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SC: क्या APAAR ID फॉर्म में मिलेगा 'Opt Out' विकल्प? जानें सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान क्या कहा

Mon, 20 Jul 2026 05:01 PM IST
Akash Kumar एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Akash Kumar Updated Mon, 20 Jul 2026 05:01 PM IST
सार

Supreme Court APAAR ID: सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई से कहा है कि वह देशभर में अपार आईडी के लिए अभिभावकों को सहमति देने या उससे इनकार करने का स्पष्ट विकल्प उपलब्ध कराए। कोर्ट ने कहा कि ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले को पूरे देश में लागू किया जाएगा।
 

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Supreme Court Directs CBSE to Allow Parents to Opt Out of APAAR ID Consent Process, Read here
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

Supreme Court APAAR ID: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरे देश में लागू करने का निर्देश देगा, जिसमें ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री (APAAR) आईडी के लिए बनाए गए मॉडल सहमति (कंसेंट) फॉर्म में अभिभावकों को सहमति देने, सहमति से इनकार करने (Refuse Consent) और योजना से बाहर रहने (Opt Out) का विकल्प देने को कहा गया है।

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क्या है APAAR ID?

अपार योजना को शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत शुरू किया था। इसके तहत छात्रों के लिए 12 अंकों की एक स्थायी और यूनिक आईडी बनाई जाती है। यह आईडी छात्रों के सभी शैक्षणिक रिकॉर्ड, जैसे मार्कशीट, डिग्री और सह-पाठ्यक्रम उपलब्धियों को डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने का काम करती है।

  • APAAR - Automated Permanent Academic Account Registry 
  • 12 अंकों की स्थायी छात्र आईडी
  • एनईपी 2020 के तहत शुरू हुई योजना
  • डिजिटल शैक्षणिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की व्यवस्था

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ चार छात्रों के अभिभावकों की ओर से दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अपार योजना की वैधता को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह योजना छात्रों को आधार बनवाने के लिए मजबूर करती है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ने ओडिशा हाईकोर्ट के दिसंबर 2025 के फैसले को चुनौती नहीं दी है। इसलिए वह सीबीएसई को यह फैसला पूरे देश में लागू करने का निर्देश देगा।

पीठ ने कहा, "हम सीबीएसई को यह फैसला पूरे देश में लागू करने का निर्देश देंगे, क्योंकि हाईकोर्ट के आदेश को स्वीकार कर लिया गया है। हम सीबीएसई को इन मुद्दों की जांच करने का भी निर्देश दे रहे हैं।"

अदालत ने कहा कि इस संबंध में औपचारिक आदेश बाद में अपलोड किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह सीबीएसई को याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए सहमति और डाटा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी विचार करने का निर्देश देगा।
 

  • सीबीएसई को हाईकोर्ट का फैसला देशभर में लागू करने का निर्देश दिया जाएगा
  • औपचारिक आदेश बाद में जारी होगा
  • सहमति और डाटा सुरक्षा पर भी सीबीएसई विचार करे

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याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी?

  • आपार को व्यवहार में अनिवार्य बनाया जा रहा है
  • आधार से जोड़ना संविधान के खिलाफ बताया
  • DPDP Act के पालन पर सवाल उठाए
  • कंसेंट फॉर्म में 'ऑप्ट आउट' विकल्प नहीं
  • 'राइट टू बी फॉरगॉटन' की भी मांग

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सरकार अपार योजना को स्वैच्छिक (Voluntary) बताती है, लेकिन व्यवहार में बच्चों को इसमें शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि यह किसी कानून के तहत बनाई गई योजना नहीं है। उन्होंने कहा कि अपार को आधार से जोड़ा गया है, इसलिए अपार आईडी पाने के लिए आधार बनवाना व्यावहारिक रूप से जरूरी हो जाता है।

इंदिरा जयसिंह ने 2019 के के.एस. पुट्टास्वामी (आधार) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों को आधार बनवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यदि परीक्षा में शामिल होने के लिए अपार जरूरी बना दिया जाता है, तो यह उस फैसले के खिलाफ होगा।

उन्होंने कहा, "शिक्षा का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है। किसी बच्चे से परीक्षा में बैठने के लिए आधार और अपार बनवाने को कहना संविधान के खिलाफ है।"

