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प्रशासनिक सेवाओं की चयन प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट ने केंद्र और यूपीएससी से मांगा जवाब
Wed, 06 Jan 2021 07:44 PM IST
Devesh Devesh
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: Devesh Devesh
Updated Wed, 06 Jan 2021 07:44 PM IST
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए प्रशासनिक सेवाओं की चयन प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। न्यायालय ने सरकार से अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा की मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के लिए अभ्यर्थियों के चयन के मानदंड को लेकर केंद्र सरकार का रूख जानना चाहा है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए उपलब्ध वास्तविक पदों की संख्या की घोषणा किए बिना, विशेष तौर पर दिव्यांग श्रेणी के संबंध में, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के अभ्यर्थियों का चयन करना मनमानी है। न्यायालय ने पूछा कि मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के लिए योग्यता कैसे निर्धारित की जाती है।
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दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायाधीश ज्योति सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार और सिविल सेवा की परीक्षा आयोजित करने वाले संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से कहा, ऐसे में जब आपकी रिक्तियों की संख्या बदल रही हैं, तो आप कितने लोगों को मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के लिए बुलाएंगे? यदि आपके पास वास्तविक रिक्तियों की घोषणा किए बिना मुख्य और साक्षात्कार के लिए किसी भी अभ्यर्थी को बुलाने की शक्ति या अधिकार है, तो इसे निरंकुशता के रूप में जाना जाता है।
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पीठ ने यह भी जानना चाहा कि परीक्षा की अधिसूचना और याचिका दायर करने वाली संस्था संभावना की गणना में आठ रिक्तियों का फर्क कैसे आ रहा है। परीक्षा की अधिसूचना में दिव्यांगों के लिए सिर्फ 24 रिक्तियां बताई गई थी और याचिकाकर्ता संगठन संभावना की गणना के अनुसार, रिक्तियों की संख्या 32 होनी चाहिए। उच्च न्यायालय ने इस बारे में केंद्र सरकार और यूपीएससी से दोनों पहलुओं पर स्पष्टीकरण देने को कहा है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 29 जनवरी की तारीख तय की है।
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उच्च न्यायालय दो संगठनों संभावना और एवारा फाउंडेशन की ओर से दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। दोनों ने अपनी याचिकाओं में सिविल सेवा परीक्षा की अधिसूचना को चुनौती देते हुए कहा है कि उसमें दिव्यांगों के लिए सिर्फ अनुमानित रिक्तियों का जिक्र है, अनिवार्य चार प्रतिशत आरक्षण का नहीं। सुनवाई के दौरान उन्होंने पीठ से अनुरोध किया कि वह 08 जनवरी से 17 जनवरी तक होने वाली मुख्य परीक्षा को स्थगित करने का आदेश दे या केंद्र को निर्देशित करें कि वह दोनों याचिकाओं पर सुनवाई के बाद दिव्यांगों के लिए अलग से परीक्षा की व्यवस्था करे। अदालत ने हालांकि, इस संबंध में कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया और कहा कि अगर याचिका दायर करने वाले परीक्षा में पास होते हैं तो बाद में उसके आधार पर राहत दी जा सकती है।
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इससे पहले सितंबर 2020 में हुई सुनवाई के दौरान, अदालत ने यूपीएससी के इस तर्क को बेतुका करार दिया था कि सिविल सेवा परीक्षा में रिक्तियों की संख्या उम्मीदवारों के अंतिम चयन से पहले भिन्न हो सकती है, जबकि दिव्यांगों के लिए सीटों की संख्या स्थिर रहें। हाईकोर्ट ने कहा, आप यह नहीं कह सकते कि आरक्षण की संख्या निर्धारित है, लेकिन रिक्तियों की संख्या भिन्न हो सकती है। यह बेतुका तर्क क्या है? या तो दोनों तय हुए हैं या दोनों ही तय नहीं हैं।
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