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सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन व अन्य लाभ प्राप्त करना हर कर्मचारी का अधिकार: हाईकोर्ट
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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन लाभ प्राप्त करना हर कर्मचारी का अधिकार है। यह लाभ न तो नियोक्ता की इच्छा पर मिलने वाला इनाम है न ही अनुग्रह राशि। पेंशन पिछली सेवा के लिए किया गया भुगतान है। अदालत ने यह टिप्पणी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा एक प्रोफेसर की रोकी गई पेंशन संबंधी निर्णय को गलत ठहराते हुए की।
न्यायमूर्ति ज्योति सिंह ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी कर्मचारी के रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन व अन्य सुविधाएं उसका हक है। यह पिछली सेवा के लिए किया गया भुगतान है; और यह उसके सामाजिक कल्याण के लिए होती है जो उसने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में नियत समय पर काम करते हुए कमाई गई राशि है।
अदालत ने जेएनयू को निर्देश दिया कि वह याची प्रोफेसर कुणाल चक्रवर्ती को प्रोविडेंट फंड व अन्य सभी वित्तीय भुगतान चार सप्ताह में करे। इतना ही नहीं अदालत ने याची के रिटायर होने 31 मई 2019 से पूरी राशि पर 9 प्रतिशत ब्याज भी अदा करने का निर्देश दिया है।
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अदालत ने कहा कि इसमें कोई दोराय नहीं है कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई पर उक्त भत्ते रोके जा सकते हैं। इस मामले में ऐसा कुछ नहीं है। याची के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित नहीं है और न उसे निलंबित किया गया। याची के खिलाफ जेएनयू ने 31 जुलाई 2018 को अन्य संकाय सदस्यों के साथ एक दिन की हड़ताल में शामिल होने का आरोप लगाया है।
इस मुद्दे पर याची के खिलाफ 20 सितंबर 18 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। अभी तक कोई चार्जशीट नहीं दी गई। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे में जेएनयू का याची के पेंशन व अन्य भत्ते रोकने संबंधी निर्णय को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
याची चक्रवर्ती ने ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र में 19 अप्रैल 79 में पद पदग्रहण किया था। जेएनयू में एक दिन की हड़ताल में वे 31 जुलाई 18 को शामिल हुए। उन्होंने 31 मई 2019 को विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त के बाद सभी भत्तों के लिए आवेदन किया लेकिन जेएनयू प्रशासन ने कारण बताओ नोटिस जारी होने के आधार पर उक्त भत्ते रोक लिए थे।
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न्यायमूर्ति ज्योति सिंह ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी कर्मचारी के रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन व अन्य सुविधाएं उसका हक है। यह पिछली सेवा के लिए किया गया भुगतान है; और यह उसके सामाजिक कल्याण के लिए होती है जो उसने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में नियत समय पर काम करते हुए कमाई गई राशि है।
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अदालत ने जेएनयू को निर्देश दिया कि वह याची प्रोफेसर कुणाल चक्रवर्ती को प्रोविडेंट फंड व अन्य सभी वित्तीय भुगतान चार सप्ताह में करे। इतना ही नहीं अदालत ने याची के रिटायर होने 31 मई 2019 से पूरी राशि पर 9 प्रतिशत ब्याज भी अदा करने का निर्देश दिया है।
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अदालत ने कहा कि इसमें कोई दोराय नहीं है कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई पर उक्त भत्ते रोके जा सकते हैं। इस मामले में ऐसा कुछ नहीं है। याची के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित नहीं है और न उसे निलंबित किया गया। याची के खिलाफ जेएनयू ने 31 जुलाई 2018 को अन्य संकाय सदस्यों के साथ एक दिन की हड़ताल में शामिल होने का आरोप लगाया है।
इस मुद्दे पर याची के खिलाफ 20 सितंबर 18 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। अभी तक कोई चार्जशीट नहीं दी गई। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे में जेएनयू का याची के पेंशन व अन्य भत्ते रोकने संबंधी निर्णय को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
याची चक्रवर्ती ने ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र में 19 अप्रैल 79 में पद पदग्रहण किया था। जेएनयू में एक दिन की हड़ताल में वे 31 जुलाई 18 को शामिल हुए। उन्होंने 31 मई 2019 को विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त के बाद सभी भत्तों के लिए आवेदन किया लेकिन जेएनयू प्रशासन ने कारण बताओ नोटिस जारी होने के आधार पर उक्त भत्ते रोक लिए थे।