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अधिकारियों के लिए होटल में कमरे आरक्षित करने को ठहराया उचित
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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने गुरुवार को विभिन्न सरकारी अधिकारियों और उनके परिवारों के इलाज के लिए दो अस्पतालों से जुड़े चार होटलों में कमरे आरक्षित करने संबंधी दिल्ली सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने सरकार के निर्णय को उचित ठहराते हुए कहा कि लॉकडाउन के दौरान जब आम लोग अपने घरों में थे, यह सरकारी अधिकारी थे जो स्थिति का प्रबंधन करने के लिए सड़कों पर थे। यदि ऐसे अधिकारियों/उनके परिवार के सदस्य बीमार पड़ते और उन्हें उचित इलाज न मिलता तो न केवल उन्हें बल्कि दिल्ली के लोगों को नुकसान उठाना पड़ता।
न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के इस तर्क में कोई आधार नहीं है कि जारी अधिसूचनाओं संबंधी सरकारी आदेश सक्षम अधिकारियों द्वारा पारित नहीं किए गए। यह याचिका डॉक्टर कौशल कांत मिश्रा ने दायर की थी।
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संसाधनों के उपयोग का तर्क खारिज
अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील के इस तर्क को खारिज कर दिया कि सरकारी अधिकारियों और उनके परिवारों के कोविड-19 उपचार के लिए सुविधाओं के विशेष आरक्षण के कारण राज्य के संसाधनों का उपयोग नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा याचिकाकर्ता के वकील ने अपने तर्क में महामारी की दूसरी लहर की जमीनी हकीकत को ध्यान में नहीं रखा गया।
दिल्ली सरकार की 27 अप्रैल की अधिसूचना के अनुसार विवेक विहार स्थित होटल जिंजर में 70 कमरे, शाहदरा में होटल पार्क प्लाजा में 50 कमरे, और कड़कड़डूमा के सीबीडी ग्राउंड में होटल लीला एंबीयंस में 50 कमरे, राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल से जुड़े और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल (डीडीयू) से जुड़े हरि नगर स्थित होटल गोल्डन ट्यूलिप के सभी कमरे दिल्ली सरकार, स्वायत्त निकायों, निगमों, स्थानीय निकायों और उनके अधिकारियों और उनके परिवारों के इलाज के लिए आरक्षित हैं।
अधिकारी सड़कों पर जान जोखिम में डाल रहे थे
अदालत ने कहा दूसरी लहर में ऑक्सीजन, दवाओं, अस्पताल के बिस्तरों, ऑक्सीजनयुक्त बिस्तरों, आइसीयू, डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ सहित सुविधाओं की कमी थी। अदालत ने कहा कि जब महामारी की दूसरी लहर के दौरान चिकित्सा बुनियादी ढांचे की भारी कमी थी, तो सरकारी अधिकारी स्थिति का प्रबंधन करने के लिए सड़कों पर अपनी जान जोखिम में डाल रहे थे। अदालत ने कहा ऐसे में राज्य प्रशासन सभी नागरिकों को चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने के लिए बाध्य है।
अदालत ने कहा दैनिक आधार पर दूसरी लहर के दौरान शहर में क्या हो रहा था, इसे सबने देखा है। हजारों लोग कुछ राहत के लिए सरकार की ओर देख रहे थे। पीठ ने कहा हमारे विचार में ऐसे अधिकारी स्पष्ट रूप से अपने कर्तव्यों के कारण एक अलग वर्ग में आते हैं और उन्हें महामारी के चरम के दौरान भी काम करने की आवश्यकता थी। उन्हें घरों में आराम करने की अपेक्षा बाहर निकलकर ड्यूटी पर आना जरूरी था और उनके पास इसका कोई विकल्प नहीं था।
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अदालत ने सरकार के निर्णय को उचित ठहराते हुए कहा कि लॉकडाउन के दौरान जब आम लोग अपने घरों में थे, यह सरकारी अधिकारी थे जो स्थिति का प्रबंधन करने के लिए सड़कों पर थे। यदि ऐसे अधिकारियों/उनके परिवार के सदस्य बीमार पड़ते और उन्हें उचित इलाज न मिलता तो न केवल उन्हें बल्कि दिल्ली के लोगों को नुकसान उठाना पड़ता।
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न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के इस तर्क में कोई आधार नहीं है कि जारी अधिसूचनाओं संबंधी सरकारी आदेश सक्षम अधिकारियों द्वारा पारित नहीं किए गए। यह याचिका डॉक्टर कौशल कांत मिश्रा ने दायर की थी।
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संसाधनों के उपयोग का तर्क खारिज
अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील के इस तर्क को खारिज कर दिया कि सरकारी अधिकारियों और उनके परिवारों के कोविड-19 उपचार के लिए सुविधाओं के विशेष आरक्षण के कारण राज्य के संसाधनों का उपयोग नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा याचिकाकर्ता के वकील ने अपने तर्क में महामारी की दूसरी लहर की जमीनी हकीकत को ध्यान में नहीं रखा गया।
दिल्ली सरकार की 27 अप्रैल की अधिसूचना के अनुसार विवेक विहार स्थित होटल जिंजर में 70 कमरे, शाहदरा में होटल पार्क प्लाजा में 50 कमरे, और कड़कड़डूमा के सीबीडी ग्राउंड में होटल लीला एंबीयंस में 50 कमरे, राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल से जुड़े और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल (डीडीयू) से जुड़े हरि नगर स्थित होटल गोल्डन ट्यूलिप के सभी कमरे दिल्ली सरकार, स्वायत्त निकायों, निगमों, स्थानीय निकायों और उनके अधिकारियों और उनके परिवारों के इलाज के लिए आरक्षित हैं।
अधिकारी सड़कों पर जान जोखिम में डाल रहे थे
अदालत ने कहा दूसरी लहर में ऑक्सीजन, दवाओं, अस्पताल के बिस्तरों, ऑक्सीजनयुक्त बिस्तरों, आइसीयू, डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ सहित सुविधाओं की कमी थी। अदालत ने कहा कि जब महामारी की दूसरी लहर के दौरान चिकित्सा बुनियादी ढांचे की भारी कमी थी, तो सरकारी अधिकारी स्थिति का प्रबंधन करने के लिए सड़कों पर अपनी जान जोखिम में डाल रहे थे। अदालत ने कहा ऐसे में राज्य प्रशासन सभी नागरिकों को चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने के लिए बाध्य है।
अदालत ने कहा दैनिक आधार पर दूसरी लहर के दौरान शहर में क्या हो रहा था, इसे सबने देखा है। हजारों लोग कुछ राहत के लिए सरकार की ओर देख रहे थे। पीठ ने कहा हमारे विचार में ऐसे अधिकारी स्पष्ट रूप से अपने कर्तव्यों के कारण एक अलग वर्ग में आते हैं और उन्हें महामारी के चरम के दौरान भी काम करने की आवश्यकता थी। उन्हें घरों में आराम करने की अपेक्षा बाहर निकलकर ड्यूटी पर आना जरूरी था और उनके पास इसका कोई विकल्प नहीं था।