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International Childhood Cancer Day : अब खुद के बोनमेरो से ब्लड कैंसर का इलाज संभव, एम्स-सफदरजंग का अध्ययन
Wed, 15 Feb 2023 06:00 AM IST
दुष्यंत शर्मा
राकेश शर्मा, नई दिल्ली
राकेश शर्मा, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 15 Feb 2023 06:00 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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ब्लड कैंसर से पीड़ित अथर्व को बचाने के लिए डॉक्टरों ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट करने का फैसला किया, लेकिन भाई-बहन के सैंपल मरीज से मैच नहीं हो पाए और न ही डोनर की व्यवस्था हो पाई। परिवार आस खो चुका था, लेकिन डॉक्टरों ने हार नहीं मानी। एम्स में उपचार के दौरान डॉक्टरों ने ऑटोलॉगस हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण (एचएससीटी) किया और यह सफल रहा। इसमें मरीज से ही बोन मैरो लेकर उसी में ट्रांसप्लांट किया गया।
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यह एक नई विधि है। अब मरीज को बोन मैरो के लिए किसी दूसरे पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। इस विधि की सफलता को जांचने के लिए एम्स में कैंसर विज्ञान विभाग के वरिष्ठ डॉक्टर समीर बख्शी, डॉ. कौशल कालरा, डॉ. शलभ अरोड़ा, डॉ. सौरव वर्मा और डॉ. दीपम पुष्पम ने अगस्त 2006 से जनवरी 2019 तक प्रत्यारोपण करने वाले कुल 26 मरीजों पर अध्ययन किया। अध्ययन में 63.3 फीसदी बच्चाें का प्रत्यारोपण सफल रहा।
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अध्ययन के बारे में सफदरजंग अस्पताल के ऑन्कोलॉजी मेडिकल के प्रमुख डॉ. कौशल कालरा ने बताया कि सामान्य रूप में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए भाई-बहन के सैंपल लिए जाते हैं। अधिकतर मामलों में देखा गया है कि मरीजों को उचित डोनर नहीं मिल पाते। ऐसे में मरीज की जान पर बन आती है। ऐसे मरीजों के लिए ऑटोलॉगस एचएससीटी काफी मददगार है। इसमें मरीज को ही दवाई व अन्य तरीके से बोन मैरो के लिए तैयार करते हैं, फिर उसी से सैंपल लेकर तकनीकी विधि से उसमें ट्रांसप्लांट करते हैं। अध्ययन में यह विधि सफल कारगर साबित हुई है। यह ऐसे लोगों के लिए बेहतर विकल्प हैं जिनके भाई-बहन नहीं है या फिर डोनर नहीं मिल पाते।
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एम्स में 81 मरीजों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट
एम्स में साल 2006 से 2019 के बीच एक्यूट माइलॉयड ल्यूकेमिया (एएमएल) (ब्लड कैंसर) के कुल 81 मरीजों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ। इनमें से 55 मरीजों का ट्रांसप्लांट एलोजेनेइक एचएससीटी (डोनर से बोन मैरो लेकर) और 26 मरीजों का ऑटोलॉगस एचएससीटी (मरीज से ही बोन मैरो लेकर) विधि से हुआ। डॉक्टरों की माने तो उचित डोनर से हासिल बोन मैरो ज्यादा कारगार है। हालांकि अब उचित डोनर के अभाव में भी मरीजों का उपचार संभव हो गया है।
क्या आती है समस्या
ज्यादातर मरीजों को समय पर उपयुक्त डोनर नहीं मिल पाता। अक्सर डॉक्टर डोनर के रूप में भाई-बहन को चुनते हैं, लेकिन सैंपल मैच न होने पर बाहर से भी डोनर की तलाश की जाती है। डॉक्टरों की माने तो डोनर से हासिल बोन मैरो ज्यादा फायदेमंद है। लेकिन इनके अभाव में नई विधि से मरीज से हासिल बोनमैरो भी कारगर विकल्प है। यह आस छोड़ चुके मरीजों को नई जिंदगी देगा।