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करियर डायरीज: अर्श से फर्श पर आया डूसू चुनाव, 17 साल में बदली तस्वीर; धनबल-बाहुबल पर अंकुश से बदली रौनक

Sun, 30 Aug 2026 02:05 PM IST
शाहीन परवीन रश्मि शर्मा
रश्मि शर्मा Published by: शाहीन परवीन Updated Sun, 30 Aug 2026 02:05 PM IST
सार

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव का रंग-रूप पिछले 17 वर्षों में काफी बदल गया है। कभी चुनाव प्रचार में दिखने वाली भारी भीड़ और रौनक अब पहले जैसी नजर नहीं आती। धनबल और बाहुबल पर सख्ती के बाद चुनाव का तरीका भी बदल गया है।

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DUSU Elections Lose Their Old Shine, Campaigning Changes Over 17 Years
DUSU Election 2026 - फोटो : अमर उजाला, ग्राफिक

विस्तार

DUSU Election: बीस साल पहले तक अपनी भव्यता के चलते नगर निगम चुनाव और विधानसभा चुनाव के बराबर आंका जाने वाला डूसू चुनाव अब अर्श से फर्श पर आ गया है। वर्ष 1955 से शुरु हुए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव का बीते 17-18 वर्षों में रूप बदल गया है। धनबल-बाहुबल पर अंकुश लगने के कारण इसकी तस्वीर ऐसी बदली है कि चुनाव अब फीका ही रहता है।

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इस साल के डूसू चुनाव का बिगुल बज चुका है, लेकिन वर्षों पुरानी वह रौनक इस साल भी गायब है। लिंगदोह कमेटी के सख्त दिशा-निर्देश, पांच हजार की चुनावी खर्च सीमा और प्रचार पर बढ़ी पाबंदियों तथा डीयू प्रशासन की सख्ती ने डूसू चुनाव को फिर जमीन पर ला दिया है। कभी जिस चुनाव में शक्ति प्रदर्शन और तड़क-भड़क पहचान बन गए थे, आज वही चुनाव नियमों और बंदिशों के बीच अपनी पुरानी चमक तलाश रहा है।

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चुनावी प्रचार पर सख्ती, नियम हुए और कड़े

इस साल भी डीयू प्रशासन ने चुनाव आचार संहिता के जरिए छात्र संगठनों और उम्मीदवारों पर शिकंजा कसने की कोशिश की है। बीते कई वर्षों से छात्र चुनाव के नाम पर सार्वजनिक संपति को नुकसान पहुंचाते हैं। इस कारण वर्ष 2024 में तो कोर्ट ने मतगणना पर रोक लगा दी थी। बीते साल के अनुभवों को देखते हुए डीयू प्रशासन ने दो साल से काफी सख्ती की है। इस साल तो नियम भी कड़े किए गए हैं, प्रचार के नाम पर लग्जरी गाडियों की एंट्री को प्रतिबंधित किया गया है।  

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गाड़ियों के काफी चालान भी काफी हो रहे हैं। इस साल पुलिस और डीयू प्रशासन अन्य वर्षों के मुकाबले में काफी सख्त हैं। डूसू की शुरुआत वर्ष 1955 में हुई थी। डूसू के पहले अध्यक्ष गजराज बहादुर नागर थे। हालांकि उस समय छात्रों को सीधे मतदान का अधिकार नहीं था।

1974 में बदला चुनाव का पूरा चेहरा

1974 डूसू चुनाव के इतिहास में निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसी साल प्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत हुई। अब कॉलेजों के प्रतिनिधियों के बजाय विश्वविद्यालय के छात्र सीधे मतदान कर अपने छात्रसंघ पदाधिकारियों को चुनने लगे। प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के तहत डूसू के पहले अध्यक्ष आलोक कुमार बने, जो एबीवीपी से जुड़े छात्र नेता थे। इसके बाद डूसू चुनाव धीरे-धीरे छात्र राजनीति से निकलकर बड़े राजनीतिक प्रभाव वाले चुनाव में बदलता चला गया।

जब डूसू चुनाव पहुंचा अर्श पर : एक समय डूसू चुनाव की भव्यता ऐसी हो गई कि इसे दिल्ली के नगर निगम और विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जाने लगा। छात्र नेताओं के प्रचार में बड़ी संख्या में समर्थक, वाहनों के काफिले और भारी प्रचार अभियान नजर आने लगे। चुनाव की गूंज राष्ट्रीय राजनीति तक सुनाई देने लगी।

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