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Citizenship Amendment Bill: नागरिकता मामले पर सदन में क्यों हुआ पाकिस्तान के कानून मंत्री का जिक्र

Thu, 12 Dec 2019 02:00 PM IST
Mohit Mudgal मोहित मुदगल, अमर उजाला, नई दिल्ली
मोहित मुदगल, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Mohit Mudgal Updated Thu, 12 Dec 2019 02:00 PM IST
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Jogendra Nath Mandal, pakistan law minister, ambedkar, jinnah, dalit leader, partition of india
जोगेंद्र नाथ मंडल - फोटो : Social Media

आज हम आपको एक ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं जो भारत में रहने वाले हर शख्स को जरूर जाननी चाहिए। खासकर तब जब देश में नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amendment Bill 2019) का मुद्दा गरम है।

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ये कहानी है उस शख्स की.. जिसने 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान संविधान सभा के ऐतिहासिक सत्र की अध्यक्षता की। वो नेता जिसने बाबा साहब का हाथ पकड़ा और उन्हें बंगाल के रास्ते संविधान सभा तक पहुंचाया। मोहम्मद अली जिन्ना के उस विश्वासपात्र के बारे में, जो पाकिस्तान का पहला कानून मंत्री हुआ। अविभाजित भारत के सबसे बड़े दलित नेता के बारे में जिसने पाकिस्तान में उन्हीं लोगों का शोषण देखा, जो उसके कहने पर भारत छोड़कर वहां गए थे। उस वफादार साथी के बारे में जिसे जिन्ना की मौत के बाद भारत में शरणार्थी बनकर वापस लौटना पड़ा। 13 साल के उस राजनीतिक सफर के बारे में जो 1937 में पश्चिम बंगाल की बाकारगंज उत्तर-पूर्व विधानसभा सीट से शुरू होकर पाकिस्तान के कानून मंत्री के पद तक पहुंचा और फिर साल 1950 में गुमनामी में जा मिला।
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जिस शख्स के बारे में ये कहानी है, उनका नाम है - जोगेंद्र नाथ मंडल। नागरिकता संशोधन विधेयक पर चर्चा करते समय सदन में भाजपा की ओर से कई बार जोगेंद्र नाथ मंडल के नाम का जिक्र किया गया। ये नाम अपने अंदर एक पूरी कहानी समेटे हुए है। एक गलत चुनाव की कहानी। भारत की जगह पाकिस्तान का चुनाव।

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कौन थे जोगेंद्र नाथ मंडल

  • जोगेंद्र नाथ मंडल का जन्म 29 जनवरी 1904 को पूर्ववर्ती बंगाल (अब बांग्लादेश) में एक दलित समुदाय में हुआ था।
  • शायद यही वजह थी कि उन्होंने अपनी राजनीति को हमेशा पिछड़ी जातियों के इर्द-गिर्द रखा। जोगेंद्र नाथ सुभाष चंद्र बोस से काफी प्रभावित थे।
  • दलितों के लिए कुछ करने की लालसा ने उन्हें कांग्रेस का भी करीबी बनाया। जिसके कुछ समय बाद उन्हें लगा कि कांग्रेस के पास समाज कल्याण के लिए कोई एजेंडा ही नहीं है।   
  • इस वजह से उन्होंने कांग्रेस से दूरी बनानी शुरू कर दी। दूसरी ओर मुस्लिम लीग बाहें पसारे उनका स्वागत करने के लिए बेकरार थी, क्योंकि दलितों में जोगेंद्र की अच्छी पकड़ थी।
  • जिन्ना समेत सभी मुख्य नेताओं का मानना था कि जोगेंद्र के पार्टी में आने से दलित समाज में भी पार्टी की स्वीकार्यता हो जाएगी।
  • कई इतिहासकारों का मानना है कि जोगेंद्र को पार्टी में सम्मान और पद देने के पीछे सोची समझी साजिश थी। इसी वजह से मंडल बहुत कम समय में ही जिन्ना के बेहद करीबी हो गए थे।

आंबेडकर का संविधान सभा में प्रवेश

  • कहा जाता है कि कांग्रेस कभी नहीं चाहती थी कि आंबेडकर किसी भी कीमत पर संविधान सभा में शामिल हों। इसके लिए कांग्रेस ने दांव-पेंच भी लगाए। सरदार पटेल ने तो यहां तक भी कह दिया था कि संविधान सभा के दरवाजे ही नहीं उसकी खिड़कियां भी डॉ. आंबेडकर के लिए बंद हैं। 
  • नतीजा यह हुआ कि आंबेडकर बंबई से चुनाव हार गए। इसके बाद मंडल ने उन्हें बंगाल के जैसोर-खुलना चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया। मंडल, डॉ. आंबेडकर की उम्मीदवारी के प्रस्तावक बने।
  • मंडल के प्रभाव के चलते मुस्लिम लीग ने इस चुनाव में आंबेडकर को नैतिक समर्थन दिया। चुनाव हुए, नतीजे आए और डॉ. आंबेडकर के संविधान सभा में जाने का रास्ता साफ हो गया।

