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Monsoon : दिल्ली-एनसीआर में 30 जून की जगह 12 जुलाई तक आएगा मानसून, रहेगा अल-नीनो का असर

Mon, 22 May 2023 06:24 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 22 May 2023 06:24 AM IST
सार

सबसे खराब पूर्वानुमान दिल्ली एनसीआर के लिए है। यहां मानसून की बारिश सामान्य तारीख से 12 दिन बाद यानी 30 जून की जगह 12 जुलाई से होने की संभावना है।

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Monsoon will arrive in Delhi-NCR by July 12 instead of June 30
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार बंगाल की खाड़ी में मॉनसून की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी रह सकती है, इसलिए जून के पहले पखवाड़े में देश में समग्र मानसूनी वर्षा की गतिविधि धीमी रह सकती है। 

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सबसे खराब पूर्वानुमान दिल्ली एनसीआर के लिए है। यहां मानसून की बारिश सामान्य तारीख से 12 दिन बाद यानी 30 जून की जगह 12 जुलाई से होने की संभावना है। इन क्षेत्रों में बारिश की तीव्रता जून और बाकी के मौसम में सामान्य से कम होगी। इस सप्ताह की शुरुआत में ही आईएमडी ने केरल में दक्षिण-पश्चिम मानसून के देरी से आने की भविष्यवाणी की थी। मानसून आने के बाद भी मानसूनी हवाओं की गति धीमी रहेगी और रूक-रूक कर बारिश होगी। 
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विशेषज्ञों ने अनुमान जताया है कि देश के बड़े भाग में बारिश की तीव्रता सामान्य से कम रहेगी। मौजूदा पूर्वानुमान बताता है कि देरी से शुरू होने के बाद मॉनसून देश के पश्चिमी तट पर सामान्य गति से आगे बढ़ेगा। राष्ट्रीय वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र और आईएमडी के शोध वैज्ञानिकों के अनुसार पूर्व और पश्चिम से हवाओं के अभिसरण के कारण सोमालिया तट से दूर मानसून ट्रफ भूमध्य रेखा के दक्षिण की ओर निर्मित होता है। इसे अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। 
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तत्पश्चात यह भूमध्य रेखा से उत्तर की ओर विक्षेपित हो जाता है और नमी को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की ओर ले जाता है। इसके बाद यह धीरे धीरे भारत की ओर बढ़ता है और 1 जून के आस-पास केरल के तट से टकराता है। इस प्रक्रिया में इस बार 4-5 दिनों की देरी है और तीव्रता भी अपेक्षाकृत कमजोर है। 

कई और विशेषज्ञ भी देश के बड़े क्षेत्र में मानसूनी हवाओं के सामान्य से बहुत देर से आने का अनुमान लगा रहे हैं। हांलाकि जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च की जलवायु वैज्ञानिक एलेना के अनुसार मध्य भारत में 26 जून के आसपास लगातार मानसून बारिश होगी। राष्ट्रीय वायु मंडलीय विज्ञान केंद्र के अनुसार मध्य और पूर्वी भारत के कई राज्यों में जून में सामान्य से अधिक तापमान रहेगा और औसत से कम बारिश होगी। इसके विपरीत भारत के पश्चिमी तट पर औसत से अधिक बारिश हो सकती है जबकि उत्तर-पश्चिम भारत में औसत से कम बारिश का अनुमान है। 

मॉनसून पर पड़ेगा अल-नीनो का असर 
15 जून के आस-पास छिटपुट बरसात होगी और 26 जून तक शुष्क अवधि रहेगी। अल-नीनो का असर मॉनसून पर पड़ेगा, इसलिए इस वर्ष मॉनसून के सामान्य से कम रहने की संभावना है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एक अल-नीनो घटना अपेक्षा से जल्दी विकसित होने की संभावना है, इसलिए दक्षिण-पश्चिम मॉनसून संभावित रूप से कमजोर हो सकता है।

अल-नीनो दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) जालवायु का सामान्य से अधिक गर्म चरण है, जिसके दौरान भारत सहित दुनिया के कई क्षेत्रों में आमतौर पर गर्म तापमान और सामानय से कम वर्षा होती है। अल-नीनो घटना के दौरान दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट से भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान (एसएसटी) दीर्घकालिक औसत की तुलना में कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो जाता है। समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने से ऊपर बहने वाली व्यापारिक हवाएं कमजोर हो जाती हैं और यहां तक की उनके उलटने का कारण भी बन सकती हैं। यह वर्षा की स्थिति को कमजोर करती है। 

ईएनएसओ उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र-वायुमंडल प्रणाली की एक आवधिक पारी है जो दुनियाभर में मौसम को प्रभावित करती है। हांलाकि सभी अल-नीनो वर्ष खराब मॉनसून वर्ष नहीं होते हैं। आईएमडी के अनुसार तीन बड़े पैमाने पर जलवायु घटनाएं मानसून के मौसम की वर्षा को प्रभावित करती हैं। पहला अल-नीनो है जो अल-नीनो दक्षिणी दोलन घटना के सामान्य चरण की तुलना में गर्म है और आमतौर पर भारत में मानसून की वर्षा को कम करता है।  दूसरी बड़े पैमाने की जलवायु घटना हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) है जो भूमध्यरेखीय हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी किनारों के अलग-अलग वार्मिंग के कारण होती है।   तीसरी बड़े पैमाने की जलवायु घटना उत्तरी हिमालय और यूरेशियन भूभाग पर बर्फ का आवरण है, जिसका भारतीय मानसून पर प्रभाव पड़ता है। 


दिसंबर 2022 से मार्च 2023 के दौरान उत्तरी हिमालय और यूरेशिया में सामान्य से कम बर्फबारी हुई है। तथ्य बताते हैं कि कम बर्फबारी भारतीय मॉनसून के लिए बेहतर है, लेकिन ला-नीना यूरेशिया पर बर्फबारी को बढ़ाता है। यह स्थिति मॉनसून के लिए शुभ संकेत नहीं है।

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