{"_id":"6138db0b8ebc3e171647e234","slug":"no-matter-how-high-the-jail-walls-foundations-based-on-rule-of-law-hc-ashram-news-noi603451292","type":"story","status":"publish","title_hn":"जेल की दीवारें कितनी भी ऊंची हों, नींव कानून के शासन पर आधारित: हाईकोर्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जेल की दीवारें कितनी भी ऊंची हों, नींव कानून के शासन पर आधारित: हाईकोर्ट
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विजय सिंघल
नई दिल्ली। जेल की दीवारें कितनी भी ऊंची हों, उसकी नींव भारत के संविधान में निहित कैदियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले कानून के शासन पर रखी जाती है। यह तिहाड़ जेल में हिरासत में हुई हिंसा में जान गंवाने वाले अंकित गुर्जर के संविधानिक अधिकारों का हनन है। हाईकोर्ट ने उक्त टिप्पणी करते हुए जेल में कैदियों से उगाही व कैदियों से मारपीट के मामले की जांच के लिए सीबीआई जांच के निर्णय को उचित ठहराते हुए की।
न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता ने जेल में तैनात डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह अकल्पनीय है कि जब आधी रात को जेल के डॉक्टर ड्यूटी पर आए, तो उन्होंने अंकित पर कई चोटें नहीं देखीं। अदालत ने कहा जब अंकित घायल हो गया और जीवित था, यदि उसे उचित उपचार प्रदान किया जाता, तो उसकी जान बचाई जा सकती थी।
अदालत ने कहा न केवल इस बात की जांच जरूरी है कि अंकित को बेरहमी से पीटने का अपराध किसने किया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। बल्कि सही समय पर उचित उपचार उपलब्ध नहीं कराने में जेल डॉक्टरों की भूमिका की भी उचित जांच की जरूरत है।
विज्ञापन
अदालत ने कहा मामले में जेल डॉक्टर अपनी ड्यूटी निभाने में असफल रहा है। उसने घटना की पूरी जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को देना भी उचित नहीं समझा। अदालत ने सवाल उठाया कि मृतक के शरीर पर गंभीर चोट के बावजूद डॉक्टर ने उसे अस्पताल भेजने के लिए क्यों नहीं कहा।
जेल महानिदेशक की रिपोर्ट पर उठाए सवाल
अदालत ने जेल महानिदेशक द्वारा दायर की गई स्थिति रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि आंतरिक जांच में एक उपाधीक्षक, दो सहायक अधीक्षकों और एक वार्डर की मिलीभगत का हवाला देते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया है। अदालत ने कहा डीआईजी को जेल उपाधीक्षक विनय ठाकुर की मिलीभगत, लापरवाही दिखाई नहीं दी जिन्होंने पीसीआर कॉल की जांच के लिए जेल गए हरि नगर थाने के एएसआई राम अवतार को अंकित का बयान दर्ज करने के लिए जेल में जाने की अनुमति नहीं दी थी।
जेल में उगाही
अदालत ने हरि नगर थानाध्यक्ष के उस बयान को भी गंभीरता से लिया कि अंकित से पैसे लेने के लिए जिन फोन नंबरों पर पैसा ट्रांसफर किया गया था, उनका विवरण प्राप्त कर लिया गया है और इसकी जांच की जा रही है। अदालत ने कहा यह स्पष्ट है कि यदि याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं, तो यह एक बहुत ही गंभीर अपराध है, जिस तरीके से जेल में कथित जबरन वसूली की जाती है, उसका पता लगाने के लिए गहन जांच की आवश्यकता है।
परिवार ने आरोप लगाया है कि तिहाड़ में जेल अधिकारी एक संगठित जबरन वसूली सिंडिकेट चला रहे हैं। वहीं, अपराधियों को बचाने के लिए जांच में हेरफेर करने की कोशिश पुलिस कर रही है।
जेल में बेईमान अधिकारियों पर नकेल कसने का निर्देश
अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल में अपराध होने की हालत में जांच अधिकारी को तुरंत प्रवेश मिलने व सीसीटीवी कैमरों की उचित व्यवस्था के लिए नियम बनाने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस को एक संज्ञेय अपराध की जांच करने के लिए जेल में प्रवेश से वंचित न किया जाए। इसके अलावा सीसीटीवी कैमरों की उचित व्यवस्था के लिए नियम बनाए जाए ताकि जेल में बेईमान अधिकारी सीसीटीवी के काम न करने की जानकारी का लाभ न उठाएं और वे कोई भी अवैध कार्य, अपराध करके भाग न सकें।
