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दिल्ली: पहली बार आरआरटीएस रेल ट्रैक सिस्टम पर नई तकनीक का इस्तेमाल, 160 किलोमीटर होगी रफ्तार
Mon, 07 Mar 2022 11:21 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Mon, 07 Mar 2022 11:21 PM IST
सार
दिल्ली से गाजियाबाद और मेरठ के बीच निर्माणाधीन भारत की पहली आरआरटीएस परियोजना 180 किमी प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड की क्षमता पर आधारित है। 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से प्रत्येक 5-10 किमी पर स्टेशनों से होकर ट्रेन एक घंटे में करीब 100 कि.मी की दूरी तय करेगा।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ के बीच निर्माणाधीन आरआरटीएस कॉरिडोर पर हाई स्पीड ट्रेन के लिए अनोखी प्री-कास्ट स्लैब तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इस तकनीक से ट्रेन 160 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से अंडरग्राउंड और एलिवेटेड कॉरिडोर से गुजर सकेगी।
विश्वसनीय और तेज रफ्तार को ध्यान में रखते हुए बैलेस्टलेस ट्रैक संरचना का चयन किया गया है। इसपर रफ्तार मेट्रो से भी अधिक होगी।
दिल्ली से गाजियाबाद और मेरठ के बीच निर्माणाधीन भारत की पहली आरआरटीएस परियोजना 180 किमी प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड की क्षमता पर आधारित है।
160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से प्रत्येक 5-10 किमी पर स्टेशनों से होकर ट्रेन एक घंटे में करीब 100 कि.मी की दूरी तय करेगा। तेज गति के लिए उपयुक्त होने की वजह से इस तकनीक को लागू किया जा रहा है। आरआरटीएस कॉरिडोर भीड़भाड़ वाले शहरों से गुजरेगा। इसे ध्यान में रखते हुए बैलेस्टलैस ट्रैक संरचना का चयन किया गया है।
भारत में मेट्रो रेल परियोजनाओं में भी फिलहाल इसी तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। यह 95 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के लिए उपयुक्त है। आरआरटीएस के ट्रैक सिस्टम के तौर पर प्रीकास्ट स्लैब ट्रैक प्रणाली को चुना गया है।एनसीआरटीसी ने आरआरटीएस के लिए एक उपयुक्त ट्रैक सिस्टम की पहचान करने के लिए एक रणनीति अपनाई गई।
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विश्वसनीय और तेज रफ्तार को ध्यान में रखते हुए बैलेस्टलेस ट्रैक संरचना का चयन किया गया है। इसपर रफ्तार मेट्रो से भी अधिक होगी।
दिल्ली से गाजियाबाद और मेरठ के बीच निर्माणाधीन भारत की पहली आरआरटीएस परियोजना 180 किमी प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड की क्षमता पर आधारित है।
160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से प्रत्येक 5-10 किमी पर स्टेशनों से होकर ट्रेन एक घंटे में करीब 100 कि.मी की दूरी तय करेगा। तेज गति के लिए उपयुक्त होने की वजह से इस तकनीक को लागू किया जा रहा है। आरआरटीएस कॉरिडोर भीड़भाड़ वाले शहरों से गुजरेगा। इसे ध्यान में रखते हुए बैलेस्टलैस ट्रैक संरचना का चयन किया गया है।
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भारत में मेट्रो रेल परियोजनाओं में भी फिलहाल इसी तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। यह 95 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के लिए उपयुक्त है। आरआरटीएस के ट्रैक सिस्टम के तौर पर प्रीकास्ट स्लैब ट्रैक प्रणाली को चुना गया है।एनसीआरटीसी ने आरआरटीएस के लिए एक उपयुक्त ट्रैक सिस्टम की पहचान करने के लिए एक रणनीति अपनाई गई।
