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Ayodhya Verdict 2019: मृत्यु के 33 साल बाद गोपाल सिंह विशारद को मिला पूजा का अधिकार

Sat, 09 Nov 2019 01:44 PM IST
बीबीसी Published by: रत्नप्रिया रत्नप्रिया Updated Sat, 09 Nov 2019 01:44 PM IST
सार

  • अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
  • गोपाल सिंह विशारद को मृत्यु के 33 साल बाद मिला पूजा करने का अधिकार

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Supreme Court Ayodhya Verdict 2019 Gopal Singh Visharad gets worship rights after 33 years of death
राम जन्मभूमि - फोटो : एएनआई

विस्तार

अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मामले में विवादित भूमि रामलला पक्ष को देने का फैसला किया गया है। साथ ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को उपयुक्त जगह पर 5 एकड़ जमीन अलग से देने का आदेश दिया गया है।लेकिन इस फैसले के साथ एक और नाम चर्चा में है। ये नाम है दिवंगत गोपाल सिंह विशारद का।

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69 साल बाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने गोपाल सिंह विशारद को राम जन्मभूमि पर पूजा करने का अधिकार दे दिया है। लेकिन यह फैसला उनकी मृत्यु के 33 साल बाद आया है।

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आगे पढ़ें, कौन थे गोपाल सिंह विशारद?

अयोध्या विवाद पर शुरुआती चार सिविल मुकदमों में से एक गोपाल सिंह विशारद ने दायर किया था। गोपाल सिंह विशारद और एम. सिद्दीक दोनों ही राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में मूल मुद्दई थे और दोनों का ही निधन हो चुका है। बाद में उनके कानूनी वारिसों ने उनका प्रतिनिधित्व किया।

दावा किया जाता है कि 22-23 दिसंबर 1949 की रात अभय रामदास और उनके साथियों ने दीवार फांदकर राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियां मस्जिद के अंदर रख दीं। फिर यह प्रचार किया कि भगवान राम ने वहां प्रकट होकर अपना जन्मस्थान वापस प्राप्त कर लिया है।

इसके बाद 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज की अदालत में सरकार, जहूर अहमद और अन्य के खिलाफ मुकदमा दायर कर कहा कि 'जन्मभूमि' पर स्थापित भगवान राम और अन्य मूर्तियों को हटाया न जाए। साथ ही उन्हें दर्शन और पूजा के लिए जाने से रोका न जाए।

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सिविल जज ने उसी दिन यह स्थगनादेश (स्टे ऑर्डर) जारी कर दिया, जिसे बाद में मामूली संशोधनों के साथ जिला जज और हाईकोर्ट ने भी अनुमोदित कर दिया। स्थगनादेश को इलाहाबाद हाइकोर्ट में चुनौती दी गई जिससे फाइल पांच साल वहां पड़ी रही।

नए जिला मजिस्ट्रेट जेएन उग्रा ने सिविल कोर्ट में अपने पहले जवाबी हलफनामे में कहा, "विवादित संपत्ति बाबरी मस्जिद के नाम से जानी जाती है और मुसलमान इसे लंबे समय से नमाज के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। इसे राम चन्द्र जी के मंदिर के रूप में नहीं इस्तेमाल किया जाता था।"

कुछ दिनों बाद दिगंबर अखाड़ा के महंत रामचंद्र परमहंस ने भी गोपाल सिंह विशारद जैसा एक और सिविल केस दायर किया। इस मुकदमे में भी मूर्तियां न हटाने और पूजा जारी रखने का आदेश हुआ।

कई साल बाद 1989 में जब रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने स्वयं भगवान राम की मूर्ति को न्यायिक व्यक्ति करार देते हुए नया मुकदमा दायर किया, तब परमहंस ने अपना केस वापस कर लिया।

अन्य सिविल मुकदमे और गोपाल विशारद का निधन

मूर्तियां रखे जाने के करीब दस साल बाद 1951 में निर्मोही अखाड़ा ने जन्मस्थान मंदिर के प्रबंधक के नाते तीसरा मुकदमा दायर किया। इसमें राम मंदिर में पूजा और प्रबंध के अधिकार का दावा किया गया।

दो साल बाद 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड और नौ स्थानीय मुसलमानों की ओर से चौथा मुकदमा दायर हुआ। इसमें न केवल मस्जिद बल्कि अगल-बगल कब्रिस्तान की जमीनों पर भी स्वामित्व का दावा किया गया।

जिला कोर्ट इन चारों मुकदमों को एक साथ जोड़कर सुनवाई करने लगी। दो दशक से ज्यादा समय तक यह एक सामान्य मुकदमे की तरह चलता रहा और इसकी वजह से अयोध्या के स्थानीय हिन्दू-मुसलमान अच्छे पड़ोसी की तरह रहते रहे।

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1986 में गोपाल सिंह विशारद का निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे राजेंद्र सिंह केस की पैरवी कर रहे थे। उनकी अर्जी पर सुन्नी पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा था कि गोपाल सिंह विशारद ने पूजा के व्यक्तिगत अधिकार का दावा करते हुए मुकदमा किया था। इसलिए अब उनकी मृत्यु के बाद उनकी याचिका का कोई औचित्य नहीं रहा।

हालांकि याचिका पर सुनवाई जारी रही। अब अयोध्या मामले पर आए फैसले के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने गोपाल सिंह विशारद को भी पूजा का अधिकार दे दिया है।

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