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स्कूली किताबों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं को दब्बू दिखाया जाता है, यूनेस्को की रिपोर्ट

Tue, 30 Jun 2020 06:43 AM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Tue, 30 Jun 2020 06:43 AM IST
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UNESCO said in the Global Education Monitoring Report, half the population was underestimated in school textbooks
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

यूनेस्को वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट में दावा किया है कि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में आधी आबादी को कम आंका जा रहा है। इसमें कहा गया कि जहां कहीं भी इनको शामिल भी किया जाता है तो इन्हें सिर्फ पारंपरिक भूमिकाओं में दर्शाया गया है। पुरुषों की तुलना में इनकी छवि हल्की रखी जाती है और दब्बू दिखाया जाता है। 

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वार्षिक रिपोर्ट के चौथे संस्करण में कहा गया कि महिलाओं को ‘कम प्रतिष्ठित’ पेशों में दर्शाया गया है और उसमें भी अंतर्मुखी एवं दब्बू लोगों की तरह। उदाहरण के तौर पर पुरुषों को डॉक्टर तो महिलाओं को नर्सों के रूप में दिखाना, महिलाओं को केवल भोजन, फैशन या मनोरंजन से संबंधित विषयों में दिखाना, महिलाओं को स्वैच्छिक भूमिकाओं में और पुरुषों को वेतन वाली नौकरियों में दिखाया जाना आदि। 

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लेकिन, इन जगहों पर छवि बदलने की चाह 
रिपोर्ट में हालांकि उन कुछ देशों का भी जिक्र है, जहां अधिक लैंगिक संतुलन को दिखाने के लिए पाठ्यपुस्तकों में छवियों को बदलने की कोशिश हो रही है। जैसे अफगानिस्तान, वहां 1990 के दशक में छपने वाली पाठ्यपुस्तकों से महिलाएं नदारद थीं।
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2001 के बाद से, उनकी उपस्थिति बढ़ी लेकिन दब्बू और माओं, देखभाल करने वालों, बेटियों एवं बहनों जैसी घरेलू भूमिका में। इसी तरह ईरान इस्लामी गणराज्य की 90 फीसदी पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा में महिलाओं की केवल 37 प्रतिशत छवियां देखी गईं।

इन किताबों में महिलाओं का जिक्र नहीं

फारसी और विदेशी भाषा की 60, विज्ञान की 63 और सामाजिक विज्ञान की 74 फीसदी किताबों में महिलाओं की कोई तस्वीर नहीं है। रिपोर्ट में महाराष्ट्र के पाठ्यपुस्तक उत्पादन एवं पाठ्यक्रम अनुसंधान ब्यूरो द्वारा 2019 में लैंगिक रूढ़िवादों को हटाने के लिए कई पाठ्यपुस्तक छवियों में सुधार का भी संज्ञान लिया गया।

इसमें दूसरी कक्षा की पाठ्यपुस्तकों में महिला और पुरुष दोनों घर के काम करते दिख रहे हैं, वहीं एक महिला डॉक्टर और पुरुष शेफ की भी तस्वीर थी। विद्यार्थियों से इन तस्वीरों पर गौर करने और इन पर बात करने के लिए कहा गया था।

क्या है जीईएम रिपोर्ट 

ग्लोबल एजुकेशन मॉनीटरिंग रिपोर्ट (जीईएम रिपोर्ट) एक स्वतंत्र टीम बनाती है और यूनेस्को इसे प्रकाशित करता है। इसे शिक्षा पर सतत विकास लक्ष्य पूरा करने में हुई प्रगति की निगरानी का आधिकारिक आदेश प्राप्त है। इस रिपोर्ट में इटली, स्पेन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, मलेशिया, इंडोनेशिया, कोरिया, अमेरिका, चिली, मोरक्को, तुर्की और युगांडा में भी पाठ्यपुस्तकों में महिलाओं के साथ जुड़ी इन रूढ़ियों का उल्लेख है।

कोरोना महामारी का शिक्षा जगत पर सबसे बुरा प्रभाव 

रिपोर्ट में दावा किया गया कि कोरोना महामारी का सबसे बुरा प्रभाव शिक्षा जगत पर पड़ेगा। बच्चों की सीखने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होगी और इसका दूरगामी नुकसान होगा। यूनेस्को ने सरकारों से इस मामले में विशेष ध्यान देने और शिक्षा प्रणालियों के पुनर्निर्माण के लिए समावेशी चुनौतियों पर कड़ी नजर रखने पर जोर दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक स्कूलों कब तक बंद रहेंगे इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा एक विकल्प जरूर है लेकिन एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसे बच्चों का है जिनके पास संसाधन नहीं हैं। उनके लिए यह बेहद मुश्किल व्यवस्था है और इससे सामाजिक आर्थिक गैप बढ़ने का संकट है। 

स्कूल बंद होने से 154 करोड़ बच्चे प्रभावित

रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल बंद होने से दुनियाभर में 154 करोड़ बच्चे प्रभावित हुए। इनमें भी लड़कियों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ रहा है। उनकी पढ़ाई बंद होने का खतरा बढ़ेगा और शिक्षा में लैंगिक अंतर भी बढ़ेगा। 

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