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देश की पहली क्षेत्रीय रेल के निर्माण में देश में पहली बार इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब तकनीक, उच्च क्षमता वाले बैलेस्टलैस ट्रैक स्लैब का उत्पादन करती है। इनका जीवन काल अधिक होने के साथ ही कम रखरखाव की जरूरत होती है। इससे ट्रैक के रख-रखाव पर भी कम खर्च होता है।
मेरठ में किया जा रहा है 42 हजार प्र्री कास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण
इन प्री कास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण मेरठ के शताब्दी नगर स्थित एक कारखाने में किया जा रहा है। ट्रैक स्लैब आम तौर पर 4 मीटर गुना 2.4 मीटर आकार के होते हैं। ट्रैक स्लैब के निर्माण में उच्च गुणवत्ता वाले कंक्रीट का उपयोग किया जा रहा है ताकि इस्तेमाल में किसी तरह की दिक्कत न आए।
आरआरटीएस प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण मेक इन इंडिया के तहत किया जा रहा है। इस कारखाने में रोजाना औसतन 90 प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण किया जा सकता है। दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर के लिए करीब 42,000 प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण किया जाना है। केवल प्रायोरिटी कॉरिडोर के लिए ही लगभग 9000 ट्रैक स्लैब बनाए जा रहे हैं।
रोजाना एक टीम बिछा सकती है 150 मीटर तक ट्रैक
निर्माण के बाद ट्रैक स्लैब को बड़े ट्रक या ट्रेलर के जरिये वायडक्ट की मदद से निर्माण स्थल तक पहुंचाया जाता है। प्री कास्टिंग से बेहतर गुणवत्ता के साथ साथ तेजी से ट्रैक बिछाने का काम किया जा सकता है। एक टीम द्वारा रोजाना करीब 100 - 150 मीटर लंबा ट्रैक बिछाया जा सकता है।
एनसीआरटीसी ने अपने कॉरिडोर में एक समान ट्रैक संरचना को लागू करने की रणनीति अपनाई है। इसलिए सभी कॉरिडोर पर प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इससे हाई स्पीड और हाई फ्रीक्वेंसी पर ट्रेनों का संचालन संभव होगा।
मेरठ में किया जा रहा है 42 हजार प्र्री कास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण
इन प्री कास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण मेरठ के शताब्दी नगर स्थित एक कारखाने में किया जा रहा है। ट्रैक स्लैब आम तौर पर 4 मीटर गुना 2.4 मीटर आकार के होते हैं। ट्रैक स्लैब के निर्माण में उच्च गुणवत्ता वाले कंक्रीट का उपयोग किया जा रहा है ताकि इस्तेमाल में किसी तरह की दिक्कत न आए।
आरआरटीएस प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण मेक इन इंडिया के तहत किया जा रहा है। इस कारखाने में रोजाना औसतन 90 प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण किया जा सकता है। दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर के लिए करीब 42,000 प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब का निर्माण किया जाना है। केवल प्रायोरिटी कॉरिडोर के लिए ही लगभग 9000 ट्रैक स्लैब बनाए जा रहे हैं।
रोजाना एक टीम बिछा सकती है 150 मीटर तक ट्रैक
निर्माण के बाद ट्रैक स्लैब को बड़े ट्रक या ट्रेलर के जरिये वायडक्ट की मदद से निर्माण स्थल तक पहुंचाया जाता है। प्री कास्टिंग से बेहतर गुणवत्ता के साथ साथ तेजी से ट्रैक बिछाने का काम किया जा सकता है। एक टीम द्वारा रोजाना करीब 100 - 150 मीटर लंबा ट्रैक बिछाया जा सकता है।
एनसीआरटीसी ने अपने कॉरिडोर में एक समान ट्रैक संरचना को लागू करने की रणनीति अपनाई है। इसलिए सभी कॉरिडोर पर प्रीकास्ट ट्रैक स्लैब तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इससे हाई स्पीड और हाई फ्रीक्वेंसी पर ट्रेनों का संचालन संभव होगा।