उन्होंने यह भी कहा कि योजना को लागू करने में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है। खासकर अभिभावकों की सूचित सहमति (Informed Consent), सहमति वापस लेने के अधिकार और छात्रों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल हैं।

जयसिंह ने कहा कि मौजूदा कंसेंट फॉर्म एक तयशुदा प्रारूप (Standard Contract) की तरह है, जिसमें अभिभावकों के पास पहले से सहमति देने से इनकार करने या योजना से बाहर रहने का कोई वास्तविक विकल्प नहीं है।

उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि सीबीएसई और स्कूलों को निर्देश दिया जाए कि वे DPDP Act की धारा 6 के अनुसार अभिभावकों की सहमति लें।

उन्होंने यह चिंता भी जताई कि बच्चों के शैक्षणिक रिकॉर्ड लंबे समय तक सुरक्षित रखे जाएंगे। इसलिए छात्रों को भविष्य में "भुला दिए जाने का अधिकार" (Right to be Forgotten) और सहमति वापस लेने का अधिकार भी मिलना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने क्या टिप्पणी की?

  • योजना का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना
  • हर पहल को संदेह की नजर से न देखें
  • रिकॉर्ड और शिक्षक-छात्र अनुपात में मिलेगी मदद
  • सीबीएसई के सर्कुलर कानून से ऊपर नहीं
 

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने योजना को पूरी तरह चुनौती दिए जाने पर कुछ संदेह जताया। उन्होंने कहा कि इस योजना का उद्देश्य हर छात्र की एक विशिष्ट शैक्षणिक पहचान बनाना और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करना है। उन्होंने कहा, "देश की हर चीज को संदेह की नजर से नहीं देखना चाहिए। यह एक स्वागत योग्य कदम है।"

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह यूनिक आईडी शिक्षा अधिकारियों को छात्रों का सही रिकॉर्ड रखने, पाठ्यक्रम लागू करने और शिक्षक-छात्र अनुपात जैसे मानकों की निगरानी करने में मदद करेगी।

इस पर इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यदि योजना का उद्देश्य सही भी है, तब भी उसे वैधता, आवश्यकता और अनुपातिकता जैसे संवैधानिक मानकों पर खरा उतरना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सीबीएसई के सर्कुलर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम के अधीन होंगे और वे लागू कानून से ऊपर नहीं हो सकते।

ओडिशा हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया था

  • कंसेंट फॉर्म में 'ऑप्ट आउट' विकल्प जोड़ा जाए
  • शिक्षा को आधार से नहीं जोड़ा जा सकता
  • बाद में सहमति वापस लेना पर्याप्त नहीं
याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलील में ओडिशा हाईकोर्ट के दिसंबर 2025 के फैसले का भी हवाला दिया। हाईकोर्ट ने शिक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया था कि अपार के मॉडल कंसेंट फॉर्म में अभिभावकों को सहमति देने से इनकार करने और योजना से बाहर रहने का स्पष्ट विकल्प दिया जाए।

हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि कंसेंट फॉर्म में 'ऑप्ट आउट' का विकल्प नहीं है, तो सरकार का यह दावा कमजोर पड़ जाता है कि अपार पूरी तरह स्वैच्छिक योजना है। इससे निजता के मौलिक अधिकार को लेकर भी उचित चिंताएं पैदा होती हैं।

हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया था कि शिक्षा को आधार से अनिवार्य रूप से नहीं जोड़ा जा सकता। साथ ही उसने कहा था कि बाद में सहमति वापस लेने का अधिकार, शुरुआत में सहमति देने से इनकार करने के अधिकार का विकल्प नहीं हो सकता।

याचिका में क्या मांग की गई है?

  • अपार योजना को असंवैधानिक घोषित करने की मांग
  • अनुच्छेद 14, 19, 21 और 21A के उल्लंघन का दावा
  • केंद्र की कार्यपालिका शक्तियों से बाहर बताया

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में अपार योजना को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आधार से जुड़ी यह शैक्षणिक पहचान प्रणाली और इससे संबंधित डेटा प्रोसेसिंग व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 21A का उल्लंघन करती है और केंद्र सरकार की कार्यपालिका शक्तियों से परे है।

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