण में बदलाव के बारे में उनका कहना था, "आज सबसे बड़ा फर्क फिल्म शिक्षा से पड़ा है। बेहतरीन टेक्नॉलॉजी से सीखे हुए निर्देशक को और आसानी हो जाती है। 50 साल पहले काम करने वाले सब कुछ थिएटर से सीखे थे।"

एंटरटेनमेंट की सबकी अपनी-अपनी व्याख्या है

Abolish censorship: Shyam Benegal

उनका मानना है, "जब आज कहानी बताने की तालीम के साथ फिल्ममेकर के पास आधुनिक तकनीकी सहयोग भी है, तो आज बिल्कुल नया निर्देशक भी कुछ हद तक मंझा हुआ होता है।"

आज लोग निर्देशक के नाम से फिल्में देखने जाते हैं। अब फिल्मों में निर्देशक भी नायक बन रहे हैं। इस पर श्याम बेनेगल कहते हैं, "यह बदलाव काफी पहले होना चाहिए था पर देर से ही सही, यह अच्छी बात है। जैसे थिएटर अभिनेता का माध्यम है वैसे ही फिल्म निर्देशक का माध्यम है।"

वे आगे कहते हैं, "कई बड़े स्टार के नाम से लोग फिल्म के प्रति आकर्षित होते हैं लेकिन अंत में वो जो देख रहे हैं, वो एक निर्देशक का विजन है। फिल्म की गुणवत्ता निर्देशक की सर्जनात्मकता, क्षमता और सिनेमा माध्यम की समझ से तय होती है।"

उनका कहना था, "एंटरटेनमेंट की सबकी अपनी-अपनी व्याख्या है। सिर्फ मनोरंजन के लिए बनाई गई फिल्में मुझे कतई पसंद नहीं आएंगी। सिनेमा एक कला है, सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं।"

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