Delhi: पश्चिमी दिल्ली के इस बड़े अस्पताल का बुरा हाल, डॉक्टरों का इंतजार; जान लें क्या है वजह
नजफगढ़ अस्पताल में सीनियर डॉक्टरों के लिए करीब 140 पद स्वीकृत हैं। जबकि मौजूदा समय में 23 पदों पर डॉक्टर सेवा दे रहे हैं। लेकिन डॉक्टरों के अभाव में अस्पताल अभी भी डिस्पेंसरी के बराबर ही सेवाएं दे पा रहा है।
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पश्चिमी दिल्ली में एम्स जैसी सुविधा देने के लिए शुरू हुआ 100 बेड का अस्पताल डॉक्टरों की कमी के चलते पूरी क्षमता से शुरू नहीं हो पाया है। अस्पताल प्रशासन ने कई बार डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए रिक्तियां निकाली, लेकिन अनुबंध पर कोई सीनियर डॉक्टर आने को तैयार नहीं है। अब हालत यह है कि अस्पताल की ओपीडी में सफदरजंग अस्पताल से ट्रेनिंग करने आ रहे डॉक्टर मरीजों का उपचार कर रहे हैं। डॉक्टरों के अभाव में यहां स्पेशलाइज्ड सेवाएं शुरू नहीं हो पाई।
विशेषज्ञों की माने तो एम्स, सफदरजंग जैसे बड़े अस्पतालों से मरीजों का बोझ कम करने के लिए नजफगढ़ के ग्रामीण स्वास्थ्य प्रशिक्षण केंद्र को 100 बेड के अस्पताल में बदला गया। करीब छह माह पहले अस्पताल बनकर शुरू हो गया, लेकिन डॉक्टरों के अभाव में अस्पताल अभी भी डिस्पेंसरी के बराबर ही सेवाएं दे पा रहा है।
डॉक्टरों का कहना है कि प्रोफेसर, सहायक प्रोफेसर, सीनियर रेजिडेंट स्तर के डॉक्टरों के लिए अनुबंध पर काफी कम वेतन प्रस्तावित किया जा रहा है। इतने कम वेतन में काम करने से बेहतर है कि निजी अस्पतालों में प्रैक्टिस की जाए। इस अस्पताल में गायनी, बाल रोग, मेडिसन, नेत्रविज्ञान सहित अन्य सभी सेवाएं विकसित की गई हैं। अस्पताल के सभी बेड ऑक्सीजन से कनेक्ट हैं।
नजफगढ़ अस्पताल में सीनियर डॉक्टरों के लिए करीब 140 पद स्वीकृत हैं। जबकि मौजूदा समय में 23 पदों पर डॉक्टर सेवा दे रहे हैं। इनमें से आठ डॉक्टर अनुबंध पर हैं। जबकि 15 डॉक्टर नियमित हैं। इस बारे में अस्पताल के विभाग प्रमुख डॉ. श्याम सुंदर ने बताया कि डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए जल्द रिक्तियां निकाली जाएंगी। उन्होंने कहा कि पहले भी रिक्तियां निकाली गई थी, वेतन कम होने के कारण कोई आने को तैयार नहीं है। इसे देखते हुए एक प्रस्ताव स्थायी नियुक्ति के लिए स्वास्थ्य विभाग को भेजा गया है।
सेंटर में लंबे समय से गर्भवती महिलाओं को सुविधाएं मिल रही हैं। हालांकि प्रोफेसर या सीनियर डॉक्टर के अभाव में डिलीवरी के लिए सर्जरी और अन्य गंभीर मामलों में समस्या हो जाती हैं। यहां आने वाले मरीजों ने बताया कि गंभीर गर्भवती महिलाओं को सफदरजंग या एम्स रेफर कर दिया जाता है। मरीजों का कहना है कि जब अस्पताल नहीं बना था, उस समय भी सेंटर में यहीं सुविधा थी। 100 बेड का अस्पताल बनने के बाद भी सेवाओं में कोई विस्तार नहीं हुआ।
नजफगढ़ के प्राइमरी हेल्थ सेंटर में तैयार हुए इस अस्पताल के लिए लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ा। साल 2004 में केंद्र सरकार ने रेफरल यूनिट बनाने का आदेश दिया था। साल 2007 में केंद्र ने यहां 35 बेड का अस्पताल बनाने की मंजूरी दे दी, लेकिन अस्पताल का काम शुरू नहीं हुआ। 28 फरवरी 2014 में यहां केवल शिलान्यास हुआ। वहीं साल 2018 में सांसद प्रवेश वर्मा ने इसका शिलान्यास किया, लेकिन कई कारणों से फिर देरी के बाद अस्पताल शुरू हुआ।
अस्पताल में दुर्घटना में घायल होकर आने वाले मरीजों की स्थिति गंभीर होने के बाद जाफरपुर कलां स्थित दिल्ली सरकार के राव तुला राम अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है। डॉक्टरों की माने तो सुविधाओं के अभाव में गंभीर मरीजों को परेशान होना पड़ रहा है। केंद्र सरकार का अस्पताल होने के बाद भी सेवाएं नहीं बढ़ पा रही हैं। जबकि इस अस्पताल से बाहरी दिल्ली के अलावा झज्जर, बहादुरगढ़ से हजारों मरीजों को फायदा हो सकता है। आधुनिक सुविधाओं के साथ विकसित किए गए इस अस्पताल में विशेष तौर पर इमरजेंसी सेवाओं को तैयार किया गया है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी बने 263 डॉक्टर
दिल्ली सरकार में वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी के तौर पर कार्यरत 263 डॉक्टरों को पदोन्नति दी गई है। इस संबंधी मांग पूरी करने के लिए डॉक्टरों ने पिछले दिनों उपराज्यपाल कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया था। उपराज्यपाल कार्यालय के मुताबिक, एलजी वीके सक्सेना ने इन डॉक्टरों को वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी से मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद पर पदोन्नति को मंजूरी दी है। इनकी पदोन्नति 2018 से 5 वर्षों से अधिक समय से लंबित थी।
सभी डॉक्टर पं. दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल, गुरु तेग बहादुर अस्पताल, लोक नायक अस्पताल, बाबा साहेब अंबेडकर अस्पताल, दीप चंद बंधु अस्पताल, अरुणा आसफ अली सरकारी अस्पताल, जीबी पंत अस्पताल, डीजीएचएस, स्कूल स्वास्थ्य योजना, मोबाइल स्वास्थ्य योजना सहित अन्य जगहों पर सेवाएं दे रहे हैं। उपराज्यपाल ने इस मामले में तेजी से फैसले लेने का निर्देश दिया था।
उन्होंने कई बार कहा कि सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तें, पदोन्नति और पेंशन कानून के अनुसार सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस साल जनवरी में उपराज्यपाल ने दिल्ली सरकार के विभिन्न अस्पतालों में कार्यरत 139 डॉक्टरों (गैर-शिक्षण विशेषज्ञों) को ग्रेड- II से ग्रेड- I में पदोन्नत करने की मंजूरी दी थी।