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एक केस में कस्टडी पैरोल मिलने पर अन्य मामलों में पैरोल की जरूरत नहीं: हाईकोर्ट
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नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक कैदी को किसी विशेष मामले में कस्टडी पैरोल मिलने के बाद उसे अपने खिलाफ विचाराधीन अन्य मामलों में कस्टडी पैरोल के आदेश प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने यह व्यवस्था पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन की याचिका पर दी है। वह वर्तमान में तिहाड़ जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है।
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता वर्तमान में कई आपराधिक मामलों में न्यायिक हिरासत में है। इनमें से कुछ में वह एक दोषी के रूप में सजा काट रहा है, जबकि अन्य मामलों में वह अभी भी विचाराधीन है। दरअसल आरोपी ने पिता की मौत के बाद मां से मिलने के लिए पैरोल मांगी थी। दिल्ली व बिहार पुलिस ने पैरोल पर आपत्ति जताई थी।
उन्होंने खंडपीठ के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि कस्टडी पैरोल सीमित अवधि के लिए है। इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि अभियुक्त को प्रत्येक संबंधित ट्रायल कोर्ट से कस्टडी पैरोल प्राप्त करनी होगी। उन्होंने कहा खंडपीठ स्पष्ट कर चुकी है कि जब भी एक कैदी को हिरासत में पैरोल दी जाती है, तब भी वह न्यायिक हिरासत में होता है और वह स्वतंत्र नहीं है।
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पीठ ने कहा कि एक कैदी द्वारा कस्टडी पैरोल में बिताया गया समय उसकी कुल सजा में गिना जाता है। अदालत ने कहा, यह इस संदर्भ में है कि कस्टडी पैरोल इसलिए एक ऐसी स्थिति पर विचार करती है, जिसमें जेल के नियमों में वर्णित विशेष छूट के लिए, कैदी को स्वतंत्रता दी जाती है और जेल कैदी के साथ यात्रा करती है, जहां भी कैदी को अदालत के आदेश से जाने की अनुमति होती है।
याचिकाकर्ता मूल रूप से बिहार की जेल में सजा काट रहा था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उसे तिहाड़ जेल में स्थानांतरित किया गया था। याचिका पर सुनवाई के दौरान यह भी सवाल उठा कि याची पर दिल्ली जेल नियम 2018 या बिहार जेल नियम लागू होंगे। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता तिहाड़ जेल में है तो वह दिल्ली जेल नियम 2018 में निर्धारित दिशानिर्देशों के अधीन होगा।
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न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता वर्तमान में कई आपराधिक मामलों में न्यायिक हिरासत में है। इनमें से कुछ में वह एक दोषी के रूप में सजा काट रहा है, जबकि अन्य मामलों में वह अभी भी विचाराधीन है। दरअसल आरोपी ने पिता की मौत के बाद मां से मिलने के लिए पैरोल मांगी थी। दिल्ली व बिहार पुलिस ने पैरोल पर आपत्ति जताई थी।
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उन्होंने खंडपीठ के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि कस्टडी पैरोल सीमित अवधि के लिए है। इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि अभियुक्त को प्रत्येक संबंधित ट्रायल कोर्ट से कस्टडी पैरोल प्राप्त करनी होगी। उन्होंने कहा खंडपीठ स्पष्ट कर चुकी है कि जब भी एक कैदी को हिरासत में पैरोल दी जाती है, तब भी वह न्यायिक हिरासत में होता है और वह स्वतंत्र नहीं है।
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पीठ ने कहा कि एक कैदी द्वारा कस्टडी पैरोल में बिताया गया समय उसकी कुल सजा में गिना जाता है। अदालत ने कहा, यह इस संदर्भ में है कि कस्टडी पैरोल इसलिए एक ऐसी स्थिति पर विचार करती है, जिसमें जेल के नियमों में वर्णित विशेष छूट के लिए, कैदी को स्वतंत्रता दी जाती है और जेल कैदी के साथ यात्रा करती है, जहां भी कैदी को अदालत के आदेश से जाने की अनुमति होती है।
याचिकाकर्ता मूल रूप से बिहार की जेल में सजा काट रहा था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उसे तिहाड़ जेल में स्थानांतरित किया गया था। याचिका पर सुनवाई के दौरान यह भी सवाल उठा कि याची पर दिल्ली जेल नियम 2018 या बिहार जेल नियम लागू होंगे। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता तिहाड़ जेल में है तो वह दिल्ली जेल नियम 2018 में निर्धारित दिशानिर्देशों के अधीन होगा।