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होली 2022: रंगोत्सव के रंग में रंगा दिल्ली देहात, आगै होकै क्यूं भाग्गै देवर, होली फाग म खेलैंगे...
Wed, 16 Mar 2022 05:16 AM IST
सुशील कुमार
विनोद डबास, अमर उजाला, नई दिल्ली
विनोद डबास, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सुशील कुमार
Updated Wed, 16 Mar 2022 05:16 AM IST
सार
मुबारिकपुर निवासी एवं सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य राम रोशनी ने पुरानी यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि फाल्गुन माह शुरू होते ही ग्रामीण इलाकों में होली की झलक दिखाई देने लगती थी। महिलाएं अपने देवरों पर पानी डालने का सिलसिला शुरू कर देती थीं।
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होली
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
‘आगै होकै क्यूं भाग्गै देवर, होली फाग म खेलैंगे...कमर मैं कोरडा मारूंगी, तू होली फाग खेलैगी तो भाभी मैं पानी डालूंगा...।’ होली के नजदीक आते ही दिल्ली देहात में यह लोकगीत सुनाई देने लगा है। वातावरण होलीमय होने लगा है। जगह-जगह अबीर-गुलाल उड़ाने की तैयारियां की जा रही हैं। हालांकि, त्योहार मनाने का अंदाज पीढ़ीगत बदलता जा रहा है।
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मुबारिकपुर निवासी एवं सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य राम रोशनी ने पुरानी यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि फाल्गुन माह शुरू होते ही ग्रामीण इलाकों में होली की झलक दिखाई देने लगती थी। महिलाएं अपने देवरों पर पानी डालने का सिलसिला शुरू कर देती थीं। यह दौर दुल्हैंडी तक चलता था।
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दुल्हैंडी के दिन पूरे गांव की महिलाओं और पुरुषों की टोलियां होली खेलने के लिए तालाब के पास पहुंच जाती थीं, जहां दिनभर रंग-गुलाल उड़ता था। कई बार तो कीचड़ की होली भी खेली जाती थी। इस दौरान महिलाओं पर पुरुष पानी डालते थे और महिलाएं उन्हें कपड़े से बना कोरडा मारती थी। तेज कोरडा मारने वाली महिला को कई पुरुष पकड़कर तालाब में ले जाकर काफी देर तक डुबकी लगवाते थे।
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नशे को प्राथमिकता
दिल्ली देहात के कुछ लोगों ने कहा कि अब लोग सद्भाव के साथ होली नहीं खेलते हैं। ज्यादातर लोग नशे को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने अपील की है कि होली पर नशे को त्यागकर भाईचारे को अपनाएं।
परंपरागत होली का माहौल विलुप्त
करीब चार दशक पहले दिल्ली जल बोर्ड ने घरों में पानी की आपूर्ति शुरू की। इसके बाद ग्रामीणों ने चौराहों और गलियों में होली खेलना शुरू कर दी। अब गांवों से परंपरागत होली का माहौल विलुप्त हो चुका है। राम रोशनी की तरह रसूलपुर निवासी एवं पूर्व प्रधान चौधरी रामनारायण भी सामूहिक तौर पर होली खेलने की परंपरा खत्म होने पर काफी चिंतित नजर आए। उन्होंने कहा कि संपन्नता और आधुनिकता की चमक के बीच गांवों में होली का त्योहार कहीं खो सा गया है। अब फाल्गुन आने-जाने के बारे में पता ही नहीं चलता है। पहले की तरह महिलाएं एक माह पहले देवरों पर पानी नहीं डालती हैं। दुल्हैंडी पर भी वह परंपरा दिखाई नहीं देती है। इस दिन लोग घरों में ही कुछ पल के लिए होली खेलते हैं। इस दौरान महिलाएं पुरुषों को कोरडा मारने के बजाय उन पर रंग-गुलाल लगाती हैं और पुरुष उन पर पानी डालने के बजाय रंग-गुलाल लगाते हैं। कुछ लोग तो होली खेलने की रस्म पूरी करने के लिए केवल हाथ पर गुलाल लगाते हैं।