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Delhi News: रेलवे को ऑटिज्म रियायत पर निर्णय का निर्देश
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-यह फैसला मास्टर नक्श की ओर से दायर याचिका के निपटारे के दौरान लिया गया
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने भारतीय रेलवे को आदेश दिया है कि वह यह तय करे कि क्या ऑटिज्म को रेलवे यात्रा रियायतों के लिए पात्र विकलांगता श्रेणी में शामिल किया जाए। यह निर्णय मास्टर नक्श की ओर से दायर याचिका के निपटारे के दौरान लिया गया। नक्श के पिता ने यह याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने रेलवे के मौजूदा रियायत नियमों में ऑटिज्म को बाहर रखने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि ऑटिज्म को यात्रा रियायतों से बाहर रखना भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि रेलवे के नियमों को फिर से तैयार किया जाए, ताकि ऑटिज्म को भी यात्रा रियायतों के तहत शामिल किया जा सके।
रेलवे और केंद्र सरकार की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया था, लेकिन न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने कहा, यह निर्णय रेलवे को ही लेना है क्योंकि याचिका नीति में बदलाव की मांग कर रही है। अदालत ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह छह महीने के भीतर इस मुद्दे पर एक नीतिगत निर्णय ले। साथ ही, यदि आवश्यक हो, तो रेलवे याचिकाकर्ता के प्रतिनिधि को सुनने के लिए बुला सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि रेलवे अपना अंतिम निर्णय याचिकाकर्ता के वकील को ईमेल के माध्यम से सूचित करे। इस आदेश के साथ याचिका का निपटारा किया गया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने भारतीय रेलवे को आदेश दिया है कि वह यह तय करे कि क्या ऑटिज्म को रेलवे यात्रा रियायतों के लिए पात्र विकलांगता श्रेणी में शामिल किया जाए। यह निर्णय मास्टर नक्श की ओर से दायर याचिका के निपटारे के दौरान लिया गया। नक्श के पिता ने यह याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने रेलवे के मौजूदा रियायत नियमों में ऑटिज्म को बाहर रखने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि ऑटिज्म को यात्रा रियायतों से बाहर रखना भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि रेलवे के नियमों को फिर से तैयार किया जाए, ताकि ऑटिज्म को भी यात्रा रियायतों के तहत शामिल किया जा सके।
रेलवे और केंद्र सरकार की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया था, लेकिन न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने कहा, यह निर्णय रेलवे को ही लेना है क्योंकि याचिका नीति में बदलाव की मांग कर रही है। अदालत ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह छह महीने के भीतर इस मुद्दे पर एक नीतिगत निर्णय ले। साथ ही, यदि आवश्यक हो, तो रेलवे याचिकाकर्ता के प्रतिनिधि को सुनने के लिए बुला सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि रेलवे अपना अंतिम निर्णय याचिकाकर्ता के वकील को ईमेल के माध्यम से सूचित करे। इस आदेश के साथ याचिका का निपटारा किया गया।
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