विज्ञापन
नई दिल्ली। जेल की दीवारें कितनी भी ऊंची हों, उसकी नींव भारत के संविधान में निहित कैदियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले कानून के शासन पर रखी जाती है। यह तिहाड़ जेल में हिरासत में हुई हिंसा में जान गंवाने वाले अंकित गुर्जर के संविधानिक अधिकारों का हनन है। हाईकोर्ट ने उक्त टिप्पणी करते हुए जेल में कैदियों से उगाही व कैदियों से मारपीट के मामले की जांच के लिए सीबीआई जांच के निर्णय को उचित ठहराते हुए की।
न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता ने जेल में तैनात डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह अकल्पनीय है कि जब आधी रात को जेल के डॉक्टर ड्यूटी पर आए, तो उन्होंने अंकित पर कई चोटें नहीं देखीं। अदालत ने कहा जब अंकित घायल हो गया और जीवित था, यदि उसे उचित उपचार प्रदान किया जाता, तो उसकी जान बचाई जा सकती थी।
विज्ञापन
अदालत ने कहा न केवल इस बात की जांच जरूरी है कि अंकित को बेरहमी से पीटने का अपराध किसने किया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। बल्कि सही समय पर उचित उपचार उपलब्ध नहीं कराने में जेल डॉक्टरों की भूमिका की भी उचित जांच की जरूरत है।
विज्ञापन
अदालत ने कहा मामले में जेल डॉक्टर अपनी ड्यूटी निभाने में असफल रहा है। उसने घटना की पूरी जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को देना भी उचित नहीं समझा। अदालत ने सवाल उठाया कि मृतक के शरीर पर गंभीर चोट के बावजूद डॉक्टर ने उसे अस्पताल भेजने के लिए क्यों नहीं कहा।
जेल महानिदेशक की रिपोर्ट पर उठाए सवाल
अदालत ने जेल महानिदेशक द्वारा दायर की गई स्थिति रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि आंतरिक जांच में एक उपाधीक्षक, दो सहायक अधीक्षकों और एक वार्डर की मिलीभगत का हवाला देते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया है। अदालत ने कहा डीआईजी को जेल उपाधीक्षक विनय ठाकुर की मिलीभगत, लापरवाही दिखाई नहीं दी जिन्होंने पीसीआर कॉल की जांच के लिए जेल गए हरि नगर थाने के एएसआई राम अवतार को अंकित का बयान दर्ज करने के लिए जेल में जाने की अनुमति नहीं दी थी।
जेल में उगाही
अदालत ने हरि नगर थानाध्यक्ष के उस बयान को भी गंभीरता से लिया कि अंकित से पैसे लेने के लिए जिन फोन नंबरों पर पैसा ट्रांसफर किया गया था, उनका विवरण प्राप्त कर लिया गया है और इसकी जांच की जा रही है। अदालत ने कहा यह स्पष्ट है कि यदि याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं, तो यह एक बहुत ही गंभीर अपराध है, जिस तरीके से जेल में कथित जबरन वसूली की जाती है, उसका पता लगाने के लिए गहन जांच की आवश्यकता है।
परिवार ने आरोप लगाया है कि तिहाड़ में जेल अधिकारी एक संगठित जबरन वसूली सिंडिकेट चला रहे हैं। वहीं, अपराधियों को बचाने के लिए जांच में हेरफेर करने की कोशिश पुलिस कर रही है।
जेल में बेईमान अधिकारियों पर नकेल कसने का निर्देश
अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल में अपराध होने की हालत में जांच अधिकारी को तुरंत प्रवेश मिलने व सीसीटीवी कैमरों की उचित व्यवस्था के लिए नियम बनाने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस को एक संज्ञेय अपराध की जांच करने के लिए जेल में प्रवेश से वंचित न किया जाए। इसके अलावा सीसीटीवी कैमरों की उचित व्यवस्था के लिए नियम बनाए जाए ताकि जेल में बेईमान अधिकारी सीसीटीवी के काम न करने की जानकारी का लाभ न उठाएं और वे कोई भी अवैध कार्य, अपराध करके भाग न सकें।