हाल ही के समय में देश में राजद्रोह कानून की बड़ी चर्चा हो रही है। पिछले कुछ समय से लगातार इस कानून के नाम पर लगातार बखेड़ा खड़ा हो रहा है। इसकी वजह भी है कि भारत में पिछले पांच सालों में औसतन 28 फीसदी सालना राजद्रोह के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है।
क्या है राजद्रोह, क्या हैं कानूनी बंदिशें और फिर क्यों मचा है इस पर बवाल, जानें पूरा इतिहास
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कानून क्यों चर्चा में?
हाल ही में किसान आंदोलन के समर्थन देश की राजधानी दिल्ली में हुई 26 जनवरी, 2021 को किसान ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न हस्तियों द्वारा ट्वीट किए गए थे। इसे लेकर एक टूलकिट सामने आया था। इस संबंध में एक युवा प्रदर्शनकारी दिशा रवि की गिरफ्तारी की गई थी। हालांकि, बाद में शीर्ष न्यायालय ने उसे जमानत दे दी। लेकिन इस मामले ने एक बार फिर देश में राजद्रोह कानून को लेकर बहस छेड़ दी है।
जानिए क्या है देशद्रोह?
भारतीय कानून संहिता यानी आईपीसी की धारा 124ए में दी गई परिभाषा के अनुसार, सरकार विरोधी सामग्री के लिखने, बोलने, प्रचारित-प्रसारित करने, उसका समर्थन करने या फिर राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों और संविधान का अपमान करने की कोशिश करता है तो उसे तीन साल की सजा अथवा आजीवन कारावास हो सकता है।
दुरुपयोग की आशंका
सोशल मीडिया पोस्ट पर मौजूद सरकार के खिलाफ या सरकारी नीतियों के विरोध वाली पोस्ट को लाइक करने या फिर उसे शेयर करने, कई दफा कार्टून बनाने, शिक्षण संस्थानों में नाटक या प्ले की विषयवस्तु के खिलाफ भी इस कानून का इस्तेमाल किया गया है। आर्टिकल-14 वेबसाइट के डाटा के अनुसार, हालिया चर्चित मुद्दों जैसे- किसान आंदोलन से जुड़े प्रदर्शन पर 06 मामले, हाथरस प्रकरण से जुड़े 22, सीएए विरोधी प्रदर्शन पर 25 और पुलवामा हमले के बाद 27 मामले इस कानून के तहत दर्ज किए गए हैं। गौर करने योग्य बात यह है कि देश में राजद्रोह के मामलों में दोष साबित होने की दर 2014 के 33 फीसदी से घटकर 2019 में तीन फीसदी पर आ गई है।
राजद्रोह कानून कब बना?
1860 में बने इस कानून को 1870 के दशक में भारत में जब ब्रिटिश राज के दौरान लागू किया गया था। ऐसा कानून अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, मलेशिया, सूडान, सेनेगल, ईरान, तुर्की और उज्बेकिस्तान में भी है। ऐसा ही कानून अमेरिका में भी है, लेकिन वहां के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इतनी व्यापक है कि इस कानून के तहत दर्ज मुकदमे लगभग नगण्य हैं। जबकि ऑस्ट्रेलिया में सजा की जगह सिर्फ जुर्माने का प्रावधान है।
कमेंट
कमेंट X