भारत-पाक बंटवारे में मंडल की भूमिका 

  • मंडल और उनके सर्मथकों का मानना था कि मुस्लिम लीग, कांग्रेस की तुलना में ज्यादा धर्म-निरपेक्ष है। उनका मानना था कि पाकिस्तान में दलितों के लिए बेहतर भविष्य है।
  • अब वे खुलकर ‘पाकिस्तान मूवमेंट’ के समर्थन में आ गए थे। बाकि दलितों को भी इस आंदोलन के साथ जोड़ना शुरू कर दिया था।

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मंडल और आंबेडकर के बीच फर्क

  • एक चीज जो आंबेडकर और जोगेंद्र नाथ मंडल को अलग करती थी, वो थी विभाजन को लेकर उनकी सोच। जहां जोगेंद्र पूरी तरह से पाकिस्तान के पक्ष में थे। वहीं अंबेडकर विभाजन के खिलाफ थे।
  • आंबेडकर का मानना था कि दलितों के लिए भारत ही उपयुक्त है। उनका कहना था कि अगर भारत का बंटवारा धर्म के आधार पर हो रहा है तो जरूरी है कि कोई भी मुसलमान भारत में ना रहे और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को भी भारत आ जाना चाहिए, वरना समस्याएं बनी रहेंगी।
  • इसके बाद मंडल ने मुस्लिम लीग की तरफ से बंटवारे के वक्त अहम किरदार निभाया। बंगाल के कुछ इलाकों में जहां हिन्दू और मुसलमानों की आबादी समान थी, वहां पाकिस्तान या हिंदुस्तान में शामिल होने के लिए चुनाव करवाए गए। जिन्ना ने इसका जिम्मा जोगेंद्र को दिया।
  • यहां उन्हें मंडल की दलित समाज में अच्छी पकड़ का फायदा हुआ। बताया जाता है कि उन्होंने पिछड़ी जाति के वोटों को पाकिस्तान के पक्ष में करा दिया और इसी वजह से मुस्लिम लीग भारत के एक बड़े हिस्से को पाकिस्तान में मिलाने में कामयाब रही। 
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बंटवारे के बाद मंडल और पाकिस्तान 

  • बंटवारे के बाद मंडल एक बड़ी दलित आबादी लेकर पाकिस्तान चले गए। जिसका इनाम उन्हें मिला पाकिस्तान के पहले कानून और श्रम मंत्री काे पद के रूप में।
  • धीरे-धीरे चीजें बदलने लगी। दलित जिस पाकिस्तान में अपना भविष्य देख रहे थे, उसी ने अपना मुंह दूसरी ओर करना शुरू कर दिया था।
  • आए दिन दलित हिंदुओं पर अत्याचार की घटनाएं होनी शुरू हो गईं। दलितों की निर्ममतापूर्वक हत्या, जबरन धर्म-परिवर्तन, संपत्ति पर जबरन कब्जा और दलित बहन-बेटियों की आबरू लूटना आम बात हो गई थी। 

1950 में करीब 10,000 दलितों को मौत के घाट उतार दिया गया

  • मंडल ने मोहम्मद अली जिन्ना और अन्य नेताओं से कई बार बात भी की, लेकिन किसी के भी कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
  • सितंबर, 1948 में जिन्ना चल बसे। इसके बाद मंडल की अहमियत भी खत्म कर दी गई। बात इतनी आगे बढ़ गई कि फरवरी, 1950 में पाकिस्तान में करीब 10,000 दलितों को मौत के घाट उतार दिया गया। जिसका जिक्र खुद मंडल ने अपने त्यागपत्र में किया है।
  • उन्होंने दलितों की स्थिति सुधाने के लिए पाकिस्तान सरकार को कई खत लिखे। पर सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
  • अब पाकिस्तान के नौकरशाहों ने मंडल की नाक में दम कर दिया। उन्हें पल-पल अपमान सहना पड़ा।
  • उन्होंने इस दलित-मुस्लिम राजनीतिक एकता के असफल प्रयोग के लिए खुद को कसूरवार समझा और 8 अक्टूबर 1950 को पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा सौंपा और शरणार्थी बनकर भारत लौट आए।

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कैसी रही मंडल की घर वापसी  

  • इतिहासकार बताते हैं कि भारत आने के बाद भी उनका जीवन आसान नहीं रहा। उनके साथ एक पाकिस्तानी की तरह व्यवहार किया गया।
  • इस सब को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने अपना समय और ऊर्जा पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल में आए शरर्णाथियों के पुनर्वास में लगा दिया।
  • इस बीच राजनीतिक दलों ने उनसे उचित दूरी बनाए रखी। अखबारों में उनके खिलाफ लेख लिखे गए। उन्हें तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा। कम्युनिस्टों ने उन्हें जोगेंद्र अली मुल्ला नाम दिया।
  • साल 1967 में उन्होंने अपना अस्तित्व बचाने के लिए बारासात से अपने जीवन का आखिरी चुनाव लड़ा। लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
  • कुछ ही महीनों बाद, 5 अक्तूबर 1968 को पश्चिम बंगाल के बानगांव में उन्होंने अंतिम सांस ली।
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