रेलवे में निजीकरण : 10 रुपये में पूड़ी-सब्जी बेचने वालों के रोजगार पर संकट
- संसद से प्लेटफार्म तक छाया रेलवे में निजीकरण का मुद्दा
- पारंपरिक खानपान स्टॉल की जगह फूड कोर्ट बनाए जाने से लाइसेंसी वेंडरों में नाराजगी
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रेलवे में निजीकरण का मुद्दा संसद से लेकर स्टेशनों के प्लेटफार्म तक छाया हुआ है। स्टेशनों को निजी हाथों में सौंपने के साथ ही पारंपरिक खानपान स्टॉल की जगह फूड कोर्ट बनाने से लाइसेंसी वेंडरों में नाराजगी है। 10 रुपये में यात्रियों को गर्मागर्म पूड़ी-सब्जी उपलब्ध कराने वालों के सामने भी रोजगार का संकट है। अखिल भारतीय रेलवे खानपान लाइसेंसीज वेलफेयर एसोसिएशन का आरोप है कि खानपान व्यवस्था बड़ी प्राइवेट कंपनियों के हवाले की जा रही है। छोटे खानपान लाइसेंसीज की समस्याओं को सरकार नजरअंदाज कर रही है।
लाइसेंसी वेलफेयर एसोसिएशन की मांग को संसद के बजट सत्र के दौरान भी सदस्यों ने उठाया। उस्मानाबाद के सांसद ओम पवन राजेनिंबालकर ने लोकसभा में भारतीय रेलवे के प्लेटफार्म पर कार्यरत छोटे खानपान लाइसेंसीज की समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि लाइसेंसीज वेंडर अपने स्टॉल, ट्रॉली, खोमचों पर चाय, शीतल पेय, पकौड़े, समोसा, स्नैक्स, फल बेचकर दिन-रात यात्रियों को खानपान रेलवे द्वारा उचित दर पर उपलब्ध कराते हैं। इनसे जुड़े लाखों लोगों की रोजी-रोटी के लिए कारगर कदम उठाए जाएं। वेलफेयर एसोसिएशन के मेमोरेंडम का भी जिक्र संसद में किया गया।
सांसद ने कहा कि खानपान नीति 2017 के तहत लाइसेंस धारक की मृत्यु होने पर कानूनी वारिस के नाम लाइसेंस स्थानांतरित करने का प्रावधान है, परंतु नोमिनेशन जीवित रहने पर कराने का प्रावधान नहीं है। इसी तरह स्थिर इकाइयों को निविदा प्रक्रिया के तहत नहीं रखना चाहिए। इसके अलावा कई समस्याएं न्यायालय में हैं, जिन्हें न्यायालय के बाहर सुलझाने की आवश्यकता है। उधर, वेंडरों व लाइसेंसियों के मुद्दे पर रेलवे का कहना है कि मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है। छोटे लाइसेंसियों का रोजगार खत्म नहीं होने दिया जाएगा। अब भी बुक स्टॉल, दवा की दुकान, खानपान की व्यवस्था स्टेशनों पर है। आइआरसीटीसी हाइजेनिक खाना परोस रहा है। खाना ऑन डिमांड की सुविधा दी जा रही है।
नई व्यवस्था
- स्टेशन पर फूड कोर्ट स्थापित किया जा रहा है
- फूड कोर्ट में तरह-तरह के व्यंजन यात्रियों के लिए उपलब्ध हैं
- ऑनलाइन खानपान की शुरुआत की गई है
- मल्टी नेशनल कंपनियां भी स्टेशन पर रेस्टोरेंट खोल रही हैं
- पैक्ड फूड की बिक्री हो रही है
- स्टेशन पर निजी दुकानें आवंटित की जा रही हैं
पारंपरिक खानपान को तव्वजो कम
- बड़ी कंपनियों के आने से पारंपरिक खाने को तवज्जो नहीं मिल रही है
- लाइसेंसधारियों को कई आइटम बिक्री करने की अनुमति नहीं है
- लाइसेंस नवीनीकरण में परेशानी होती है
- लाइसेंसी वेंडरों की मृत्यु होने पर कानूनी वारिस को लाइसेंस मिलने में परेशानी
- रेलवे द्वारा तय रेट में वृद्धि नहीं होने से परेशानी
- फलों के स्टॉल पर पानी की बोतल बेचने तक की अनुमति नहीं
स्टेशनों पर खानपान व्यवस्था बड़ी कंपनियों के हवाले की जा रही है। छोटे खानपान लाइसेंसीज की समस्याओं को सरकार नजरअंदाज कर रही है। गरीब एवं मध्यम वर्ग के यात्रियों को स्वच्छ एवं गर्म खानपान की सुविधा जारी रहे, इसके लिए सरकार कदम उठाए। भारतीय रेल में यात्रा करने वाले लगभग 85 प्रतिशत रेल यात्री मध्यम एवं गरीब वर्ग से होते हैं, जिन्हें ज्यादातर गरम पूड़ी, पकोड़ा, गर्म चाय जैसे खानपान ही पसंद होते हैं। निजीकरण के कारण रेलवे स्टेशन पर काम करने वाले लाखों लाइसेंसीस और वेंडरों को बेरोजगारी से बचाने के लिए सरकार को अपनी कार्य योजना शीघ्र घोषित करनी चाहिए।
आम यात्री के भोजन की व्यवस्था भी पहले रेलवे द्वारा ही की जाती है। प्लेटफार्म पर ट्रॉली पर खाना बंद होने से 10 रुपये का खाना 100 रुपये में मिल रहा है। पहले स्टॉल पर पानी का भी विशेष इंतजाम होता था। यात्रियों को मुफ्त में पानी खाने के साथ मिलता था। अब तो बोतल बंद पानी लेने के लिए यात्री मजबूर हैं। पानी भी 20 रुपये में मिलता है। इससे गरीब यात्रियों की तो परेशानी बढ़ गई है। रेलवे की जमीन निजी हाथों में सौंपी जा रही है। इससे रेलवे को नुकसान होता है। वेंडर फीस भी देते हैं और जनता की सेवा भी करते हैं। सरकार के फैसले से लाखों लोग बेरोजगार होंगे।
- सोमनाथ मलिक, अध्यक्ष, उत्तरी रेलवे मजदूर यूनियन
वर्षों से नहीं बढ़ी चाय की कीमत
वर्षों से चाय की कीमत नहीं बढ़ाई गई है। 5 रुपये मूल्य की चाय के साथ 2 रुपये का कुल्हड़ देना होता है। रेलवे प्रशासन के आदेशानुसार चाय का रेट 3 रुपये रह गया है।
छोटे लाइसेंसिज को अब भी 2012 की रेट लिस्ट के आधार पर खानपान की वस्तुएं बेचनी पड़ रही हैं। नई रेट लिस्ट शीघ्र जारी होनी चाहिए।