जल संकट : सर्दियों में भी पानी को मोहताज हैं दिल्ली के कई रिहायशी इलाके, बूंद-बूंद को तरह रहे लोग
धरती से बूंद-बूंद निचोड़ रही दिल्ली, हर दिन औसतन 0.05 सेंटीमीटर खो रही भूजल। 16 साल में करीब 50 फीसदी तक बढ़े सेमी क्रिटिकल वाटर सोर्स। वहीं 16 साल में सुरक्षित जलस्त्रोत की संख्या में केवल 10 फीसदी हुआ इजाफा।
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63 वर्षीय आशा देवी पानी के लिए अक्सर परेशान रहती हैं। सप्ताह में दो से तीन बार ही इन्हें समय पर पानी मिल पाता है क्योंकि अधिकांश समय रात आठ से नौ के बीच पानी नहीं आता और सुबह कभी आठ तो कभी छह बजे ही पानी आने लगता है। अगर सुबह जल्दी न उठें तो इन्हें पानी के लिए पूरे दिन परेशान रहना पड़ता है। आशा देवी बताती हैं कि यह हालात सिर्फ गर्मियों में ही नहीं, बल्कि इन दिनों में भी हैं। वे कहती हैं, ‘दिल्ली में बारिश साल में गिनती के दिन ही होती है। बारिश हो या नहीं, हमारे लिए यह संकट वही रहता है। सर्दी-गर्मी के बीच अंतर इतना ही है कि जून-जुलाई में थोड़ी बहुत किल्लत बढ़ जाती है।’ यह स्थिति अकेले आशा देवी की नहीं है बल्कि पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके के जे एक्सटेंशन में ज्यादातर घर इसका सामना कर रहे हैं।
यहां से चंद किलोमीटर दूर मयूर विहार निवासी अंकिता बंसोड यहां तक कहती हैं कि दिनभर में उनकी एक ड्यूटी बार बार ये देखने की है कि नल आया या नहीं। इसकी वजह से बार बार मोटर चलाने से वह एयर ले जाती है और फिर मैकेनिक बुलाना पड़ता है। यह हर महीने की हालत है और करीब 500 से एक हजार रुपये का खर्चा मोटर की एयर निकालने में ही लग जाता है।
भूजल संकट का सामना कर रही दिल्ली में सरकार ‘झीलों के शहर’ परियोजना पर काम कर रही है। चूंकि यमुना दिल्ली का सबसे बड़ा जल स्त्रोत है। ऐसे में साल 2021 में सरकार झीलों को जीवन देने की योजना पर काम कर रही है जिसकी शुरुआत नरेला स्थित एसटीपी से हुई। जबकि सरकारी आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में भूजल दोहन बढ़ता ही जा रहा है।
जुलाई 2021 में साल 2005 से 2014 के बीच भूजल दोहन की स्थिति को लेकर आई केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली हर साल औसतन 0.2 मीटर भूजल खो रही है। अगर इसका गणितीय आकलन करें और सेंटीमीटर में देखें तो दिल्ली रोजाना 0.05 सेंटीमीटर भूजल खो रही है। धरती से बूंद-बूंद निचोड़ रही दिल्ली के बारे में एक रिपोर्ट यह भी कहती है कि यहां के करीब 80 फीसदी स्त्रोत क्रिटिकल या फिर सेमी क्रिटिकल स्थिति में आ चुके हैं।
इंडिया डाटा पोर्टल पर मौजूद डायनेमिक ग्राउंड वॉटर रिसोर्सेज ऑफ इंडिया 2020 के अनुसार देश में बीते 16 साल में करीब 50 फीसदी तक सेमी क्रिटिकल जल स्त्रोत में इजाफा हुआ है। साल 2004 से 2020 के बीच इनकी संख्या 550 से बढ़कर 1057 तक पहुंच गई है। वहीं इसी अवधि में सुरक्षित जलस्त्रोत की संख्या में केवल 10 फीसदी ही बढ़ी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली के 89 फीसदी हिस्से पर जलोढ़ का कब्जा है और भूजल का ज्यादातर दोहन नलकूपों के माध्यम से किया जा रहा है। देश में जिन चार राज्यों में सबसे अधिक भूजल का दोहन हो रहा है उसमें दिल्ली भी शामिल है। इनका यहां तक मानना है कि जल संकट से बाहर आने के लिए सरकार और जनता दोनों को साथ में आने की जरूरत है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शशांक बताते हैं कि भूजल स्तर दिल्ली के लगभग हर स्थान पर दो से चार मीटर तक गिरा है लेकिन कुछ हिस्से यमुना बाढ़ के मैदान, मध्य दिल्ली, नजफगढ़ के पास दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में वृद्धि भी हुई है। अगर जेएनयू और संजय वन जैसे क्षेत्रों की बात करें तो यहां अच्छा भूजल पुनर्भरण हुआ लेकिन इसके ठीक बगल में हौज खास और ग्रेटर कैलाश ने क्षमता से ज्यादा भूजल का दोहन किया है। इसमें पूर्वी दिल्ली का लक्ष्मी नगर और प्रीत विहार, मयूर विहार भी शामिल है जहां के लोगों की पानी के लिए 12 महीने एक जैसी दिनचर्या रहती है।
34 में से 17 यूनिट अति शोषित
रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 में दिल्ली के 11 जिलों में 34 यूनिट की जब जांच हुई तो उसमें 50 फीसदी यानी 17 यूनिट अति शोषित पाई गईं। वहीं सात यूनिट (20.59%) क्रिटिकल और अन्य सात यूनिट सेमी क्रिटिकल पाई गईं। केवल तीन यूनिट यानी 8.82% ही सुरक्षित पाई गई हैं जिसका मतलब है कि यहां भूजल का दोहन बाकी यूनिट की तुलना में कम हुआ है। इसी प्रकार राज्य के 1487.61 वर्ग किमी पुनर्भरण योग्य क्षेत्र में से 769.58 वर्ग किमी (51.73%) अति-शोषित पाया गया। वहीं 348.81 वर्ग किमी (23.45%) क्रिटिकल, 222.06 वर्ग किमी (14.93%) सेमी क्रिटिकल मिला। जबकि 147.16 वर्ग किमी (9.89%) ही सुरक्षित माना गया। इससे साफ पता चलता है कि दिल्ली की अधिकांश यूनिट इकाइयां सबसे अधिक भूजल दोहन की चपेट में हैं।