उपहार अग्निकांड: पीड़ित एसोसिएशन ने साक्ष्यों से छेड़छाड़ मामले में सजा निलंबन की अपील पर जताई आपत्ति
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनिल अंतिल के समक्ष एसोसिएशन ऑफ उपहार ट्रेजडी विक्टिम्स के वकील ने आठ नवंबर को मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा अंसल बंधुओं व अन्य को सुनाई गई जेल की सजा को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करने का आग्रह किया।
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एसोसिएशन ऑफ उपहार ट्रेजेडी विक्टिम्स (एयूटीवी) ने सत्र अदालत के समक्ष रियल एस्टेट कारोबारी सुशील और गोपाल अंसल के उस तर्क पर आपत्ति जताई है जिसमें उन्हें मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा सुनाई गई सात साल जेल की सजा को निलंबित करने की अपील की गई है। यह मामला उपहार सिनेमा अग्निकांड के 1997 के मुख्य मामले में सबूतों से छेड़छाड़ से संबंधित है। अग्निकांड में 59 दर्शकों की म़त्यु हो गई थी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनिल अंतिल के समक्ष एसोसिएशन के वकील ने आठ नवंबर को मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा अंसल बंधुओं व अन्य को सुनाई गई जेल की सजा को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करने का आग्रह किया।
एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने अदालत को बताया कि छेड़छाड़ का अपराध बेहद गंभीर प्रकृति का है क्योंकि इससे पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली प्रभावित होती है। उन्होंने कहा, यह न्याय प्रशासन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप है और इस प्रकार दोनों भाइयों को सात साल की सजा और 2.25 करोड़ के जुर्माने को निलंबित करते हुए गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा पारित निर्णय को अच्छी तरह से तर्क कर दिया गया था और अदालत ने बचाव पक्ष के प्रत्येक तर्क से निपटा था और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि यह षड्यंत्र का मामला है जिसे अभियोजन पक्ष द्वारा स्थापित किया गया था।
मुख्य अग्निकांड मामले में अंसल को दोषी करार दिया गया था और सुप्रीम कोर्ट ने दो साल की जेल की सजा सुनाई थी। उच्चतम न्यायालय ने हालांकि उन्हें इस शर्त पर जेल के समय को ध्यान में रखते हुए रिहा कर दिया कि वे राष्ट्रीय राजधानी में ट्रामा सेंटर बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले 30 करोड़ रुपये के जुर्माने का भुगतान करेंगे।
पहवा ने कहा अंसल बंधुओं ने मुख्य उपहार मामले में उन्हें दी गई स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया और अदालत के कर्मचारियों के साथ आपराधिक षड्यंत्र रचने के बाद सबूतों के साथ छेड़छाड़ की। इस मामले में साजिश उपहार मामले में बरी होने के क्रम में उनके खिलाफ सीबीआई द्वारा एकत्र किए गए सबूतों से छेड़छाड़ करने की थी।
उन्होंने कहा कि यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने इस अपराध को बहुत गंभीरता से लिया और सजा के बाद उन्हें दी गई नियमित जमानत रद्द कर दी। यह एक ऐसा मामला है जो आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़े पैमाने पर जनता के विश्वास को चकनाचूर कर देता है। पहवा ने कहा, अगर इन अमीर और ताकतवर लोगों को दी गई सजा को ऐसे शुरुआती चरण में निलंबित कर दिया जाता है तो एक आम आदमी का विश्वास टूट जाएगा जिनकी अपील और जमानत आवेदन अदालत में महीनों और वर्षों से लंबित हैं।
20 जुलाई 2002 में चला था साक्ष्यों से छेड़छाड़ का पता
अंसल बंधुओं ने मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा सुनाई गई जेल की सजा को चुनौती देने के अलावा अपील लंबित रहते हुए उनकी सजा निलंबित करने का भी आग्रह किया है। संबंधित कोर्ट ने पूर्व कोर्ट स्टाफ दिनेश चंद शर्मा और दो अन्य-पी पी बत्रा और अनूप सिंह को सात साल की जेल और उन पर तीन लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। साक्ष्यों से छेड़छाड़ का पता पहली बार 20 जुलाई 2002 को चला और जब इसका पर्दाफाश हुआ तो शर्मा के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई और उन्हें निलंबित कर दिया गया।
जांच के आधार पर 25 जून 2004 को कोर्ट स्टाफ को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। अभियोजन पक्ष ने कहा कि बर्खास्तगी के बाद अंसल बंधुओं ने शर्मा को 15,000 रुपये मासिक वेतन पर रोजगार पाने में मदद की। मामला दर्ज होने पर जिस कंपनी के शर्मा को निलंबन के बाद नौकरी मिली थी, उसके दस्तावेजों में इसके अध्यक्ष अनूप सिंह ने आगे छेड़छाड़ की थी।