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Karnataka HC: नौकरी में 'बिल्कुल दृष्टिहीन' उम्मीदवारों को मिलनी चाहिए प्राथमिकता, कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा

Fri, 15 Nov 2024 01:15 PM IST
आकाश कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: आकाश कुमार Updated Fri, 15 Nov 2024 01:15 PM IST
सार

Karnataka HC: मैसूर जिले के पेरियापटना तालुक में अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाली एक नेत्रहीन उम्मीदवार एचएन लता से जुड़े एक मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि रोजगार के अवसरों में 'पूर्ण दृष्टिहीनता' वाले व्यक्तियों को 'कम दृष्टि' वाले व्यक्तियों की तुलना में वरीयता दी जानी चाहिए।
 

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Give priority to 'absolutely blind' candidates over 'low vision' ones in jobs: Karnataka HC
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

Karnataka HC: रोजगार के अवसरों में 'पूर्ण दृष्टिहीनता' वाले व्यक्तियों को 'कम दृष्टि' वाले व्यक्तियों की तुलना में वरीयता दी जानी चाहिए... यह बात कर्नाटक उच्च न्यायालय की ओर से कही गई है। हालांकि, न्यायालय ने यह भी कहा है कि इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि बशर्ते ऐसे उम्मीदवारों की विकलांगता उनके कर्तव्यों के निर्वहन की क्षमता में बाधा नहीं बननी चाहिए।

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यह निर्णय न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित और न्यायमूर्ति सी एम जोशी की खंडपीठ ने कर्नाटक राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (केएसएटी) के पूर्व आदेश के खिलाफ स्कूल शिक्षा विभाग की अपील को खारिज करते हुए किया।

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नेत्रहीन उम्मीदवार एचएन लता के इर्द-गिर्द घूमता है मामला 

यह मामला मैसूर जिले के पेरियापटना तालुक में अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाली एक नेत्रहीन उम्मीदवार एचएन लता के इर्द-गिर्द घूमता है। 

लता ने 2022 में एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में कन्नड़ और सामाजिक अध्ययन शिक्षक के पद के लिए आवेदन किया था। उनका नाम 8 मार्च, 2023 को जारी चयन सूची में शामिल किया गया था। हालांकि, 4 जुलाई, 2023 को उनका आवेदन खारिज कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने केएसएटी के समक्ष इस फैसले को चुनौती दी।

न्यायाधिकरण ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, उन्हें 10,000 रुपये का खर्च देने का आदेश दिया और नियुक्ति प्राधिकारी को तीन महीने के भीतर उनके आवेदन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

स्कूल शिक्षा विभाग का तर्क

स्कूल शिक्षा विभाग ने इस निर्णय का विरोध करते हुए तर्क दिया कि "कम दृष्टि" वाले और "पूर्ण अंधेपन" वाले उम्मीदवारों के लिए आरक्षण को अलग-अलग श्रेणियों के रूप में माना जाना चाहिए। विभाग ने दावा किया कि न्यायाधिकरण ने इस अंतर को नजरअंदाज कर दिया है।

मामले की समीक्षा करने पर, उच्च न्यायालय की पीठ ने विभाग के रुख से असहमति जताई। न्यायाधीशों ने कहा कि हालांकि एक पूरी तरह से अंधे व्यक्ति द्वारा स्नातक प्राथमिक शिक्षक की जिम्मेदारियों को संभालने के बारे में चिंताएं हो सकती हैं, खासकर सामाजिक अध्ययन और कन्नड़ जैसे विषयों में, लेकिन इस तरह के तर्क अविश्वसनीय थे क्योंकि उम्मीदवार इस भूमिका के लिए शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करता था।

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न्यायालय ने दी इन व्यक्तित्व की मिसाल

न्यायालय ने दृष्टिहीन व्यक्तियों में अक्सर देखी जाने वाली सकारात्मक विशेषताओं पर प्रकाश डाला, जैसे अनुकूलनशीलता, लचीलापन, मजबूत याददाश्त, बढ़ी हुई इंद्रियां और बेहतरीन मुकाबला कौशल। पीठ ने उल्लेखनीय ऐतिहासिक हस्तियों का हवाला दिया जिन्होंने दृष्टिहीन होने के बावजूद बड़ी सफलता हासिल की, जिनमें होमर, जॉन मिल्टन, लुई ब्रेल, हेलेन केलर और बोलेंट इंडस्ट्रीज के सीईओ श्रीकांत बोला शामिल हैं।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि शिक्षा विभाग को या तो पूर्ण दृष्टिहीन उम्मीदवारों के लिए विशिष्ट पद निर्धारित करने चाहिए थे, या उन्हें उपलब्ध पदों के लिए कम दृष्टि वाले उम्मीदवारों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति देनी चाहिए थी।

न्यायाधिकरण के निर्देश को बरकरार रखते हुए, न्यायालय ने समावेशी नियुक्ति प्रथाओं की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें दृष्टिहीन उम्मीदवारों की क्षमताओं को मान्यता दी जाए।

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